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अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....

प्रिय सदस्य गण / प्रबंधन समिति के सदस्य गण / ओ बी ओ के सभी पाठक एवं शुभचिंतक गण

सादर प्रणाम

आप सभी अवगत हैं कि ओ बी ओ वर्ष 2010 से अनवरत चलते हुए 16 वर्ष से अधिक समय व्यतीत कर चुका है, जो प्रारंभ होता है उसका कभी न कभी अंत भी होता है. 

बहुत ही दुःख और कष्ट के साथ अब ओबीओ को बंद करने का निर्णय लेना पड़ रहा है जिसके पीछे महत्वपूर्ण कारक निम्न हैं...

  • सदस्यों का नगण्य उपस्थिति
  • प्रबंधन सदस्यों के पास समय की कमी
  • संचालन शुल्क में अत्यधिक वृद्धि
  • मासिक संचालन व्यय का संस्थापक द्वारा अकेले अब और वहन करने में असमर्थता
  • अन्यान्य

अतः आप सभी से अनुरोध है कि दिनांक 31 मई 2026 के पूर्व आप अपने साहित्यिक सामग्रियों को कॉपी/पेस्ट कर अपने पास संरक्षित कर लें. 

सादर

ई.गणेश जी बागी

संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक

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ओ बी ओ जैसे मंच की ये स्थिति अत्यंत कष्टप्रद है। अपने स्वास्थ्य और पारिवारिक विवशताओं , व्यस्ततओं के चलते मेरी उपस्थिति भी लगभग नगण्य है। 

इसलिए मंच की वर्तमान परिस्थिति के लिए मेरी भी जबाबदेही है। 
ज्यादा क्या कहूँ लेकिन मंच को चलाये रखने के लिए वरिष्ठजन जो भी निर्णय लेंगे मैं उनके साथ हूँ। 

प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो सकता है अनेक सदस्य और साइट के उपयोगकर्ता केवल कैलंडर देखने में अपेक्षा में आकर यूँ ही लौटे जा रहें हों। 

जानकारी होने पर वो अपनी रचनाएं भी ले सकेंगें और इस महत्वपूर्ण चर्चा में भाग भी। 

आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता है। एक जीवंत समुदाय को बचाने के लिए आपकी यह पहल और स्वैच्छिक जिम्मेदारी लेने का जज्बा वाकई काबिले-तारीफ है।आपके द्वारा उठाए गए बिंदु अत्यंत व्यावहारिक और समाधानोन्मुखी हैं। कम उपस्थिति अक्सर उत्साह की कमी का परिणाम होती है। मार्गदर्शकों की सक्रियता और एक निश्चित कैलेंडर वास्तव में नई ऊर्जा फूँक सकते हैं। कार्यभार का विकेंद्रीकरण प्रबंधन के लिए एक बहुत बड़ा समाधान होगा। यदि आपके जैसे समर्पित सदस्य संचालन और कैलेंडर की जिम्मेदारी संभालते हैं, तो प्रबंधन का बोझ काफी कम हो जाएगा। क्राउड-फंडिंग या सदस्यों के साझा सहयोग का सुझाव आज के समय में कई डिजिटल मंचों को जीवित रखे हुए है। यदि व्यय का विवरण पर विचार किया जाए, तो सामूहिक योगदान से इस समस्या का स्थायी समाधान निकल सकता है।

आदरणीय आशीष यादव जी, आपकी बातों में पुराने दिनों की वो उमंग और मंच के प्रति गहरी निष्ठा साफ़ झलक रही है। एक पुराने सदस्य होने के नाते आपका यह दर्द और सुझाव दोनों ही बहुत कीमती हैं। 16 साल का सफ़र कोई छोटा समय नहीं होता, और इसे बचाने के लिए वरिष्ठ जनों का साथ आना ही सबसे प्रभावी रास्ता है। इस स्थिति को संभालने के लिए हम कुछ ठोस कदम उठा सकते हैं। वरिष्ठ सदस्यों की बैठक आयोजित की जाए, जहाँ केवल भविष्य की रणनीति पर बात हो। सक्रिय सदस्यों से लिखित में 3-3 मुख्य सुझाव मांगे जाएं कि वे मंच को दोबारा पटरी पर लाने के लिए क्या कर सकते हैं। एक पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए जहाँ सदस्य स्वेच्छा से मासिक या वार्षिक योगदान दे सकें, ताकि संस्थापक पर अकेले बोझ न पड़े।

आदरणीय सौरभ सर, आपकी यह टिप्पणी स्थिति की एक अत्यंत गंभीर और यथार्थवादी तस्वीर पेश करती है। यह सच है कि केवल भावनाओं के सहारे किसी संस्था या मंच को अनंत काल तक नहीं चलाया जा सकता; उसके लिए एक ठोस प्रशासनिक और व्यावहारिक ढांचे की आवश्यकता होती है। जैसा कि आपने संकेत दिया है और हम सबने महसूस भी किया है, आंतरिक चर्चाओं और फौरी समाधानों का दौर अब शायद अपनी सीमा समाप्त कर चुका है। अब प्रश्न केवल मंच को बचाने का नहीं, बल्कि उसे पुनर्जीवित करने का है। आपके कहे से कुछ प्रमुख यथार्थ सामने आते हैं। जैसे निरंतरता का अभाव अर्थात जब तक सदस्यों की उपस्थिति और भागीदारी स्वैच्छिक और सामयिक बनी रहेगी, तब तक स्थायित्व आना कठिन है। संसाधनों की सीमा हुआ करती है। भावनाएं प्रेरणा दे सकती हैं, लेकिन तकनीकी प्रबंधन, सर्वर का खर्च और समय का निवेश व्यावहारिक संसाधन मांगते हैं।

आदरणीय तिलकराज सर आपका सुझाव बेहद व्यावहारिक और तकनीकी रूप से सटीक है। आपका एक डेवलपर के रूप सेवाएं निःशुल्क देने का प्रस्ताव इस संकट में सबसे बड़ी उम्मीद है। यदि हम इसे होस्टिंग मॉडल पर ले आते हैं, तो संचालन का स्वरूप काफी सरल हो जाएगा। होस्टिंग मॉडल से व्यय का वहन करना हमारे लिए मुश्किल नहीं होगा। 16 वर्षों का संचित ज्ञान और रचनाएँ नष्ट होने से बच जाएँगी, जो हिंदी साहित्य की एक डिजिटल धरोहर है। अखाड़ेबाजी और अनावश्यक विवादों को पीछे छोड़कर, मंच को फिर से उसके सीखने-सिखाने के मूल उद्देश्य पर केंद्रित किया जा सकेगा।वित्तीय सहयोग पर सदस्यों की प्रतिक्रिया अनिश्चित हो सकती है, लेकिन जब उन्हें एक स्पष्ट और पारदर्शी कॉस्ट मॉडल (जैसे वार्षिक होस्टिंग ब्रेकअप) दिखाया जाएगा, तो सहयोग मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

आदरणीय अशोक रक्ताले सर, आपके कथन ने अंतस को छुआ है जो केवल एक रचनाकार ही समझ सकता है। "रचनाएं उठा भी लें तो स्मृतियों का क्या?" — यह पंक्ति उस गहरे लगाव को दर्शाती है जो एक लेखक का अपने शुरुआती मंच से होता है।आपकी टिप्पणी से जो व्यावहारिक समाधान निकलकर आ रहे हैं। यह एक कड़वा लेकिन जरूरी सच है। निष्क्रिय सदस्यों की जगह उन ऊर्जावान साथियों को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए जो वर्तमान में समय देने को तैयार हैं। जैसा कि आदरणीय तिलकराज सर ने होस्टिंग मॉडल की बात कही, उससे न केवल रचनाएँ बल्कि वर्षों की वे अनमोल टिप्पणियाँ और यादें भी सुरक्षित रह सकेंगी। आपने सही कहा, आदरणीय बागी सर के धैर्य और उदारता की भी एक सीमा है। यदि अब सदस्य मिलकर इस वित्तीय भार को साझा करते हैं, तो यह मंच के प्रति उनकी सच्ची निष्ठा होगी।

आदरणीय निलेश भाई, आदरणीया प्रतिभा जी, आदरणीय उस्मानी जी, आदरणीय दयाराम मेठानी जी, आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदि के सुझाव सोलह वर्षों की इस धरोहर को सहेजने के लिए आपका यह अंतिम प्रयास का आह्वान प्रबंधन और अन्य सदस्यों के लिए विचारणीय है।

और पूरी हिम्मत बटोरकर ...

आदरणीय गणेश जी बागी सर,
सादर प्रणाम।

ओबीओ पर मंच को लेकर आपका संदेश जब से देखा है विचलित हूँ। वर्तमान परिस्थितियों की सूचना ने मन को बहुत विचलित और भावुक कर दिया है। बहुत बार कुछ लिखने के लिए पोस्ट पर आया लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया। ओबीओ केवल एक साहित्यिक मंच नहीं है, बल्कि हम जैसे हज़ारों रचनाकारों के लिए एक संस्कारशाला और आत्मीय परिवार रहा है। पिछले 16 वर्षों की यह गौरवशाली साहित्यिक यात्रा, जिसे आपने अपने रक्त-पसीने और अटूट धैर्य से सींचा है, आज एक अत्यंत कठिन मोड़ पर खड़ी है।सच कहूँ तो, इस सूचना को सुनने के बाद मन इतना भारी है कि कुछ कहते नहीं बन रहा। शब्द साथ नहीं दे रहे हैं क्योंकि इन 16 वर्षों की अनगिनत यादें, स्मृतियाँ और यहाँ से मिला मार्गदर्शन आँखों के सामने तैर रहा है। शायद इसीलिए अन्य सदस्यों की टिप्पणी का प्रत्युत्तर लिखने बैठ गया ताकि आगे कुछ लिख सकूं।

किंतु, भावनाओं के इस आवेग में समझता हूँ कि उस धरातल की सच्चाई को भी नहीं भूलना चाहिए, जिसका जिक्र आपने और अन्य वरिष्ठ सदस्यों ने किया है।मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि केवल भावुकता से व्यवस्थाएँ नहीं चलतीं। यदि इस विशाल और बहुमूल्य साहित्यिक धरोहर को सुरक्षित रखना है, तो हमें अब व्यवहारिक और ठोस समाधानों की ओर बढ़ना ही होगा। ओबीओ के इस अनमोल संग्रह को सहेजने और मंच को पुनर्जीवित करने के लिए जो भी सहयोग अपेक्षित होगा—चाहे वह आर्थिक हो, तकनीकी हो या प्रशासनिक—मैं उसके लिए पूरी निष्ठा के साथ तत्पर हूँ। मैं अपनी सेवाएं और सहयोग अर्पित करने के लिए प्रस्तुत हूँ।मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि इसे अंत न मानकर एक नया अध्याय माना जाए। हम सभी सक्रिय (थोड़े बहुत) सदस्य मिलकर इस बोझ को साझा करने के लिए तैयार हैं। कृपया आप हमें मार्ग दिखाएँ कि हम इस विरासत को लुप्त होने से बचाने के लिए सामूहिक रूप से क्या कर सकते हैं।16 साल की यह तपस्या व्यर्थ नहीं जानी चाहिए।

इस मंच पर सक्रीय न रह पाना मेरे लिए भी कष्टकारी रहा है लेकिन अब 'ओबीओ को बंद करने का निर्णय' मुझे अपराधबोध से भर रहा है। मंच पर सक्रियता में कमी के मेरे व्यक्तिगत कारण और विवशता है जिसका यहाँ उल्लेख करना उचित नहीं है। इस परिवार को बंद होने से बचाने के लिए जो भी आवश्यक है, मैं करने का पूरा प्रयास करूँगा। फ़िलहाल में 16 वर्षों से संचित इस धरोहर को बचाने के लिए निवेदन कर रहा हूँ-
1. एक वित्तीय कोष बनाया जाये जिसमें सभी सदस्य स्वेच्छा से सहयोग राशि जमा कर सकते है जो ओबीओ के होस्टिंग आदि खर्च हेतु होगी। इसके लिए whatsapp या ओबीओ मुख्य पटल पर बारकोड/बैंक खाते की जानकारी दी जा सकती है।
2. कार्यकारिणी में बदलाव कर नए उर्जावान सदस्यों को अवसर दिया जा सकता है।
3. यदि फिर भी सञ्चालन संभव न हो सके तो साइट को केवल रीड-ओनली मोड में रखा जाए अर्थात पुराने कंटेंट को रहने दिया जाए और नया पोस्टिंग बंद कर दी जाए। साइट को लाइव रखने के लिए मुख्य खर्च होस्टिंग और डोमेन रिन्यूअल मदों में होगा।

ओबीओ परिवार के लिए वास्तव में यह एक भावुक और कठिन क्षण है। 16 वर्षों की यह साहित्यिक यात्रा बहुत गौरवशाली रही है। ओबीओ के इतने विशाल और बहुमूल्य साहित्यिक संग्रह को सुरक्षित करने के लिए जो भी सहयोग अपेक्षित होगा, मैं तत्पर रहूँगा।
और कुछ कहते नहीं बन रहा है, कह नहीं पा रहा हूँ। भावुक हूँ इसलिए भी अधिक नहीं कहना चाहता। क्योंकि अब व्यवहारिक हल खोजने होंगे।

सादर। 

आदरणीय बाग़ी जी एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यगण !

बहुत दुखद है कि स्थिथि बंद करने तक आ गयी है. आगे क्या मार्ग है इस पर चर्चा से पहले यह तय होना आवश्यक है कि यह स्थिति क्यूँ बनी है.
सभी नए रचनाकार अथवा स्थपित रचनाकार अपनी रचनाओं पर दाद चाहते हैं और सकारत्मक तरीके से त्रुटी सुधार और वरिष्ठों का अनुमोदन चाहते हैं.
वर्तमान में कार्यकारिणी के सदस्य हैं

श्री बाग़ी जी - लगभग निष्क्रीय, केवल द्वार खोलने बंद करने तक सीमित.    
योगराज सर- निष्क्रीय - लापता 
सौरभ सर- अपने आयोजन में सक्रीय, अन्य  आयोजनों में लगभग निष्क्रीय 
राणा प्रताप जी और प्राची जी - शायद २०१६ में आखिरी बार देखे गए थे.
राजेश कुमारी जी - पिछले ५ वर्षों से नदारद 
शरदिंदु जी और अरुण जी - मैंने पिछले 10 वर्षों में कोई टिप्पणी पढ़ी हो, याद नहीं पड़ता.

गिरिराज जी, शिज्जू भाई, मिथिलेश भाई - भोपाल चैप्टर बनने के  बाद से लगातार सुप्त . शायद साहित्यिक अभिलाषा वहीँ पूर्ण जो जा रही हो.
साथ ही वीनस जी, समर सर भी मंच से दूर हैं. 
तिलकराज सर भी ज़िम्मेदारी दिए जाने के बाद से सक्रीय हैं.  

कोई बुरा न माने लेकिन जब तक आप सब सक्रीय थे तब तक मंच पर रौनक थी ... 

मैं अन्य किसी का नहीं कहता लेकिन मैं जब ग़ज़ल पोस्ट करता हूँ तो मेरी अभिलाषा आप सब से अनुमोदन पाने की रहती है. लगातार उपेक्षा में मैंने भी मंच पर आना कम कर दिया है.

पतन के इन कारणों को स्वीकार करने के बाद अब क्या किया जाए?

1) कार्यकारिणी में आमूल-चूल परिवर्तन
2) मासिक की जगह साप्ताहिक आयोजन- हर आयोजन का अध्यक्ष कोई नया, परिपक्व और सक्रीय सदस्य हो 
3) सदस्यों के लिए न्यूनतम मासिक शुल्क 
4) You Tube चैनल पर भी एक मासिक आयोजन जिस में रचनाकार लाइव रचनापाठ करें. YT monetize हो जाए तो धन की समस्या हल हो सकती है और मंच रेख्ता की तरह विस्तार प् सकता है.
5) आयोजनों का FB लाइव 
6) श्रेष्ठ रचनाओं का  साप्ताहिक सम्मान/ मासिक सम्मान 

सारे काम एक साथ नहीं हो सकते अत: किन्हीं आसान दो-तीन से शुरुआत की जा सकती है.

सादर 
  

 

आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.  

 

करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर प्रवाह जनित निरापदता के लिए ये अत्यंतावश्यक हैं. प्रबन्धन के सदस्यों की उपथिति पर आपकी निर्मम टिप्पणी यथास्थिति की मुखर विवेचना है. सही है, जो नितांत अपना होता है, अतुकान्तता की स्थिति में उसी के प्रति मन में क्षोभ उपजता है. ओबीओ के सदस्य तो नितांत अपने हैं. आपकी टिप्पणी को मैं उसी तौर पर स्वीकार कर रहा हूँ. 

 

साहब, यूँही कोई बेवफा नहीं होता.

कार्यकारिणी के कतिपय सदस्यों तथा कुछ वरिष्ठ सदस्यों, जिनसे पटल को महती अपेक्षाएँ थीं,  के ऊपर मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ. कई हैं, जिनके लिए उनके पैर पटल रूपी जूते से बहुत बड़े हो गये हैं. इस बिन्दु पर मैं पहले ही बहुत कुछ बोल चुका हूँ. उस्तादों-गुरुओं को लेकर मैं वस्तुतः कुछ नहीं कह सकता, कि, मठाधीशी का नशा होता ही ऐसा है. 

 

भाई, वह तो गुजरे जमाने की बात हो गयी, और वे जमाने कब के गुजर गये, जब व्यक्तिगत मोक्ष तथा व्यक्तिगत परम-उत्थान की सान्द्र अपेक्षा के साथ रामकृष्ण के पास गये नरेन्द्र को लगभग झिड़कते हुये, दुत्कारते हुये उन्होंने कहा था, ’छि: छि:.. क्या रे ! क्या तू इतना स्वार्थी है, नरेन्द्र ? कि अपने हजारों-हजार भाई-बहनों की विपन्न दशा को देखते-समझते हुए भी तू अपने उत्थान, अपने मोक्ष, अपनी प्रतिष्ठा की बात कर लेता है? जा, पहले ’माँ’ की सेवा कर !’

 

रामकृष्ण परमहंस की झिड़की और दुत्कार को सुनने के कुछ समय बाद नरेन्द्र परिव्राजक हो गये. उनको ’अपनी माँ’ को समझने और ढूँढने में ही तीन वर्ष व्यतीत हो गये. परिव्राजक नरेन्द्र का परिचय इस तपस-अन्वेषण से परिष्कृत हो कर स्वामी विवेकानन्द हो गया. और जब बात स्पष्ट हुई तो ’भारत माता’ अपने उस अनोखे ज्वाजल्यमान पुत्र को लेकर मुग्ध थी. 

इससे अधिक मैं और क्या कह सकता हूँ ? बुद्धिमान को इशारा ही काफी होता है. 

  

वस्तुतः, मंच पर प्रबन्धन अथवा कार्यकारिणी का कोई सदस्य यदि नियमित नहीं हो पा रहा है, तो मूल कारण समझने होंगे. लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि कारण चाहे जितने भी प्रभावी हों, उन्हें जान कर पटल का क्या ही भला होना है ?

 

आप (सभी) विश्वास करें, पटल की सुचारू गति बनाये रखने तथा वित्तीय व्यवस्था को लेकर पर्दे के पीछे कई-कई-कई बार प्रबन्धन के सदस्यों के बीच सामूहिक वार्तालाप होते रहे हैं. व्यवस्था बनती रही है. परन्तु, प्रबन्धन के सभी सदस्य अपने-अपने जीवन में बेतुके तौर पर व्यस्त हैं. आज स्थिति यह है, कि प्रबन्धन के सभी सदस्यों के ऊपर व्यावसायिक-पारिवारिक दायित्व का कई गुणा भार बढ़ चुका है. जिस सहजता से पटल के लिए एक समय समय निकल जाया करता था, आज वह उस तरह से संभव नहीं हो पा रहा है. 

 

इसका संदर्भ लेते हुए, वस्तुतः यह एक उचित पहल होगी कि यदि पटल के सातत्य को बनाये रखना है, तो वर्तमान कार्यकारिणी को भंग कर नई कार्यकारिणी का गठन किया जाय. आर्थिकी पर भी विषद चर्चा हो. हालाँकि इसके कई घोषित-अघोषित पहलू भी हैं. 

खैर, चर्चा चलती है, संवाद होता है, तो बात बनती है. इस बार तो चर्चा खुल कर, सबके साथ, हो रही है. 

शुभातिशुभ

अब, जबकि यह लगभग स्पष्ट हो ही चुका है कि OBO की आगे चलने की संभावना नगण्य है और प्रबंधन इसे ऑफलाइन करने का मन बना ही चुका है तो मैं एक विनती करना चाहता हूँ जिससे इस मंच का कुछ एहसास और कुछ कार्य आगे भी चलता रहे। 

सदस्यों का एक वाहटसपप ग्रुप बनाया जा सके जहाँ सीखने-सिखाने का यह क्रम चलता रहे तो उत्तम रहेगा। 

अग्रिम धन्यवाद सहित 

ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की विनती से मैं भी सहमत हूॅं। अगर कोई व्हाटसैप ग्रुप बने तो सीखने सिखाने का यह सिलसिला जारी रह पाएगा।
बहुत बहुत धन्यवाद।

अगर आप यों घबरा कर मैदान छोड़ देंगे तो जिन्होने एक जुट होकर षड़यन्त्र किया है वे अपनी जीत मानेंगे। किसी षड़यंत्र का शिकार होकर मैदान मत छोडिये। इतने सारे लोग आपके साथ है फिर भी आप हिम्मत हार देंगे तो यह किसी संगठन के लिए उचित नहीं है। आप हार कर अपने विरोधियों को जीत का अवसर देना चाहते है तो इसे दुर्भाग्य की कहा जायेगा। उठो जागो आज चार है तो कल चालीस हो जायेंगे। कायर मत बनिये। हिम्मत और हौसले से आगे बढ़िये और विरोधियो को मात दीजिए।
— दयाराम मेठानी

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