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Dayaram Methani
  • Male
  • Bhilwara - rajsthan
  • India
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Dayaram Methani's blog post झूठ का व्यापार - ग़ज़ल
"वाह आदरणीय बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है.."
Apr 13
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-102
"आदरणीय आसिफ ज़ैदी साहब, प्रदत्त विषय पर बहुत सुंदर रचना। बधाई स्वीकार करें।"
Apr 12
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post झूठ का व्यापार - ग़ज़ल
" बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय अनामिका घातक जी।"
Apr 9
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post झूठ का व्यापार - ग़ज़ल
"प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय तेजवीर सिंह जी।"
Apr 9
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post झूठ का व्यापार - ग़ज़ल
"प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय समर कबीर जी।"
Apr 9
Samar kabeer commented on Dayaram Methani's blog post झूठ का व्यापार - ग़ज़ल
"जनाब दयाराम मेठानी जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Apr 9
TEJ VEER SINGH commented on Dayaram Methani's blog post झूठ का व्यापार - ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय दयाराम जी।बेहतरीन गज़ल। बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकरकाबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल"
Apr 8
anamika ghatak commented on Dayaram Methani's blog post झूठ का व्यापार - ग़ज़ल
"अत्यंत सुंदर लिखा है। सच्चाई बयाँ किया है आपने"
Apr 8
Dayaram Methani posted a blog post

झूठ का व्यापार - ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212झूठ का व्यापार बढ़ता जा रहा है आजकल, और हर इक पर नशा ये छा रहा है आजकलहै लड़ाई का नजारा हर तरफ देखें जिधर,आदमी ही आदमी को खा रहा है आजकलइस प्रगति के नाम पर ही मिट रहे संस्कार सबझूठ को हर आदमी अपना रहा है आजकलबाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकरकाबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकलजाग ‘मेठानी’ बचायें आग से अपना चमन नित नया जालिम जलाने आ रहा है आजकल( मौलिक एवं अप्रकाशित ) - दयाराम मेठानीSee More
Apr 8
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Dayaram Methani's blog post ग़ज़ल
"अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय.."
Mar 20
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post ग़ज़ल
"प्राेत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सुशील सरना जी।"
Mar 16
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post ग़ज़ल
"प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय समर कबीर जी। आपका सुझाव कि मेहनत नहीं मिहनत होना चाहिए इस बारे में अवश्य विचार कर भविष्य में ध्यान रखूंगा। सादर।"
Mar 16
Samar kabeer commented on Dayaram Methani's blog post ग़ज़ल
"जनाब दयाराम मेठानी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'मेहनत से आप अपना जी चुराया ना करो' इस मिसरे में 'मेहनत' शब्द ग़लत है,सहीह शब्द है "मिहनत"22 देखें ।"
Mar 16
Sushil Sarna commented on Dayaram Methani's blog post ग़ज़ल
"बहुत सुंदर आदरणीय ... खूबसूरत अशआर से सजी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई।"
Mar 15
Dayaram Methani posted a blog post

ग़ज़ल

ग़ज़लमापनी: 2122 2122 2122 212आंख से आंसू कभी यों ही बहाया ना करोदर्द दिल का भी जमाने को बताया ना करोहर किसी को मुफ्त में कोई खुशी मिलती नहींमेहनत से आप अपना जी चुराया ना करोजिन्दगी ले जब परीक्षा हौसलों से काम लोआपदा के सामने खुद को झुकाया ना करोहैं सफलता और नाकामी समय का खेल ही लक्ष्य से अपनी नजर को तो हटाया ना करोजीत लेंगे जिन्दगी की जंग ’मेठानी‘ सुनोतुम निराशा को कभी मन में बसाया ना करो( मौलिक एवं अप्रकाशित )- दयाराम मेठानीSee More
Mar 15
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-47
"आदरणीय मिथलेश जी, आपने समस्या तो सही उठाई लेकिन उसका समाधान व्यवहारिक नहीं लगता। अपने हम उम्र दोस्त के साथ अपने बेटी का ब्याह करना कुछ गले नहीं उतरता। यह समाधान कोई समाधान नहीं है। समाधान वो होना चाहिए जो किसी को राह दिखाये। बुरा मत मानियेगा। मेरी…"
Feb 27

Profile Information

Gender
Male
City State
BHILWARA
Native Place
BHILWARA
Profession
journlist and writer
About me
I like to read and write kavita, gazal, short stories and artical.

Dayaram Methani's Blog

झूठ का व्यापार - ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

झूठ का व्यापार बढ़ता जा रहा है आजकल,

और हर इक पर नशा ये छा रहा है आजकल

है लड़ाई का नजारा हर तरफ देखें जिधर,

आदमी ही आदमी को खा रहा है आजकल

इस प्रगति के नाम पर ही मिट रहे संस्कार सब

झूठ को हर आदमी अपना रहा है आजकल

बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकर

काबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल

जाग ‘मेठानी’ बचायें आग से अपना चमन

नित नया जालिम जलाने आ रहा है…

Continue

Posted on April 8, 2019 at 2:01pm — 7 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

आंख से आंसू कभी यों ही बहाया ना करो

दर्द दिल का भी जमाने को बताया ना करो

हर किसी को मुफ्त में कोई खुशी मिलती नहीं

मेहनत से आप अपना जी चुराया ना करो

जिन्दगी ले जब परीक्षा हौसलों से काम लो

आपदा के सामने खुद को झुकाया ना करो

हैं सफलता और नाकामी समय का खेल ही 

लक्ष्य से अपनी नजर को तो हटाया ना करो

जीत लेंगे जिन्दगी की जंग ’मेठानी‘ सुनो

तुम निराशा को कभी मन में बसाया ना…

Continue

Posted on March 15, 2019 at 1:14pm — 5 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122

जख्म हम अपने छिपाने में लगे है,

खुद को’ हम पत्थर बनाने में लगे है।

पूछ मत हमको हुआ क्या आजकल ये,

दर्द दिल का हम भुलाने में लगे है।

कौन देता है सहारा अब यहां पर,

बोझ अपना खुद उठाने में लगे है।

दिल जगत का बेरहम चट्टान जैसा,

फिर भी’ पत्थर को मनाने में लगे है।

देश हित की बात ‘‘मेठानी’’ करे क्या,

द्रोहियों को हम बचाने में लगे है।

( मौलिक एवं अप्रकाशित)

- दयाराम…

Continue

Posted on February 19, 2019 at 10:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल गांव

2122 2122 2122

.
गांव भी अब तो शहर बनने लगा है
प्यार औ सद्भाव भी घटने लगा है

खुल गई है खूब शिक्षा की दुकानें
ज्ञान भी अब दाम पर बिकने लगा है

हो गये है लोग बैरी अब यहां भी
खून सड़कों पर बहुत बहने लगा है

गांव के हर मोड़ पर टकराव है अब
खेत औ खलियान तक जलने लगा है

सोच ’‘मेठानी‘’ हुआ है, क्या यहां पर
जो कभी बोया वही उगने लगा है


( मौलिक एवं अप्रकाशित )
- दयाराम मेठानी

Posted on January 23, 2019 at 12:00pm — 21 Comments

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