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Ram Awadh VIshwakarma
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  • Gwalior Madhyapradesh
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Ram Awadh VIshwakarma commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"धन्यवाद आदरणीय समर कबीर साहब"
19 hours ago
Samar kabeer commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"सहीह शब्द "बेवज्ह"221 है,रदीफ़ "बेसबब" कर सकते हैं ।"
19 hours ago
Ram Awadh VIshwakarma commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"धन्यवाद आदरणीय समर कबीर साहब जी मैं रदीफ को बदलकर बेवजह कर दूंगा।"
19 hours ago
Samar kabeer commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"//जनाब अमीरुद्दीन खान साहब के अनुसार खामखा रदीफ में ले सकते हैं?// नहीं ले सकते,आपको रदीफ़ बदलना पड़ेगी ।"
21 hours ago
Samar kabeer commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"//जानना चाहता हूँ कि क्या लफ़्ज़ ख़ामख़ा लेना दुरुस्त है या नहीं अगर दुरुस्त है तो क्या लफ़्ज़ 'ख़ाह मख़ाह' में दोनों जगह मात्राएं गिराई जा सकती हैं// 'ख़ामख़ा' कोई शब्द ही नहीं है,और "ख़ाह मख़ाह" में…"
21 hours ago
अमीरुद्दीन खा़न "अमीर " commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"जनाब राम अवध विश्वकर्मा जी, जैसा कि उस्ताद मुहतरम ने बताया है कि "इस शब्द को 'ख़ाह मख़ाह' भी लिख सकते हैं,कुछ मिसरों के अंत में एक साकिन की छूट इस बह्र में सहीह है" , 'ख़ाह मख़ाह' का वज़्न 21121 है और आपकी बह्र में…"
22 hours ago
Ram Awadh VIshwakarma commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"आदरणीय समर कबीर साहब.आदाब। सटीक टिप्पपणी के लिए आभार। जनाब अमीरुद्दीन खान साहब के अनुसार खामखा रदीफ में ले सकते हैं?"
23 hours ago
Ram Awadh VIshwakarma commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"आदरणीय अमीरुद्दीन खान साहब आदाब। खामखा के कई शब्द नेट पर होने से मुझे भ्रम हो गया था। आपने खाम ख्वाह बताकर कृपा की धन्यवाद। गया में य का वज्न गिरा देने से मेरे विचार से 11 गणना की जानी चाहिए।"
23 hours ago
Ram Awadh VIshwakarma commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"आदरणीय विनय कुमार जी शेर की तारीफ करने एवं हौसलाअफजाई के लिए तहेदिल से शुक्रिया"
23 hours ago
Samar kabeer commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"जनाब राम अवध जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन रदीफ़ ग़लत हो गई वज़्न के लिहाज़ से,सहीह शब्द "ख़्वाह मख़्वाह'21121,इस शब्द को 'ख़ाह मख़ाह' भी लिख सकते हैं,कुछ मिसरों के अंत में एक साकिन की छूट इस बह्र में सहीह है,बहरहाल इस प्रस्तुति…"
yesterday
अमीरुद्दीन खा़न "अमीर " commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"जनाब राम अवध विश्वकर्मा जी, आदाब। ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है। बधाई स्वीकार करें। कुछ कमियों की तरफ़ जो क़ाबिल ए मरम्मत हैं, आप को तवज्जो दिलाना चाहूंगा।  रदीफ़ में जो लफ़्ज़ लिया गया है उस का सहीह हिज्जे 'ख़ामख़्वाह' है ये लफ़्ज़ फ़ारसी…"
yesterday
विनय कुमार commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"//ये बुद्ध की कबीर की चिश्ती की है जमीनफिर आप भाँजते हैं क्यूँ तलवार ख्वामखाह//, लाजवाब शेर है, बहुत बहुत बधाई आ राम अवध विश्वकर्मा जी "
yesterday
Ram Awadh VIshwakarma posted a blog post

ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई

बह्र - मफऊल फाइलात मफाईल फाइलुन 221 2121 1221 212अन्धों के गांव में भी कई बार ख्वामखाहकरती है रोज रोज वो ऋंगार ख्वामखाहरिश्ता नहीं है कोई भी उससे तो दूर तकमुजरिम का बन गया है तरफदार ख्वामखाहफोकट में एक रोज की छुट्टी चली गईइतवार को ही पड़ गया त्यौहार ख्वामखाहनाटक में चाहते थे मिले राम ही का रोलरावण का मत्थे मढ़ गया किरदार ख्वामखाहये बुद्ध की कबीर की चिश्ती की है जमीनफिर आप भाँजते हैं क्यूँ तलवार ख्वामखाहखबरे बढ़ा चढ़ा के दिखाना है इनका कामतिल का बना दें ताड़ ये अखबार ख्वामखाहखारों से मेरी कोई अदावत न…See More
yesterday
Ram Awadh VIshwakarma commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post उनको न मेरी  फ़िक्र न रुसवाई का है डर(१०४ )
"आदरणीय भाई गिरधारी सिंह जी नमस्कार ग़ज़ल बहुत खूबसूरत हुई है जितनी तारीफ की जाये कम होगी। बहुत बहुत बधाई"
yesterday
Ram Awadh VIshwakarma commented on अमीरुद्दीन खा़न "अमीर "'s blog post ईद कैसी आई है!
"आदरणीय भाई अमीरद्दीन जी ईद पर बहुत खूबसूरत रचना हुई है। बहुत मुबारकबाद"
yesterday
Ram Awadh VIshwakarma commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post 'तुरंत' के दोहे ईद पर (१०६ )
"फीका बच्चों को लगे सेवइयों का स्वाद वाह वाह आदरणीय ईद सभी दोहे शानदार हैं"
yesterday

Profile Information

Gender
Male
City State
Gwalior Madhya pradesh
Native Place
Basti U.P.
Profession
Retired Govt. Servent
About me
Retired as Divisional Engineer BSNL book published 1.Mehman Bhi Ltkate Hain ( Gazals) 2.Chakoo khatkedar hai ab (Gazals) 3.Muft khori Jinda Bad ( Gadya Vyangya ) 4. Vishwakarma Brahmin aur unke gotra 5.Iski Topi Uske Sar Pe (Gazals)6. Bhopoo sa chillate rahiye.

Ram Awadh VIshwakarma's Blog

ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई

बह्र - मफऊल फाइलात मफाईल फाइलुन

221 2121 1221 212

अन्धों के गांव में भी कई बार ख्वामखाह

करती है रोज रोज वो ऋंगार ख्वामखाह

रिश्ता नहीं है कोई भी उससे तो दूर तक

मुजरिम का बन गया है तरफदार ख्वामखाह

फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई

इतवार को ही पड़ गया त्यौहार ख्वामखाह

नाटक में चाहते थे मिले राम ही का रोल

रावण का मत्थे मढ़ गया किरदार ख्वामखाह

ये बुद्ध की कबीर की चिश्ती की है जमीन

फिर आप भाँजते हैं क्यूँ तलवार ख्वामखाह

खबरे बढ़ा चढ़ा…

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Posted on May 25, 2020 at 5:07pm — 12 Comments

ग़ज़ल - इस तरफ इंसान कड़की में

बह्र - फाइलातुन फाइलातुन फा

2122 2122 2

इस तरफ इंसान कड़की में

उस तरफ भगवान कड़की में

एक पल को भी नहीं भटका

राह से ईमान कड़की में

लाक डाउन में गई रोजी

सब बिके सामान कड़की में

ज़िन्दगी रफ्तार से दौड़े

हैं नहीं आसान कड़की में

हैं बहुत बीमार हफ्तों से

घर में अम्मी जान कड़की में

भूल बैठे सब हंसी ठठ्ठा

गुम हुई मुस्कान कड़की में

क्या कहें बरसात से पहले

ढह गया…

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Posted on May 23, 2020 at 9:11am — 6 Comments

ग़ज़ल

बह्र- फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाा

2122   2122  2122  2

ये हंसी ये मुस्कराहट कातिलाना है

हां तभी तुझपर फिदा सारा ज़माना है

लाॅक डाउन तोड़कर घर से निकलकर आ

देख तो मौसम बड़ा ही आशिकाना है

ये गदाईगीर का हो ही नहीं सकता

ये नगर के शाह का ही शामियाना है

बांटते थे ग़म खुशी आपस में पहले दोस्त

अब कहां माहौल वैसा दोस्ताना है

बेसबब हैं कैद घर में लोग हफ्तों से

कब रिहाई होगी इनकी क्या ठिकाना…

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Posted on May 17, 2020 at 8:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल - हम अपने हिस्से का ही आसमान दे बैठे

बह्र - मफाइलुन फइलातुन मफाइलुन फैलुन

वो किस तरह से मुकरते ज़ुबान दे बैठे।

तभी कचहरी मे झूठा बयान दे बैठे।

तमाम दाग थे दामन में जिसके उसको ही

टिकट चुनाव का आला कमान दे बैठे।

दिखाया स्वर्ग का सपना हमें जो ब्राह्मण ने

तो दान में उसे अपना मकान दे बैठे।

जो बात करते थे कल राष्ट्र भक्ति का साहब,

वो चन्द सिक्कों में अपना ईमान दे बैठे।

जब उनके प्यार को माँ बाप ने नकार दिया,

नदी में डूब के वो अपनी जान दे…

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Posted on May 9, 2018 at 5:42am — 10 Comments

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At 9:43pm on July 30, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

Mushayra :- कमेन्ट जीस पोस्ट पर करनी हो ठीक उसके नीचे दाहिने तरफ ब्लू रंग में Reply लिखा हुआ है उसको क्लिक कर जब कमेन्ट करेंगे तो थ्रेड में आएगा, मुख्य बॉक्स में केवल नया पोस्ट करना चाहिए | ( आप नए है इसलिए जानकारी हेतु बता रहा हूँ ) 

इस कमेन्ट को पुनः बताये अनुसार लगा दे |

At 9:56am on July 9, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 7:53pm on July 3, 2011, Admin said…
At 7:18pm on July 2, 2011, PREETAM TIWARY(PREET) said…
 
 
 

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