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बसंत कुमार शर्मा
  • Male
  • जबलपुर, मध्यप्रदेश
  • India
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babitagupta commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गीत- प्यार के आगे
"शुरू की चार पंक्तियाँ बहुत ही सुंदर,बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।"
1 hour ago
Shyam Narain Verma commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गीत- प्यार के आगे
"सुंदर गीत के लिए .दिल से बधाई  सादर"
yesterday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"आदरणीया Neelam Upadhyaya जी हृदय से आभार आपका "
yesterday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गीत- प्यार के आगे
"आदरणीया Neelam Upadhyaya जी , आपका हृदय से आभार "
yesterday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गीत- प्यार के आगे
"आपकी उपस्थिति को सादर नमन आदरणीय Samar kabeer जी "
yesterday
Neelam Upadhyaya commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गीत- प्यार के आगे
"आदरणीय बसंत कुमार जी,  बहुत ही सूंदर रचना हुई है ।   प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें।"
yesterday
Neelam Upadhyaya commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी,  नमस्कार । अच्छी रचना की प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें।"
yesterday
Neelam Upadhyaya commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"दो मिनट कचनार की बातें हुईं फिर अधिकतर खार की बातें हुईं"
yesterday
Samar kabeer commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गीत- प्यार के आगे
"जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत सुंदर गीत हुआ है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Monday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"आदरणीय Gurpreet Singh जी आपकी इस्लाह का हृदय से आभार, आपका सुझाव उचित लगा मुझे भी , ठीक करता हूँ "
Monday
बसंत कुमार शर्मा posted a blog post

गीत- प्यार के आगे

भले थोड़ी रुकावट आज हैपतवार के आगेकिनारा भी मिलेगा कल,हमें मँझधार के आगे. अमन की क्यारियाँ सींचो,मुहब्बत को महकने दो.हृदय में आज अपने तुम,हमारा दिल धड़कने दो. न अपने हाथ फैलाओ,कभी सरकार के आगे. न पकड़ो हाथ में चाक़ू,बनाओ मित्र कुछ अपने.हृदय का पृष्ठ कोरा है,उकेरो कुछ नये सपने. नहीं तलवार लगती कुछ,कलम की धार के आगे न बम होंगे न बन्दूकें,न पत्थर बाजियाँ होंगी.गुलाबों और केसर से,सजी फिर घाटियाँ होंगी. घृणा के पैर टिक पायें,न संभव प्यार के आगे. "मौलिक एवं अप्रकाशित"See More
Monday
Gurpreet Singh commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी ,  बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल हुई है । बहुत बहुत बधाई आपको ।  दूसरा शेर और ये वाला  शेर बहुत पसंद आए  बाढ़ में जब बह चुका सब, तब कहीं नाव की, पतवार की बातें हुईं वैसे मुझे लगा कि ऊला में अगर '…"
Sunday
बसंत कुमार शर्मा commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post पीढ़ी को समझा दे पंकज, खेती ख़ातिर खेत बचा ले----ग़ज़ल
"लाजबाब गजल वाह "
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"ह्रदय से आभार आदरणीय समर कबीर जी एवं रवि शुक्ला  जी आपका , सादर नमन "
Saturday
Ravi Shukla commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"आदरणीय बसंत जी बहुत बहुत बधाई इस गजल के  लिए "
Friday
Samar kabeer commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं
"अब ठीक है ।"
Friday

Profile Information

Gender
Male
City State
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
Native Place
धौलपुर
Profession
भारतीय रेल यातायात सेवा
About me
बोन्साई एवं कविता लेखन में रूचि

बसंत कुमार शर्मा's Blog

गीत- प्यार के आगे

भले थोड़ी रुकावट आज है

पतवार के आगे

किनारा भी मिलेगा कल,

हमें मँझधार के आगे.

 

अमन की क्यारियाँ सींचो,

मुहब्बत को महकने दो.

हृदय में आज अपने तुम,…

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Posted on August 12, 2018 at 12:08pm — 6 Comments

गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं

कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं

जब हुईं तकरार की बातें हुईं

 

दो मिनट कचनार की बातें हुईं

फिर अधिकतर खार की बातें हुईं

 

बाढ़ में जब बह चुका सब, तब कहीं

नाव की, पतवार की बातें हुईं

 …

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Posted on August 10, 2018 at 9:30am — 9 Comments

नवगीत- यही सोचता रहा घड़ा

स्वर्ण-कलश हो गए लबालब,

क्यों हूँ अब तक रिक्त पड़ा.

जाने कब नंबर आयेगा,

यही सोचता रहा घड़ा.

 

नदिया सूखी, पोखर प्यासी,

तालाबों की वही कहानी.

झरने खूब बहे पर्वत से,…

Continue

Posted on August 3, 2018 at 4:33pm — 2 Comments

नवगीत- यही सोचता रहा घड़ा

स्वर्ण-कलश हो गए लबालब,

क्यों हूँ अब तक रिक्त पड़ा.

जाने कब नंबर आयेगा,

यही सोचता रहा घड़ा.

 

नदिया सूखी, पोखर प्यासी,

तालाबों की वही कहानी.

झरने खूब बहे पर्वत से,…

Continue

Posted on August 3, 2018 at 4:33pm — 2 Comments

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At 2:23pm on September 28, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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