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अलका 'कृष्णांशी'
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Jun 4
अलका 'कृष्णांशी' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...//अलका 'कृष्णांशी'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी ,नमस्कार ,उत्साहवर्धन करती टिप्पणी के लिए  धन्यवाद ।सादर।"
Feb 8
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...//अलका 'कृष्णांशी'
"हार्दिक बधाई..."
Feb 6
अलका 'कृष्णांशी' posted a blog post

चुनावी हवा सरसराने लगी है...//अलका 'कृष्णांशी'

122 122 122 122.सियासत बिसातें बिछाने लगी है चुनावी हवा सरसराने लगी है....जगा फिर से मुद्दा ये पूजा घरों का दिलों में ये नफरत बढ़ाने लगी है। चुनावी हवा......यहाँ बाँट डाला है रंगो में मजहब बगावत की आंधी सताने लगी है।.कहीं नाम चंदन कहीं चाँद दिखता ये लाशें जमीं पर बिछाने लगी है.नही बात होती है अब एकता कीहमारी उमीदें घटाने लगी है .क्युँ इन्सां हुआ जानवर से भी बदतरहमें शर्म ख़ुद से ही आने लगी है .ये क्यों मौन बैठे है आदर्शवादी के मिट्टी वतन की बुलाने लगी है .जहाँ झूठे वादों का बहता है दरिया जमीं बोझ…See More
Feb 5
अलका 'कृष्णांशी' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"जी सर अब सही है... मुझे नहीं सूझ रहा था, अभी एडिट करती हूँ। मार्गदर्शन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय Samar Kabeer  ji ...... सादर।"
Feb 4
अलका 'कृष्णांशी' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"आदरणीय नादिर खान जी ,नमस्कार ,उत्साहवर्धन करती टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद । क्युँ का क्यूँ हो गया टाइपिंग मिस्टेक है सुधार करती हूँ। सादर।"
Feb 4
Samar kabeer commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"आपने जो मिसरे लिखे हैं वो लय में नहीं हैं,इन मिसरों को यूँ कर सकती हैं:- 'हमारी उमीदें घटाने लगी है' 'हमें शर्म ख़ुद से ही आने लगी है'"
Feb 4
नादिर ख़ान commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"अदरणीया अल्का जी उम्दा गज़ल के लिए बधाई स्वीकारें  ... 6 वें शेर में  क्यूँ इन्सां 122 नहीं हो सकता  और  शर्म खाने के विषय में आदरणीय समर साहब पहले ही बता  चुकें है..... फिर प्रयास कीजिये शुभकामनाओं के साथ…"
Feb 4
अलका 'कृष्णांशी' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
""इंसानियत को शर्म आने लगी है"वैसे इसमें मुझे लय गड़बड़ लग रही है"
Feb 4
अलका 'कृष्णांशी' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"आदरणीय Samar Kabeer ji  ,नमस्कार , प्रयास को समय देने व् मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार ।"उम्मीद अम्न की ये घटाने लगी है " "इंसानियत को शर्म आने लगी है" यदि अब सही हो तो एडिट किया जाए ?.... .सादर।"
Feb 4
अलका 'कृष्णांशी' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी ,नमस्कार ,उत्साहवर्धन करती टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद ।सादर।"
Feb 4
अलका 'कृष्णांशी' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"आदरणीय Mohammed Arif ji  ,नमस्कार ,उत्साहवर्धन करती टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद आपने सही कहा, पहले भी सियासत ने ही देश के टुकड़े किये थे आज भी वही चल रहा है आम जनता की उम्मीदें सिर्फ भटक रहीं हैं इस पार्टी से उस पार्टी तक।सादर।"
Feb 4
Samar kabeer commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"अलका जी आदाब,ग़ज़ल नुमा गीत का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'उम्मीदें अमन की घटाने लगी है' इस मिसरे में सही शब्द है "अम्न" 'के इंसानियत शर्म खाने लगी है' इस मिसरे में 'शर्म खाने' का प्रयोग सही नहीं…"
Feb 4
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"आद0 अलका जी सादर अभिवादन।आज के संदर्भ में बेहतरीन रचना, इस प्रस्तुति पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
Feb 4
Mohammed Arif commented on अलका 'कृष्णांशी''s blog post चुनावी हवा सरसराने लगी है...गीत//अलका 'कृष्णांशी'
"आदरणीया अलका जी आदाब,                         बहुत कटाक्षपूर्ण गीत । हर पंक्ति में तीक्ष्णता का समावेश । आज हर भारतीय के मन में आक्रोश है । गंदी सियासत ने सबकुछ तबाह कर दिया है । दुष्ट…"
Feb 3
अलका 'कृष्णांशी' posted a blog post

चुनावी हवा सरसराने लगी है...//अलका 'कृष्णांशी'

122 122 122 122.सियासत बिसातें बिछाने लगी है चुनावी हवा सरसराने लगी है....जगा फिर से मुद्दा ये पूजा घरों का दिलों में ये नफरत बढ़ाने लगी है। चुनावी हवा......यहाँ बाँट डाला है रंगो में मजहब बगावत की आंधी सताने लगी है।.कहीं नाम चंदन कहीं चाँद दिखता ये लाशें जमीं पर बिछाने लगी है.नही बात होती है अब एकता कीहमारी उमीदें घटाने लगी है .क्युँ इन्सां हुआ जानवर से भी बदतरहमें शर्म ख़ुद से ही आने लगी है .ये क्यों मौन बैठे है आदर्शवादी के मिट्टी वतन की बुलाने लगी है .जहाँ झूठे वादों का बहता है दरिया जमीं बोझ…See More
Feb 3

Profile Information

Gender
Female
City State
New Delhi
Native Place
New Delhi
Profession
house wife

अलका 'कृष्णांशी''s Blog

चुनावी हवा सरसराने लगी है...//अलका 'कृष्णांशी'

122 122 122 122

.

सियासत बिसातें बिछाने लगी है

चुनावी हवा सरसराने लगी है...

.

जगा फिर से मुद्दा ये पूजा घरों का

दिलों में ये नफरत बढ़ाने लगी है।

चुनावी हवा.....

.

यहाँ बाँट डाला है रंगो में मजहब

बगावत की आंधी सताने लगी है।

.

कहीं नाम चंदन कहीं चाँद दिखता

ये लाशें जमीं पर बिछाने लगी है

.

नही बात होती है अब एकता की

हमारी उमीदें घटाने लगी है

.

क्युँ इन्सां हुआ जानवर से भी…

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Posted on February 3, 2018 at 10:30am — 13 Comments

आज़ादी के बाद सभी को, देश बनाना होता है..../ अलका 'कृष्णांशी'

छन्द- तांटक

जात धरम और ऊँच नीच का, भेद मिटाना होता है

आज़ादी के बाद सभी को, देश बनाना होता है

कैसी ये आज़ादी है औ, क्या हम सब ने पाया है

तहस नहस कर डाला सब कुछ ,दिल में जहर उगाया है

फुटपाथों पर फ़टे कम्बलों, में जब बचपन रोता है

तब प्रगति के आसमान की ,धुँध में सब कुछ खोता है

आज़ादी के बाद सभी को, देश बनाना होता है

क्या किसान औ क्या जवान है, सबकी हालत खस्ता है

टैक्स भरें भूखे मर जाएँ ,क्या ये ही इक रस्ता है

बीमारी…

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Posted on January 23, 2018 at 12:54am — 8 Comments

जला पुतला सभी ने पाप की कर दी विदाई है//अलका 'कृष्णांशी'

1222 1222 1222 1222 

.

हमारे सामने सबने कसम गीता की खाई है

जला पुतला सभी ने पाप की कर दी विदाई है

.

सभी ये बेटियाँ बहनें सुरक्षित आज से होंगी

अजी रावण की रावण ने यहां कर दी पिटाई है

.

बड़ी बातें सभी करते नही है राम कोई भी

कहीं हिन्दू कहीं सिख है यहाँ कोई ईसाई है

.

न होती धर्म की सेवा न है संस्कार से नाता

दया बसती नही दिल में दिखावे की भलाई है

.

लगाकर हाथ आँचल को वहीं खींसे…

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Posted on October 1, 2017 at 1:00pm — 12 Comments

श्राद्ध.....लघुकथा..../अलका 'कृष्णांशी'

श्राद्ध

" पर....? हर बार तो आनंद ही ..." दूसरी तरफ की कड़क आवाज़ में बात अधूरी ही रह गई

"जी ,जैसा आप ठीक समझें ,पैरी पै..." बात पूरी होने से पहले ही दूसरी तरफ से मोबाइल कट गया ....

रुआंसी सी प्राप्ति सोफे में ही धंस गई , बंद आँखों से अश्क बह निकले

"८ बरसों में जड़ें भी मिटटी पकड़ चुकी थी ......"

"पर आंगन को फूल देना कितना जरूरी है ये एहसास देवरानी के बेटा पैदा होने के बाद हुआ ....."

"नर्म हवाओं ने तूफान बन कर सब रौंदते हुए रुख जब आनंद की ओर किया तो आनंद…

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Posted on September 19, 2017 at 4:51pm — 6 Comments

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At 11:48pm on August 11, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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"जी ! सुन्दर संशोधित.सादर."
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