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Dayaram Methani
  • Male
  • Bhilwara - rajsthan
  • India
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  • Samar kabeer
 

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Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"आदरणीय ऋचा यादव जी, तरही मिसरे पर अच्छी ग़ज़ल कही है आपने। इस हेतु हार्दिक बधाई।"
Aug 29
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"आदरणीय अमीरुद्दीन ‘अमीर’ जी, सुंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
Aug 29
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"रिचा यादव जी, प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद एवं हार्दिक आभार।"
Aug 29
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"आदरणीय अमीरुद्दीन ‘अमीर’ जी, प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद एवं हार्दिक आभार।"
Aug 29
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, ग़ज़ल आपकी अच्छी लगी किंतु मतला स्पष्ट नहीं लगा। आप खुद ही देख लें -अभी छोड़ता हूँ मनाने लगेगेअपने ही मुझको सताने लगेंगेइसमें आप क्या छोड़ रहें है स्पष्ट नहीं। दूसरी पंक्ति में भी अपने ही मुझे सताने लगेंगे मिसरा ऊला से मेल खाती…"
Aug 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, तरही मिसरे पर सुंदर ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई आपको। दूसरे शेर में बुझे घाव शब्द मुझे कुछ जचा नहीं क्योंकि घाव बुझता नहीं वरन् भरता है या हरा होता है।"
Aug 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, पोस्ट पर आकर प्रोत्साहन देने एवं सुझाव के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार।"
Aug 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, पोस्ट पर टिप्प्णी कर प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Aug 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-146
"तरही गज़ल122  122  122  122 कहानी पुरानी भुलाने लगेंगेतुझे भूल खुद को मिटाने लगेंगे न शिकवा न कोई गिला है किसी सेकहीं अब नया घर बसाने लगेंगे कि मत पूछ हालात क्या है हमारेकहानी वफा की बताने लगेंगे अमीरी गरीबी मिटा कर जियें हमसभी…"
Aug 27
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-142
"आदरणीय प्रतिभा पांडे जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार।"
Aug 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-142
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार।"
Aug 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-142
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, सुंदर सृजन हेतु हार्दिक बधाई।"
Aug 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-142
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी, सुंदर दोहे लिखे। हार्दिक बधाई।"
Aug 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-142
"आदरणीय प्रतिभा पांडे जी, सुंदर कुण्डलिया छंद सृजन के लिए हार्दिक बधाई।"
Aug 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-142
"आदरणीय उषा अवस्थी जी, सुंदर सृजन हेतु बहुत बहुत बधाई।"
Aug 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-142
"गीतिका ---------जयहिन्द जयहिन्द का नारा, हम तो सदा गायेंगे,आजादी का अमृत महोत्सव, नगर डगर मनायेंगे। हर कार्य हमारा हो उत्तम, बने आत्म निर्भर अब हम, तिरंगा गगन में खुशियों का, शान से लहरायेंगे। विकसित हो देश सदा अपना, याद हमे यह रखना है,शान तिरंगे…"
Aug 14

Profile Information

Gender
Male
City State
BHILWARA
Native Place
BHILWARA
Profession
journlist and writer
About me
I like to read and write kavita, gazal, short stories and artical.

Dayaram Methani's Blog

गज़ल

गज़ल

2122 2122 2122 212

आजकल हर बात पर लड़ने लगा है आदमी,

क्रोध के साये तले पलने लगा है आदमी।

चाह झूठी शान की अब बढ़ गई है बहुत ही,

इस लिये बेचैन सा रहने लगा है आदमी।

आग हिंसा की बहुत झुलसा रही है देश को,

खूब धोखा दल बदल करने लगा है आदमी।

धन कमाया पर बचाया कुछ नहीं अपने लिये,

अब बुढ़ापे में छटपटाने लगा है आदमी।

जिन्दगी भर झगड़ने से क्या मिला इंसान को,

देख ’’मेठानी‘‘ बहुत रोने लगा है आदमी।

मौलिक…

Continue

Posted on January 30, 2022 at 12:16pm — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2



ज़िन्दगी में हर कदम तेरा सहारा हूँ

नाव हो मझधार तो तेरा किनारा हूँ

तुम भटक जाओ अगर अनजान राहों में

पथ दिखाने को तुम्हें रौशन सितारा हूँ

ज़िन्दगी का खेल खेलो तुम निडरता से

हर सफलता के लिए मैं ही इशारा हूँ

राह जीने की सही तुमको दिखाऊंगा

ज़िन्दगी के सब अनुभवों का पिटारा हूँ

साथ क्यों दूं मैं तुम्हारा सोच मत ऐसा

अंश तुम मेरे पिता मैं ही तुम्हारा हूँ

- दयाराम मेठानी…

Continue

Posted on November 6, 2021 at 10:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल

 2122 2122 2122 212

नाव है मझधार में नाविक नशे में चूर है

सांझ है होने लगी मंजिल नज़र से दूर है

संकटों से आदमी क्या देव भी बचते नहीं

वक्त के आगे सभी होते यहां मजबूर है

जिन्दगी की कशमकश में जीना’ जिसको आ गया

यों समझ लो हौसलों से वो बहुत भरपूर है

दोष है अपना समय के साथ चल पाये नहीं

बंद मुट्ठी से फिसलना वक्त का दस्तूर है

हाल ‘‘मेठानी’’ बतायंे क्या किसी को अब यहां

आदमी सुनता नहीं अब हो गया मगरूर…

Continue

Posted on August 27, 2019 at 10:00pm — 2 Comments

गज़ल सीख लो

2122 2122 212

दर्द को दिल में दबाना सीख लो

ज़िन्दगी में मुस्कराना सीख लो

आंख से आंसू बहाना छोड़िये

हर मुसीबत को भगाना सीख लो

ज़िन्दगी है खेल, खेलो शान से

खेल में खुद को जिताना सीख लो

फूल को दुनिया मसल कर फैंकती

खुद को कांटों सा दिखाना सीख लो

छोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी

कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लो

थी जवानी जोश भी था स्वप्न भी

दिन पुराने अब भुलाना सीख लो

कौन…

Continue

Posted on July 4, 2019 at 9:30pm — 8 Comments

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At 10:09pm on May 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय दयाराम मेथानि जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया जनाब
 
 
 

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