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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"
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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Page

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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ये भँव तिरी तो कमान लगे----ग़ज़ल
"आदरणीय बाऊजी इस ग़ज़ल को सुधारता हूँ, शीघ्र ही"
yesterday
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ये भँव तिरी तो कमान लगे----ग़ज़ल
"आद0 पंकज कुमार मिश्र जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का अच्छा प्रयास किया है आपने। बधाई स्वीकार कीजिये। शेष आद0 समर साहब की इस्लाह तो बाकमाल"
Friday
सतविन्द्र कुमार राणा commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँ-----ग़ज़ल
"आदरणीय पंकज भाई उम्दा गजल सृजित हुई। हार्दिक बधाई"
Thursday
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँ-----ग़ज़ल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।"
Thursday
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ये भँव तिरी तो कमान लगे----ग़ज़ल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,बह्र-ए-वाफ़िर में ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन अभी कुछ कमियाँ हैं,बहरहाल बधाई स्वीकार करें । 'ये भँव तिरी तो, कमान लगे तिरे ये नयन, दो बान लगे' ऊला मिसरे में एक ही भँव का ज़िक्र है,दूसरी कहाँ है? सानी मिसरे में…"
Thursday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँ-----ग़ज़ल

122 122 122 12मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँसुकूँ यूँ चुरातीं ग़लत फहमियाँकिसी रिश्ते के दरमियाँ आएँ तोमहब्बत जलातीं ग़लत फहमियाँजहाँ तक भी हो इससे बच के रहोतबाही मचातीं ग़लत फहमियाँअगर गर्व हावी हुआ शक्ति पे ग़लत पथ धरातीं ग़लत फहमियाँउन्हें सच से जिसने न पोषित कियाउन्हीं को चबातीं ग़लत फहमियाँमौलिक अप्रकाशितSee More
Wednesday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ये भँव तिरी तो कमान लगे----ग़ज़ल
"आदरणीय तिवारी जी बहुत आभार"
Wednesday
indravidyavachaspatitiwari commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post ये भँव तिरी तो कमान लगे----ग़ज़ल
"बहुत बढ़िया गजल है। मन प्रसन्न हो गया। "
Jul 10
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

ये भँव तिरी तो कमान लगे----ग़ज़ल

12112 12112ये भँव तिरी तो, कमान लगेतिरे ये नयन, दो बान लगेकहीं न रुके, रमे न कहींइसे तू ही तो, जहान लगेमैं जब से मिला हूँ तुम से, मिरीहरेक अदा जवान लगेअमिय है तिरी अवाज़ सखीतू गीत लगे है गान लगेहै खोजती महज़ तुझे ही निगा'हन और कहीं मिरा धियान लगेमौलिक अप्रकाशितSee More
Jul 9
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मुसीबत जुटाती है ग़लतफ़हमी---ग़ज़ल, पंकज मिश्र
"आदरणीय अजय सर ग़ज़ल पर शुभेच्छा प्रकट करने के लिए बहुत बहुत आभार"
Jul 8
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मुसीबत जुटाती है ग़लतफ़हमी---ग़ज़ल, पंकज मिश्र
"आदरणीय बाऊजी संशोधन कर दिया है मैंने"
Jul 8
Ajay Tiwari commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मुसीबत जुटाती है ग़लतफ़हमी---ग़ज़ल, पंकज मिश्र
"आदरणीय पंकज जी, अरूज़ में सिर्फ़ एक बह्र 'तवील' है जिस में 122 1222 की आवृत्ति होती है. ये अरबी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली बह्र थी लेकिन वहाँ भी ये मुसम्मन (122 1222 x 2) ही इस्तेमाल होती थी. उर्दू में इसका इस्तेमाल ना के बराबर है.…"
Jul 8
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मुसीबत जुटाती है ग़लतफ़हमी---ग़ज़ल, पंकज मिश्र
"अब क्या ख़याल है?"
Jul 7
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मुसीबत जुटाती है ग़लतफ़हमी---ग़ज़ल, पंकज मिश्र
"आदरणीय बाऊजी प्रणाम शुरआत कुछ इसी तरह हुई थी, फिर उर्दू ज्ञान के अभाव के कारण मुझे सन्देह हो गया कि गलतफहमियां अशुद्ध न हो"
Jul 7
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मुसीबत जुटाती है ग़लतफ़हमी---ग़ज़ल, पंकज मिश्र
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'ग़लत फ़हमी' रदीफ़ को अगर बह्र बदल कर यूँ कहें तो इसमें ग़ज़लियत पैदा हो जाएगी:- 122 122 122 12 'मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँ सुकूँ यूँ चुरातीं ग़लत फहमियाँ' किसी…"
Jul 7

Profile Information

Gender
Male
City State
Azamgarh
Native Place
Azamgarh
Profession
Teaching

Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog

मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँ-----ग़ज़ल

122 122 122 12

मुसीबत जुटातीं ग़लत फहमियाँ
सुकूँ यूँ चुरातीं ग़लत फहमियाँ

किसी रिश्ते के दरमियाँ आएँ तो
महब्बत जलातीं ग़लत फहमियाँ

जहाँ तक भी हो इससे बच के रहो
तबाही मचातीं ग़लत फहमियाँ

अगर गर्व हावी हुआ शक्ति पे
ग़लत पथ धरातीं ग़लत फहमियाँ

उन्हें सच से जिसने न पोषित किया
उन्हीं को चबातीं ग़लत फहमियाँ

मौलिक अप्रकाशित

Posted on July 10, 2019 at 10:11pm — 2 Comments

ये भँव तिरी तो कमान लगे----ग़ज़ल

12112 12112

ये भँव तिरी तो, कमान लगे

तिरे ये नयन, दो बान लगे

कहीं न रुके, रमे न कहीं

इसे तू ही तो, जहान लगे

मैं जब से मिला हूँ तुम से, मिरी

हरेक अदा जवान लगे

अमिय है तिरी अवाज़ सखी

तू गीत लगे है गान लगे

है खोजती महज़ तुझे ही निगा'ह

न और कहीं मिरा धियान लगे

मौलिक अप्रकाशित

Posted on July 8, 2019 at 10:55pm — 5 Comments

इच्छाओं का भार नहीं धर----ग़ज़ल

22 22 22 22

इच्छाओं का भार नहीं धर

रिश्तों के नाज़ुक धागों पर

पोषित पुष्पित होंगे रिश्ते

हठ मनमानी त्याग दिया कर

ऊर्जा से परिपूर्ण रहेगा

खुद में शक्ति सहन की तू भर

करनी का फल सन्तति भोगे

सो कुकर्म से ए मानव डर

देख निगाहें घुमा-फिरा के

कौन नहीं फल भोगे यहाँ पर

अब वैज्ञानिक भी कहते हैं

पाप-प्रलय-भय तू मन में भर

गा कर, लिख कर, यूँ ही पंकज

हर मन से अवसाद सदा…

Continue

Posted on June 1, 2019 at 12:46pm

सच क्या है कोई पूछे, मैं श्याम बता दूँगा-----ग़ज़ल पंकज मिश्र

221 1222 221 1222

किस्मत की लकीरों पर खुश-रंग चढ़ा दूँगा

मैं दर्द के सागर में पंकज को खिला दूँगा

ज्यादा का नहीं केवल छोटा सा है इक दावा

ग़र वक्त दो तुम को मैं खुद तुम से मिला दूँगा

कुछ और भले जग को दे पाऊँ नहीं लेकिन

जीने का सलीका मैं अंदाज़ सिखा दूँगा

कंक्रीट की बस्ती में मन घुटता है रोता है

वादा है मैं बागों का इक शह्र बसा दूँगा

आभास की बस्ती है, अहसास पे जीती है

जन जन के मनस में मैं यह मंत्र जगा…

Continue

Posted on May 27, 2019 at 12:43am — 6 Comments

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At 4:23pm on February 28, 2016, kanta roy said…

स्वागत आपका तहेदिल आदरणीय पंकज जी।  

At 6:34pm on October 26, 2015, kanta roy said…

महीने के सक्रीय सदस्य चुने जाने के इस गौरव पल के  लिए ढेरों बधाई आपको आदरणीय पंकज जी।  

At 11:27pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

पंकज कुमार मिश्रा 'वात्स्यायन' जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:35pm on August 7, 2015, Ravi Shukla said…

स्‍वागत है पंकज जी आपका

At 11:39am on July 26, 2015, Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" said…
सभी लोगों का सादर अभिवादन
 
 
 

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