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Dayaram Methani
  • Male
  • Bhilwara - rajsthan
  • India
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Dayaram Methani's Page

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Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"धन्यवाद रिचा यादव जी।"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय दण्डपाणि नाहक जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, सुंदर ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय रिचा यादव जी, बहुत अच्छी गज़ल हुई है। बधाई स्वीकार करें।"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय दण्डपाणि नाहक जी।"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"क्या आँसूं के बजाय आंसू में आं की मात्रा लघु कर सकते है आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।"
Friday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आपने निम्न मिसरे का बहर में नहीं होना बताया है। आप जानकार है। अतः आपकी बात सही होगी किंतु मैने इसे जिस आधार पर लिया है वो निम्न है। कृपया इसमें कहां त्रुटि हुई है? बताने का कष्ट करें ताकि सुधार कर सकूं। कहीं बाद 1121में पड़े जी…"
Friday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत धनयवाद। आपके सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Friday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय तस्दीक अहमद खां जी, सुंदर ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई।"
Friday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय सालिक गणवीर जी, सुंदर ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें।"
Friday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय अनिल कुमार सिंह जी, सुंदर ग़ज़ल के लिए बधाई एवं शुभकामना।"
Friday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, अति सुंदर ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें।"
Friday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"ये नहीं हमारी आदत कि कहें बातें बदल केगया छोड़ वो अकेला हमें साथ साथ चलके न चलाओ तीर ऐसा जो हमें ही मार डाले कहीं बाद में पड़े जीना तुम्हें आंसू निगल के न छिपाओ बात दिल की अभी बात कुछ है बाकीहया लाज है अगर तो कहो बात कुछ सँभल के है उधार का ये जीवन…"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dayaram Methani's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन।गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। हार्दिक बधाई।"
Wednesday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-133
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, मैं पिछले चार पांच कार्यक्रमो से देख रहा हूं कि कभी दो, कभी तीन या चार पोस्ट होती है जिन पर टिप्पणी करने वालों का भी अभाव होता है। इसीलिए मुझे आज कहना पड़ा कि या तो इसे बंद कर दिया जाये या इसे लोकप्रिय बनाने का कार्यक्रम…"
Nov 14
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-133
"आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी, टिप्पणी करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
Nov 14

Profile Information

Gender
Male
City State
BHILWARA
Native Place
BHILWARA
Profession
journlist and writer
About me
I like to read and write kavita, gazal, short stories and artical.

Dayaram Methani's Blog

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2



ज़िन्दगी में हर कदम तेरा सहारा हूँ

नाव हो मझधार तो तेरा किनारा हूँ

तुम भटक जाओ अगर अनजान राहों में

पथ दिखाने को तुम्हें रौशन सितारा हूँ

ज़िन्दगी का खेल खेलो तुम निडरता से

हर सफलता के लिए मैं ही इशारा हूँ

राह जीने की सही तुमको दिखाऊंगा

ज़िन्दगी के सब अनुभवों का पिटारा हूँ

साथ क्यों दूं मैं तुम्हारा सोच मत ऐसा

अंश तुम मेरे पिता मैं ही तुम्हारा हूँ

- दयाराम मेठानी…

Continue

Posted on November 6, 2021 at 10:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल

 2122 2122 2122 212

नाव है मझधार में नाविक नशे में चूर है

सांझ है होने लगी मंजिल नज़र से दूर है

संकटों से आदमी क्या देव भी बचते नहीं

वक्त के आगे सभी होते यहां मजबूर है

जिन्दगी की कशमकश में जीना’ जिसको आ गया

यों समझ लो हौसलों से वो बहुत भरपूर है

दोष है अपना समय के साथ चल पाये नहीं

बंद मुट्ठी से फिसलना वक्त का दस्तूर है

हाल ‘‘मेठानी’’ बतायंे क्या किसी को अब यहां

आदमी सुनता नहीं अब हो गया मगरूर…

Continue

Posted on August 27, 2019 at 10:00pm — 2 Comments

गज़ल सीख लो

2122 2122 212

दर्द को दिल में दबाना सीख लो

ज़िन्दगी में मुस्कराना सीख लो

आंख से आंसू बहाना छोड़िये

हर मुसीबत को भगाना सीख लो

ज़िन्दगी है खेल, खेलो शान से

खेल में खुद को जिताना सीख लो

फूल को दुनिया मसल कर फैंकती

खुद को कांटों सा दिखाना सीख लो

छोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी

कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लो

थी जवानी जोश भी था स्वप्न भी

दिन पुराने अब भुलाना सीख लो

कौन…

Continue

Posted on July 4, 2019 at 9:30pm — 8 Comments

झूठ का व्यापार - ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

झूठ का व्यापार बढ़ता जा रहा है आजकल,

और हर इक पर नशा ये छा रहा है आजकल

है लड़ाई का नजारा हर तरफ देखें जिधर,

आदमी ही आदमी को खा रहा है आजकल

इस प्रगति के नाम पर ही मिट रहे संस्कार सब

झूठ को हर आदमी अपना रहा है आजकल

बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकर

काबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल

जाग ‘मेठानी’ बचायें आग से अपना चमन

नित नया जालिम जलाने आ रहा है…

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Posted on April 8, 2019 at 2:01pm — 7 Comments

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At 10:09pm on May 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय दयाराम मेथानि जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया जनाब
 
 
 

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