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Gurpreet Singh
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Mohammed Arif commented on Gurpreet Singh's blog post इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )
"आदरणीय गुरप्रीत जी आदाब, बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल का प्रयास है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब और आदरणीय रवि शुक्ला जी बातों से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ ।"
9 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Gurpreet Singh's blog post इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )
"आदरनीय गुर प्रीत भाई , अच्छी गज़ल कही है , बधाइयाँ स्वीकार करें ।"
11 hours ago
laxman dhami commented on Gurpreet Singh's blog post इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )
"अच्छे भाव हुए है । सादर..."
12 hours ago
Samar kabeer commented on Gurpreet Singh's blog post इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )
"जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । 'ख़्वाहिशो सीने पे न दस्तक दो अब मेरा दिल यहां नहीं होता' सीने पर दस्तक नहीं दी जाती है,दिल पर दी जाती है,दूसरी बात सानी मिसरे में रदीफ़ काम नहीं कर रही…"
14 hours ago
Gurpreet Singh posted a blog post

इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )

2122 -1212 -22मुझ पे तू मेहरबां नहीं होता मैं तेरा क़द्रदां नहीं होता।बोलने वाले कब ये समझेंगे चुप है जो बेज़ुबां नहीं होता।कोई अरमान हम भी बोते. . .गर मौसम-ए-दिल ख़िज़ाँ नहीं होता।ख्वाहिशो सीने पे न दस्तक दो अब मेरा दिल यहां नहीं होता।जो बचाए किसी को कातिल से वो सदा पासबाँ नहीं होता।चाहे कितना उठे धुआँ ऊपर वो कभी आसमाँ नहीं होता। (मौलिक व् अप्रकाशित)See More
18 hours ago
Gurpreet Singh commented on Ravi Shukla's blog post तरही ग़ज़ल
"इस जानकारी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि शुक्ला जी ,,,गोया शब्द मैंने कई अशआर में पढ़ा था,,लेकिन इस के बारे में  जानता नहीं था,, आप ने बात स्पष्ट कर दी,,, शुक्रिया "
21 hours ago
Gurpreet Singh commented on Hari Prakash Dubey's blog post मुहब्बत की दावत: ग़ज़ल: हरि प्रकाश दुबे
"आदरणीय हरी प्रसाद जी..अच्छी ग़ज़ल कही है आपने...आदरणीय रवी सर ने जिन अशआर पर सलाह दी है ,उसे केन्द्र में रख कर आप और अशआर में भी सुधार कर सकते हैं.. ग़ज़ल जब लिखेंगे तुम्हारे लिए तो, कसम से तुम्हें खूबसूरत लिखेंगे! इशारा हमें जो किया आपने है , इसे…"
yesterday
Gurpreet Singh commented on Naveen Mani Tripathi's blog post हौसला फिर कोई बड़ा रखिये
"आदरणीय नवीन बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है..ज्यादातर अशआर दिल पर असर छोड़ रहे हैं..पहले दोनो शेर तो बहुत ही बाकमाल लगे"
yesterday
Gurpreet Singh commented on Samar kabeer's blog post 'ये लहू दिल का चूस्ती है बहुत'
"वाह वाह और वाह आदरणीय समर कबीर जी...क्या ही शानदार.जानदार ग़ज़ल कही है आपने....यूँ तो सभी अशआर बहुत ही आला दर्जे के हैं.. चौथा शेर तो उफ़्फ़..कातिलाना है..वाह वाह...वाह वाह ....वाह वाह"
yesterday
Gurpreet Singh commented on Ravi Shukla's blog post तरही ग़ज़ल
"आदरणीय रवी सर जी नमस्कार ...बहुत खूब ग़ज़ल कही है आपने...इतने सारे अशआर और वो भी इतने उच्च स्तरीय ..कमाल कर दिया है आपने. पुरसान-ए-हाल, सुकूते शब ....इन शब्दों के अर्थ जानना चाहूंगा सर जी और साथ ही गोया का इसतेमाल करने की तरकीब भी जानना चाहूंगा की…"
yesterday
Gurpreet Singh commented on Mohammed Arif's blog post सावन की ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)
"आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी..सावन पर बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आपने..जितनी तारीफ़ की जाए कम होगी..सावन का द्रुष्य खींचते बहुत अच्छे अशआर बने हैं.. क्या छठे शेअर को ऐसे कहा जा सकता है.. मस्ती में सब झूमें नाचें ऐसा रंग जमाए सावन"
Monday
Gurpreet Singh commented on Gurpreet Singh's blog post ग़ज़ल इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह)
"बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सौरभ पांडे जी,,"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Gurpreet Singh's blog post ग़ज़ल इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह)
"जिसकी खातिर लुटा दी जान उसने चीज़ वो भी तो कीमती होगी। जब मुड़ा तेरी ओर परवाना शमअ बेइन्तहा जली होगी।..........  कमाल .. उपर्युक्त इन दो शेरों ने विशेष ध्यानाकॄष्ट किया है, आदरनीय़ गुरप्रीत जी.  इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाइयाँ "
Monday
Gurpreet Singh commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (कोई आ गया दम निकलने से पहले )
"आदरणीय तस्दीक अहमद खान जी..बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने...सभी अशआर उम्दा हुए हैं"
Monday
Gurpreet Singh commented on Gurpreet Singh's blog post ग़ज़ल इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय नीलेश जी.."
Monday
Gurpreet Singh commented on Gurpreet Singh's blog post ग़ज़ल इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह)
"शुक्रिया आदरणीय हरी प्रकाश जी...मैं अभी ग़ज़ल सीख रहा हूँ..और चाहता हूँ की मंच पर उपस्थित गुणीजन मेरी रचना की कमियां बताएँ और अगर हो सके तो उन कमियों का समाधान ढूँढ़ने में मार्ग दर्शन करें ..इसी आशय से लिखा था"
Monday

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I love to write, but dont have an ustaad so dont know the rules. Thats why i am here

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इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )

2122 -1212 -22

मुझ पे तू मेहरबां नहीं होता
मैं तेरा क़द्रदां नहीं होता।

बोलने वाले कब ये समझेंगे
चुप है जो बेज़ुबां नहीं होता।

कोई अरमान हम भी बोते. . .गर
मौसम-ए-दिल ख़िज़ाँ नहीं होता।

ख्वाहिशो सीने पे न दस्तक दो
अब मेरा दिल यहां नहीं होता।

जो बचाए किसी को कातिल से
वो सदा पासबाँ नहीं होता।

चाहे कितना उठे धुआँ ऊपर
वो कभी आसमाँ नहीं होता।
(मौलिक व् अप्रकाशित)

Posted on July 20, 2017 at 1:41pm — 4 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह)

2122 -1212 -22


आस दिल में दबी रही होगी
और फिर ख़्वाब बन गई होगी।

टूट जाए सभी का दिल या रब
दिलजले को बड़ी ख़ुशी होगी।

ज़ह्न हारा हुआ सा बैठा है
दिल से तक़रार हो गई होगी।

जिसकी खातिर लुटा दी जान उसने
चीज़ वो भी तो कीमती होगी।

जब मुड़ा तेरी ओर परवाना
शमअ बेइन्तहा जली होगी।

(मौलिक व् अप्रकाशित)

Posted on July 11, 2017 at 1:26pm — 25 Comments

ग़ज़ल --इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह )

(2122-2122-2122-212)

पहले सूरज सा तपें खुद को ज़रा रोशन करें

फिर थमें मत फिर किसी को चाँद सा रोशन करें।

ये नहीं, कोई दिया बस इक दफ़ा रोशन करें

गर करें, बुझने पे उसको बारहा रोशन करें।

मेरी भी वो ही तमन्ना है जो सारे शह्र की

आप मेरे घर में आएं घर मेरा रोशन करें।

सामने है इक चराग़ और आप के हाथों में शमअ

आप किस उलझन में हैं जी?क्या हुआ? रोशन करें!

तीरगी के हैं नुमाइंदे सभी इस शह्र में

कौन है…

Continue

Posted on May 23, 2017 at 10:04am — 22 Comments

ग़ज़ल (22-22-22-22-22-22-22-2)

 

22   22   22   22   22   22   22   2



दिल के तख़्त पे हाए हमने किस ज़ालिम को बिठा लिया 

दिल की बस्ती को ही उजाड़ा उसने ऐसा काम किया।

 

'लुटे हुए अरमानों को वापिस लाऊंगा' बोला था  

लेकिन जो था पास हमारे वो भी हमसे छीन लिया।

 

अब कहता है, इश्क़ में सब आशिक़ ऐसा ही करते हैं 

मैंने भी गर झूठे वादे किए तो कोई पाप किया।

 

कितनी बार रकीबों ने अरमानों के सर काटे हैं 

और वो बस इतना कहते हैं बुरा किया भई बुरा…

Continue

Posted on May 5, 2017 at 11:00am — 17 Comments

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At 4:55pm on August 30, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी, आप नई चर्चा आरम्भ कर सकते हैं किन्तु ग़ज़ल के सम्बन्ध में "ग़ज़ल की कक्षा" और "ग़ज़ल की बातें" में पूर्व से ही कई चर्चाएँ चल रही है. जहाँ तक मुझे लगता है उन चर्चाओं में ग़ज़ल के लगभग सभी पहलुओं पर चर्चा हुई है और सतत हो रही है. अतः जिस विषय पर चर्चा पूर्व में ही आरम्भ हो चुकी है उसे आप निरंतर कर सकते है. वहीं अपने प्रश्न भी पूछ सकते हैं. गुनीजन स्वमेव ही उत्तर के साथ वहां उपस्थित हो जायेंगे. सादर 

At 10:42pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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