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KALPANA BHATT ('रौनक़')
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Sheikh Shahzad Usmani commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post पश्चाताप (लघुकथा)
"//अतीत के अँधेरों में खोये हुए ...// ... आरंभिक फ्लैैशबैैक का बहुत बढ़िया मार्गदर्शक प्रयोग!  पौराणिक पात्रों को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम को बढ़िया तरीके से लेकर बहुत बढ़िया उम्दा प्रस्तुति के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद और आभार…"
9 hours ago
Mohammed Arif commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post पश्चाताप (लघुकथा)
"आदरणीया कल्पना भट्ट जी आदाब,                                    पौराणिक प्रसंग को आधार बनाकर स्त्री की मनोदशा मेंं झाँकने का अच्छा प्रयास किया आपने । यह लघुकथा…"
13 hours ago
KALPANA BHATT ('रौनक़') posted a blog post

पश्चाताप (लघुकथा)

"अपने पुत्र को समझाओ गांधारी। वासुदेव कृष्ण की माँग सर्वथा उचित है। 'पांडवो के लिये पाँच गाँव!' भला इससे कम और क्या हो सकता है?’’"नहीं आर्यपुत्र, अब वह समझाने की सीमा में नहीं रहा। पानी सिर से ऊपर बहने लगा है।" गांधारी की आवाज सदैव की भांति स्थिर थी। 'मैंने आप से अनगिनित बार उसे समझाने के लिये कहा लेकिन आप के 'पुत्र-मोह' ने उसे कभी समझाना ही नहीं चाहा। परिणामतः हम जहां आ चुके है, वहां से लौटना संभव नहीँ।" ........... युद्ध की कालिमा छंट चुकी थी लेकिन सभी पुत्रों को खो चुके धृतराष्ट्र आज अतीत…See More
16 hours ago
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)
"अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय | "
yesterday
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post नंगापन (लघुकथा)
"शीर्षक पर विचार करियेगा आदरणीय शहजाद जी | कुछेक शब्दों को भी देख लें | सादर|"
yesterday
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Naveen Mani Tripathi's blog post याद आऊं तो निशानी देखना
"सुंदर ग़ज़ल हुई है आदरणीय  नवीन मणि त्रिपाठी जी| हार्दिक बधाई|"
yesterday
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on rajesh kumari's blog post शज़र जब सूख जाता है कोई पत्ता नहीं रहता (तरही ग़ज़ल 'राज')
"अच्छी ग़ज़ल कही है आपने आदरणीया राजेश दी| हार्दिक बधाई|"
yesterday
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post बोलती निगाहें (लघुकथा)
"ठीक ठाक ही लगी यह लघुकथा आपकी आदरणीय शहजाद उस्मानी जी | सादर|"
yesterday
Tasdiq Ahmed Khan commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post नारी मन (कविता)
"मुहतरमा कल्पना साहिबा, नारी की गरिमा पर सुंदर कविता हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।"
May 9
vijay nikore commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post नारी मन (कविता)
"नारी मन पर कविता अच्छी लिखी है। हार्दिक बधाई।"
May 9
Samar kabeer commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post नारी मन (कविता)
"बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,बहुत उम्दा कविता हुई,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
May 9
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post नारी मन (कविता)
"आ. कल्पना बहन अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई ।"
May 9
Mohammed Arif commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post नारी मन (कविता)
"आदरणीया कल्पना भट्ट जी आदाब,                                      नारी की गरिमा-गौरव को रेखांकित करती एक साधारण-सी कविता के लिए हार्दीक बधाई । कुछ…"
May 9
babitagupta commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post नारी मन (कविता)
"आदरणीया दी,नारी मन की बहुत ही सटीक शब्दों में व्याख्या.अति सुंदर,प्रस्तुत रचना पर बधाई."
May 8
KALPANA BHATT ('रौनक़') posted a blog post

नारी मन (कविता)

नारी का मन न जाने कोई जाने गर तो न पहचाने कोई एक पहेली बनती नारीहास परिहास की शिकार है नारीनव रसों में डूबी हुई अनोखी पर सशक्त है नारीकौन जाने कब हुआ जन्मश्रुष्टि रचयिता में सहभागी है नारीहर रिश्ते में बाँधा है इसको माँ, बहन, चाची औ मासीपूर्ण होता संसार है इससे अर्धनारीश्वर का रूप धरा शिव नेनारी का सम्मान बढ़ायायुग बदला बदली है नारी परम्परा से आधुनिकता की राह पर आज देखो चल पड़ी है नारीकदम कदम पर अपमानित होतीकभी घर कभी भरी सभा में नारी के मान को न जानेनारी सम्मान को न पहचानेनारी अबला नारी सबलाचाहे…See More
May 8
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आदरणीय गणेश बाग़ी सर को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।"
May 4

Profile Information

Gender
Female
City State
BHOPAL
Native Place
MUMBAI
Profession
house wife
About me
was a teacher for about 20 Years. Recently resigned. I am M.A in English,B.Ed ,LLB.. . interested in literature

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पश्चाताप (लघुकथा)



"अपने पुत्र को समझाओ गांधारी। वासुदेव कृष्ण की माँग सर्वथा उचित है। 'पांडवो के लिये पाँच गाँव!' भला इससे कम और क्या हो सकता है?’’

"नहीं आर्यपुत्र, अब वह समझाने की सीमा में नहीं रहा। पानी सिर से ऊपर बहने लगा है।" गांधारी की आवाज सदैव की भांति स्थिर थी। 'मैंने आप से अनगिनित बार उसे समझाने के लिये कहा लेकिन आप के 'पुत्र-मोह' ने उसे कभी समझाना ही नहीं चाहा। परिणामतः हम जहां आ चुके है, वहां से लौटना संभव नहीँ।"

........... युद्ध की कालिमा छंट चुकी थी लेकिन सभी पुत्रों को खो चुके…

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Posted on May 20, 2018 at 5:17pm — 2 Comments

नारी मन (कविता)



नारी का मन

न जाने कोई

जाने गर तो

न पहचाने कोई

एक पहेली बनती नारी

हास परिहास की शिकार है नारी

नव रसों में डूबी हुई

अनोखी पर सशक्त है नारी

कौन जाने कब हुआ जन्म

श्रुष्टि रचयिता में सहभागी है नारी

हर रिश्ते में बाँधा है इसको

माँ, बहन, चाची औ मासी

पूर्ण होता संसार है इससे

अर्धनारीश्वर का रूप धरा शिव ने

नारी का सम्मान बढ़ाया

युग बदला

बदली है नारी

परम्परा से आधुनिकता की राह पर

आज देखो चल पड़ी है नारी

कदम कदम पर…

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Posted on May 8, 2018 at 11:07am — 6 Comments

राजनीति की औकात (लघुकथा)

लव कुश के मुख से रामायण का गान सुनकर लोग अचंभित थे। लोगों में बातचीत हो रही थी," अयोध्या का और श्री राम चरित का वर्णन बहुत सुन्दर किया है।"

श्री राम दरबार में सीता जी के वनवास जाने के दृष्टान्त में लोगों की आँखों से झर झर आँसू बहने लगे।

इस वृत्तांत को सुनाते हुए लव और कुश के चेहरे पर क्रोध झलक रहा था।

किसीने पूछा,"बेटा तुम क्रोधित क्यों हुए?"

लव ने प्रतिप्रश्न किया ," ये कैसा न्याय कि किसी व्यक्ति के शक करने पर राजा ने रानी को देश से निष्कासित कर दिया.....!"

सब के झुके… Continue

Posted on April 1, 2018 at 8:24am — 13 Comments

शर्तों की शतरंज (लघुकथा)

"पापा! मुझे मोबाइल चाहिए, और अभी की अभी चाहिए|" सोनू ने जिद्द पकड़ ली थी।



"पागल हो गए हो क्या सोनू? यह क्या मोबाइल की जिद्द लिए बैठे हो, कोई मोबाइल-शोबईल नहीं मिलेगा,चुप-चाप खाना खाओ|" डाँटते हुए सोनू के पापा ने कहा|



लेकिन सोनू नहीं माना और हाथ-पैर पटकते हुए रोने लगा|



"रोता रह! पर तुम्हारी हर जिद्द नहीं मानूंगा | अभी पिछले महीने ही तुम्हें साइकिल दिलवाई है।" पापा का भी पारा चढ़ गया।



सोनू के दादा जी जो अब तक चुप थे,मुस्कुराकर बोले," आखिर बेटा तुम्हारा ही… Continue

Posted on March 27, 2018 at 3:00pm — 4 Comments

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At 10:51pm on August 8, 2017, श्याम किशोर सिंह 'करीब' said…

संदेशात्मक लघुकथा। सहज चित्रण के लिए बधाई।

KALPANA BHATT

At 1:55pm on May 17, 2016, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीया कल्पना जी महीने की सक्रिय सदस्य चुने जाने पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

At 1:26pm on May 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीया 

श्रीमती कल्पना भट्ट जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 11:34am on May 15, 2016, Rahila said…
बहुत शुक्रिया आदरणीया दी! आपने मुझे दोस्ती के काबिल समझा ।
At 2:10pm on May 1, 2016, pratibha pande said…

आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है , धन्यवाद आदरणीया कल्पना जी 

 
 
 

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