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कालिख लगी है इनमें जो -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )

२२१/२१२१/१२२१/२१२


हमने किसी को हर्ष का इक पल नहीं दिया
सूखी धरा को  जैसे  कि  बादल  नहीं दिया।१।
*
रूठे तो उससे रोज ही लेकिन मनाया कब
आँसू ढले जो आँखों से आँचल नहीं दिया।२।
*
गंगा से  भर  के  लाये  थे  पुरखों  को तारने
जलते वनों की प्यास को वो जल नहीं दिया।३।
*
कहने पे मन को आपके बंदिश में क्यों रखें
यूँ जब किसी भी द्वार को साँकल नहीं दिया।४।
*
कालिख लगी है इनमें जो सौगात जग की है
आँखों में हम ने एक  भी  काजल नहीं दिया।५।
*
सब ने हमेशा धूल ही आकर मली यहाँ
रचने हमारे भाल  पे  सन्दल नहीं दिया।६।
*
बोला हमारी रुह जो तुम को रखेगी खुश
पुरखों ने पेड़ कह के तो जंगल नहीं दिया।७।


मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 11, 2021 at 11:52am

आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति , स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by vijay nikore on May 11, 2021 at 6:35am

ख्याल बहुत उम्दा हैं गज़ल में। हार्दिक बधाई, भाई लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2021 at 9:51am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 26, 2021 at 9:00am

सादर  नमस्कार आदरणीय धामी जी 

अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकारें 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 25, 2021 at 9:18pm

आ. भाई आज़ी तमाम जी, गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए धन्यवाद।

Comment by Aazi Tamaam on April 25, 2021 at 5:38pm

सादर प्रणाम धामी सर

अच्छी ग़ज़ल हुई है

सादर

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