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गज़ब करता है अय्यारी.......तरही ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

गज़ब करता है अय्यारी ज़माने से ज़माना भी

हक़ीक़त जो है इस पल में है कल का वो फ़साना भी

न मानो तो सकल संसार है इक शै महज़, लेकिन

हर इक शै ज्ञान का खुद में है अतुलित इक खज़ाना भी

बहुत अलगाव का परचम उठाए फिर लिए यारों

समय कहता है आवश्यक हुआ सबको मिलाना भी

उन्होंने पूछा उसको किस लिए फ़िलवक्त चुप है वो

समंदर हौले से बोला है इक तूफाँ उठाना भी

बहाते नीर हो क्यूँकर, जो बादल से कहा मैंने

भिगो कर वो ज़मीं बोला, बहारों को है लाना भी

यूँ कागज़-स्याही क्यूँ खरचूँ, क्यूँ नीद-ओ-चैन खोए हूँ

जहाँ में याद रह जाएगा कुछ अपना फ़साना भी"

मौलिक-अप्रकाशित

ओबीओ लाइव तरही मुशायरा 106 के लिए लिखी गई लेकिन भूल जाने के कारण वहाँ पेश न हो सकी, आपके सब की महफ़िल में पेश है

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 3, 2019 at 10:18pm

आदरणीय बाऊजी प्रणाम

संशोधन करता हूँ

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 3, 2019 at 10:16pm
आदरणीय सुरेन्द्र जी बहुत बहुत आभार
Comment by Samar kabeer on May 2, 2019 at 11:18am

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब,तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'भिगो कर के ज़मीं बोला, बहारों को है लाना भी'

इस मिसरे में 'के' की जगह "वो" शब्द उचित होगा ।

गिरह नहीं लगी,ऊला में "मैं" और सानी में "अपना" शब्द की वजह से शुतरगुरबा दोष आ गया है ।

Comment by नाथ सोनांचली on May 1, 2019 at 6:21pm

आद0 पंकज कुमार मिश्रा जी सादर अभिवादन। बढ़िया तरही ग़ज़ल कही आपने। शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद कुबुल करें।

कृपया ध्यान दे...

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