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अब हो गये हैं आँख वो भूखे से गिद्ध की- लक्ष्मण धामी'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

चिन्ता करें जो आम की शासन नहीं रहे
कारण इसी के लाखों के जीवन नहीं रहे।१।
*
हर कोई खेल सकता है पैसों के जोर पर
कानून  आज  देश  में  बन्धन  नहीं  रहे।२।
*
अब हो गये हैं आँख वो भूखे से गिद्ध की
जो थे  बचाते  लाज  को  यौवन नहीं रहे।३।
*
आई हवा नगर की  तो दीवारें बन गयीं
मिलजुल जहाँ थे बैठते आगन नहीं रहे।४।
*
जीवन का दर्द आँखों में उनकी रहा जवाँ
बेवा हो जिनके  हाथों  में  कंगन नहीं रहे।५।
*
तकनीक जबसे आ घुसी सबके दिमाग में
आँगन  उछलते  कूँदते  बचपन  नहीं  रहे।६।

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 11, 2021 at 11:54am

आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति , स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by vijay nikore on May 11, 2021 at 6:19am

आपकी यह गज़ल पढ़ कर भी आनन्द आ गया। हार्दिक बधाई, मेरे भाई, लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 7, 2021 at 7:06pm

आ. भाई आज़ी तमाम जी, हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Aazi Tamaam on April 28, 2021 at 12:05pm

सादर प्रणाम आ धामी सर आपकी ग़ज़लों में एक अलग ही बात होती है

सुंदर ग़ज़ल है

कहीं कहीं टंकण त्रुटियां हैं एक बार देख लीजियेगा

सादर

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