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Gurpreet Singh
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Gurpreet Singh commented on Samar kabeer's blog post 'आपके पास है जवाब कोई'
"सुनके मेरी ग़ज़ल कहा उसनेअपने फ़न में है कामयाब कोई. सबसे उनको छुपा के रखता हूँतोड़ डाले न मेरे ख़्वाब कोई. आमने सामने हों जब दोनोंउनको देखे कि माहताब कोई. वाह वाह आदरणीय समर सर जी ,, बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है आपने ,,, इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए दिल से दाद…"
Nov 13
Gurpreet Singh commented on SALIM RAZA REWA's blog post मुझसे रूठा है कोई उसको मनाना होगा - सलीम रज़ा रीवा
"वाह वाह बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल ,,, सभी अशआर एक से बढ़कर एक ,,,बहुत बधाई आपको आदरणीय सलीम रज़ा रीवा जी "
Nov 13
Gurpreet Singh commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (आने वाला कोई फिर दौरे परेशानी है )
"आदरणीय तस्दीक अहमद खान जी बहुत ही शानदार ग़ज़ल ,,, सभी अशआर बेहतरीन हुए है ,, आपको बहुत बहुत बधाई "
Nov 10
Gurpreet Singh commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -ये जिंदगी तो’ हो गयी’ दूभर कहे बगैर-कालीपद 'प्रसाद'
"बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय कालीपद जी ,, बधाई स्वीकार करें "
Nov 10
Gurpreet Singh commented on सतविन्द्र कुमार's blog post उनका बस इन्तिज़ार अच्छा था-ग़ज़ल
"देख कर जीत की खुशी उनकी हारना उनसे यार अच्छा था वाह आदरणीय सतविंद्र कुमार जी ,, बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है"
Nov 10
Gurpreet Singh commented on Naveen Mani Tripathi's blog post आप से क्या मुहब्बत हुई
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी ,, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने ,, बधाई स्वीकार करें इस ग़ज़ल के लिए "
Nov 10
Gurpreet Singh posted a blog post

(ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)

22-22-22-22-22-2अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ।अपने आँसू ख़ुद ही पोंछा करता हूँ।देर तलक आईना देखा करता हूँ।जाने उसमें किसको ढूँढा करता हूँ।दिल में दर्द उठे तो फ़िर क्या करता हूँ?बस उसकी तस्वीर से शिक्वा करता हूँ।क्या वो अब भी याद मुझे करता होगा?ख़ुद से ऐसी बातें पूछा करता हूँ।एक न इक दिन पत्थर पिघलेगा पगले!ये कह के दिल को बहलाया करता हूँ।शाम ढले वो तोड़ दिया करता हूँ मैं,सुब्ह जो अक्सर ख़ुद से वादा करता हूँ।मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Nov 9
Gurpreet Singh commented on Gurpreet Singh's blog post (ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)
"शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण जी"
Nov 9
Gurpreet Singh commented on Gurpreet Singh's blog post (ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)
"शुक्रिया आदरणीय अजय तिवारी जी"
Nov 9
Gurpreet Singh commented on Gurpreet Singh's blog post (ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी ..आपकी इस्लाह के मुताबिक ग़ज़ल में बदलाव कर रहा हूँ जी"
Nov 9
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Gurpreet Singh's blog post (ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)
"हार्दिक बधाई ।"
Nov 6
Ajay Tiwari commented on Gurpreet Singh's blog post (ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)
"आदरणीय गुरप्रीत जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक शुभकामनाएं. बाकी आदरणीय समर साहब सब कह चुके हैं. सादर "
Nov 6
Ajay Tiwari commented on Gurpreet Singh's blog post तरही ग़ज़ल (पहले ये बतला दो उसने छुप कर तीर चलाए तो)- गुरप्रीत सिंह
"आदरणीय गुरप्रीत जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक शुभकामनाएं. आर्कन के एक ही होने से बहर के बारे में भ्रान्ति होना स्वाभाविक है. मैंने एक आलेख में तरही की बहर और बहरे-मीर का अंतर स्पष्ट करने की कोशिश की है. आप 'ग़ज़ल कि बातें' में देख सकते हैं…"
Nov 6
Samar kabeer commented on Gurpreet Singh's blog post (ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)
"जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीजर करें । 'पत्थर इक ना इक दिन पिघलेगा पगले' इस मिसरे को यूँ करें तो गेयता बहतर हो जाएगी:- 'एक न इक दिन पत्थर पिघलेगा पगले' 'क्यों करता हूँ हुस्न से वफ़ा की…"
Nov 5
Samar kabeer commented on Gurpreet Singh's blog post तरही ग़ज़ल (पहले ये बतला दो उसने छुप कर तीर चलाए तो)- गुरप्रीत सिंह
"जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकारकरें । कुछ अशआर में शिल्प की कमज़ोरी साफ़ नज़र आ रही है,उस पर क़ाबू पाने की ज़रूरत है,मसलन दूसरे शैर का सानी मिसरा, तीसरे शैर का ऊला मिसरा, गिरह का मिसरा, आख़री शैर का ऊला मिसरा ।"
Nov 5
Gurpreet Singh commented on Gurpreet Singh's blog post (ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)
"शुक्रिया आदरणीय राम अवध जी .. "क्यों करता हूँ हुस्न से वफ़ा की उम्मीदें?" इस मिसरे में क्या बह्र के लिहाज़ के कुछ कमी है या कुछ और , मैं समझ नहीं पा रहा ..क्रुप्या इस पर कुछ क्लियर करें ...धन्यवाद"
Nov 5

Profile Information

Gender
Male
City State
Patiala Punjab
Native Place
India
Profession
Govt Employee
About me
I love to write, but dont have an ustaad so dont know the rules. Thats why i am here

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(ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)

22-22-22-22-22-2



अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ।

अपने आँसू ख़ुद ही पोंछा करता हूँ।



देर तलक आईना देखा करता हूँ।

जाने उसमें किसको ढूँढा करता हूँ।



दिल में दर्द उठे तो फ़िर क्या करता हूँ?

बस उसकी तस्वीर से शिक्वा करता हूँ।



क्या वो अब भी याद मुझे करता होगा?

ख़ुद से ऐसी बातें पूछा करता हूँ।



एक न इक दिन पत्थर पिघलेगा पगले!

ये कह के दिल को बहलाया करता हूँ।



शाम ढले वो तोड़ दिया करता हूँ मैं,

सुब्ह जो अक्सर ख़ुद… Continue

Posted on November 4, 2017 at 11:30am — 12 Comments

तरही ग़ज़ल (पहले ये बतला दो उसने छुप कर तीर चलाए तो)- गुरप्रीत सिंह

लाख करे कोशिश सोने की फ़िर भी नींद न आए तो।

एक अधूरा ख़्वाब किसी को सारी रात जगाए तो ।



तुम तो हौले से 'ना' कह के अपने रस्ते चल दोगे,

लेकिन किसी का अम्बर टूटे और धरती फट जाए तो ।



हाँ मैं तेरे ज़ुल्म के बारे में न ज़ुबाँ से बोलूँगा,

पर क्या होगा गर महफ़िल में आँख मेरी भर आए तो ।



फ़िर बतलाना सीने ऊपर वार बचाना है कैसे,

पहले ये बतला दो उसने छुप कर तीर चलाए तो ।



वो गर नज़रों से ही छू ले तो दिल धक धक करने लगे,

जाने क्या हो गर वो सचमुच आकर… Continue

Posted on November 2, 2017 at 1:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल --इस्लाह के लिए

      (122-122-122-12)

रहे हम तो नादां ये क्या कर चले

कि दौर ए जफ़ा में वफ़ा कर चले।

वो तूफ़ान के जैसे आ कर चले

मेरा आशियाना फ़ना कर चले।

रक़ीबों की तारीफ़ की इस क़दर

कि चहरा मेरा ज़र्द सा कर चले'

कहीं जाग जाएँ न इस ख़ौफ़ से

हम आँखों में सपने सुला कर चले

ज़मीं हमको बुज़दिल का ताना न दे

तो फिर हम ये नज़रें उठा कर चले।

तड़पते रहे अधजले कुछ हरूफ़

वो जब मेरे खत को जला कर…

Continue

Posted on August 16, 2017 at 4:30pm — 13 Comments

इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )

2122 -1212 -22

मुझ पे तू मेहरबां नहीं होता
मैं तेरा क़द्रदां नहीं होता।

बोलने वाले कब ये समझेंगे
चुप है जो बेज़ुबां नहीं होता।

कोई अरमान हम भी बोते. . .गर
मौसम-ए-दिल ख़िज़ाँ नहीं होता।

ख्वाहिशो सीने पे न दस्तक दो
अब मेरा दिल यहां नहीं होता।

जो बचाए किसी को कातिल से
वो सदा पासबाँ नहीं होता।

चाहे कितना उठे धुआँ ऊपर
वो कभी आसमाँ नहीं होता।
(मौलिक व् अप्रकाशित)

Posted on July 20, 2017 at 1:41pm — 14 Comments

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At 4:55pm on August 30, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी, आप नई चर्चा आरम्भ कर सकते हैं किन्तु ग़ज़ल के सम्बन्ध में "ग़ज़ल की कक्षा" और "ग़ज़ल की बातें" में पूर्व से ही कई चर्चाएँ चल रही है. जहाँ तक मुझे लगता है उन चर्चाओं में ग़ज़ल के लगभग सभी पहलुओं पर चर्चा हुई है और सतत हो रही है. अतः जिस विषय पर चर्चा पूर्व में ही आरम्भ हो चुकी है उसे आप निरंतर कर सकते है. वहीं अपने प्रश्न भी पूछ सकते हैं. गुनीजन स्वमेव ही उत्तर के साथ वहां उपस्थित हो जायेंगे. सादर 

At 10:42pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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