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सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२
*
ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी
मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१।
*
भूले हैं सिर्फ  लोग  न  सच को निहारना
हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२।
*
आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को
दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३।
*
बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर
सच को तो  झूठ  आस  भी देता नहीं कभी।४।
*
जनता को सत्य  कैसे  भला रास आएगा
सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं कभी।५।
*
तन्हा मिलेगा पथ में 'मुसाफिर' से बोल दे
सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी।६।
***
मौलिक/अप्रकाशित
- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 31, 2026 at 11:04pm

आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on January 26, 2026 at 6:21pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। काफ़ी देर के बाद मिल रहे हैं। इस सुंदर प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें।

/भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना/

इस शेर के शिल्प में सुधार की गुंजाइश लग रही है। एक सुझाव:

भूले नहीं हैं लोग ही सच को निहारना

/सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं कभी/

इस मिसरे के लिए सुझाव:

सच्चा मिला है एक भी राजा नहीं कभी

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2026 at 11:42am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Sushil Sarna on January 8, 2026 at 8:47pm

वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है आदरणीय लक्ष्मण धामी जी । हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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