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गीत-आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा

सार छंद 16,12 पे यति, अंत में गागा

अर्थ प्रेम का है इस जग में
आँसू और जुदाई
आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा
कैसी रीत चलाई

सूर्य निकलता नित्य पूर्व से
पश्चिम में ढल जाता
कब से डूबा सूर्य हृदय का
अब भी नजर न आता

धीरे धीरे बढ़ता जाए
अंतस में अँधियारा
दिशाहीन पथहीन जगत में
भटक रहा बंजारा

अभी शेष है कितनी पीड़ा
बोलो कुछ पुरवाई
आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा
कैसी रीत चलाई

ओ दक्षिण को जाते पंछी
उनसे इतना कहना
तुम बिन साँसें छीज रहीं यूँ
नींद बिना ज्यूँ रैना

अपलक देखूँ राह तुम्हारी
नैन हमारे हारे
कब आओगे बाट निहारूँ
निस दिन प्राण अधारे

आती जाती ऋतु से पूछूँ
देकर राम दुहाई
आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा
कैसी रीत चलाई

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 21, 2025 at 1:10pm

आदरणीय धामी जी सादर नमन करते हुए कहना चाहता हूँ कि रीत तो कृष्ण ने ही चलायी है। प्रेमी या तो उसको दोष देगा जिसके कारण कष्ट में है या उस कष्ट की रीत जिसने चलायी है। अगर हम विश्वास में पत्थरों को पूज सकते हैं तो उसी विश्वास में हम उन्हें कोस भी सकते हैं। ऐसा मेरा मानना है। देर से आने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 21, 2025 at 1:04pm

आदरणीय अजय जी सर्वप्रथम देर से आने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ। 

मनुष्य द्वारा निर्मित, संसार में कुछ भी पूर्ण और अंतिम सत्य नहीं है। इसलिए आपकी बात से इंकार नहीं कर रहा लेकिन उससे सहमत भी नहीं हो पा रहा। 
समाज में देखने से पता चलता है कि हम छल,कपट,पाखंड से भरे कृतघ्न मनुष्यों के दौर में हैं। 
इसलिए किसी का बुरा चाहना या सोचना अतिशयोक्ति होगा इससे सहमति मेरे लिए मुश्किल है। रही बात साहित्य की तो मैं इतना जानकार नहीं हूँ फिर भी जीवन के अनुभवों से कहना चाहता हूँ या एक जिज्ञासा है कि क्या सिर्फ जो अच्छा है समाज में या काल्पनिक अच्छा उसे ही लिखना उचित है?
क्या साहित्य का एकपक्षीय होना ठीक है ?
मैं कहना चाहता हूँ कि गीत को एक विरह में तड़पते प्रेमी की दृष्टि से देखें जिसके लिए कुछ भी कहना,सोचना अतिश्योक्ति नहीं हो सकता। 
सादर....
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 2, 2025 at 2:41pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। गीत का प्रयास अच्छा हुआ है। पर भाई रवि जी की बातों से सहमत हूँ। इसमें थोड़ा बहुत बदलाव कर इसे और सुंदर बनाया जा सकता है। जैसे -

आह बुरा हो कान्हा उसका जिसने 
 रीत चलाई ....

शेष शुभ शुभ...

Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on June 17, 2025 at 11:13am

ब्रजेश जी, आप जो कह रहें हैं सब ठीक है।   

पर मुद्दा "कृष्ण" या "प्रेम" से नहीं है। बल्कि किसी का बुरा मनाने से है। हम तो किसी को कोसते हुए भी कहते हैं कि " ओ तेरा भला हो"। फिर ये बुरा चाहना ही सभी को खल रहा है। आदरणीय रवि शुक्ला जी ने स्पष्ट कहा है "गीत एक कोमल विधा है इसमें कटु बातों शब्दो भावों का समावेश कुछ अप्रिय लगता है"।

अतः इसे इसी नज़रिये से देखिए।   

धन्यवाद                                   

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 16, 2025 at 3:08pm

उचित है आदरणीय अजय जी ,अतिरंजित तो लग रहा है हालाँकि असंभव सा नहीं है....मेरा तात्पर्य कि रोजमर्रा की ज़िन्दगी में हम 'भगवान' को कोसते ही तो रहते थोड़ी ज्यादा बरसात हो "हे भगवान कितना पानी?"

गर्मी हो "हे प्रभु इतनी गर्मी?"
बाढ़ आये,दुर्घटना में कोई अपना जाये "हे भगवान ये क्या कर दिया"
लेकिन सुधार के प्रयास में "आह बुरा हो प्रेम तुम्हारा"  कैसा रहेगा?इससे दक्षिण,पश्चिम की शंका भी नहीं रहेगी
आपकी गरिमामयी उपस्थिति के लिए आपका हार्दिक आभार....
Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on June 14, 2025 at 8:04pm

अच्छी रचना हुई है ब्रजेश भाई। बधाई।

अन्य सभी की तरह मुझे भी “आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा” अतिरंजित लग रही है। हालाँकि रचनाकार की दृष्टि से आप इसके लिए बहुत स्पष्टीकरण दे चुके हैं पर पाठक की दृष्टि से देखना भी आवश्यक हो जाता है। 

बिना उपयुक्त संदर्भ के दक्षिण दिशा का आना भी असंबद्ध सा प्रतीत होता है। इस बारे में नीलेश जी का “पश्चिम” कहना तार्किक और उपयुक्त जान पड़ रहा है। विचार कीजियेगा 

धन्यवाद और पुनः बधाई 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 11, 2025 at 3:36pm

आदरणीय नीलेश जी "समझ कम" ऐसा न कहें आप से साहित्यकारों से सदैव ही कुछ न कुछ सीखने को मिल जाता है।

 

'कृष्ण' से पहले प्रेमी जिनका संसार अनुसरण करे 'महादेव' हैं लेकिन उनके प्रेम में 'नियति' विरह नहीं है।
आदरणीय वो 'प्रेमी' जिसके इर्द-गिर्द गीत का ताना बाना है जिसका प्रेयस कहीं दक्षिण में बसता है उसके लिए "ओ दक्षिण को जाते पंछी"
"रुत" शब्द को 'ऋतु' से परिवर्तित किया जा सकता है।
 
आगे आपकी सलाह महत्पूर्ण है...स्नेह बनाये रखें...सादर 
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 11, 2025 at 3:09pm

आदरणीय गिरिराज जी सदैव आपके स्नेह और उत्साहवर्धन को पाकर मन प्रसन्न होता है।

आप बड़ो से मैं पूर्णतया सहमत हूँ लेकिन "आह बुरा हो" एक विशेष समय और मनोस्थिति से उत्पन्न है।

उससे बेहतर और सटीक कुछ मेरी समझ नहीं आया।

सादर.... 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 11, 2025 at 2:55pm
आदरणीय रवि शुक्ला जी रचना की विस्तृत समीक्षा के लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन और आभार व्यक्त करता हूँ।

"कहीं नजर नहीं आता" में वाकई भूलवश मात्राभार अधिक हो रहा है उसे सुधार करता हूँ साथ ही "विचारे" शब्द को भी "हमारे" से प्रतिस्थापित करता हूँ।
 
आदरणीय 'प्रेयस' का ठिकाना सुदूर दक्षिण में कहीं है इसलिए "ओ दक्षिण को जाते पंछी" सिर्फ संदेश भेजने की बात है। 
"आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा" ये तो मुझे भी बहुत भारी प्रतीत हो रहा लेकिन प्रेम वियोग में तड़प रहा  प्रेमी ,प्रेयस के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। परिवार को, समाज को, ईश्वर को, किसी को भी कोस सकता है सिवाय 'प्रेयस' को छोड़कर। हालाँकि प्रसिद्द गीतकार और कवि 'आनंद बक्शी' साहब ने एक गीत "मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे" में प्रेयस को भी लपेटे में ले लिया। 
आगे आपकी सलाह महत्पूर्ण है....सादर 
Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 11, 2025 at 11:21am

आ. बृजेश जी 
मुझे गीतों की समझ कम है इसलिए मेरी टिप्पणी को अन्यथा न लीजियेगा.
कृष्ण से पहले भी कई प्रेमियों ने अपनी प्रेयसियों को छोड़ा होगा अत: रीत शुरू करने की बात अपील नहीं करती लग रही है.
फिर कृष्ण द्वारिका जा बसे थे अत: दक्षिण को पश्चिम कर लें तो बात संगत होगी.   
हिंदी के छात्रों द्वारा ऋतु को रुत लिखना थोडा खलता है.
शेष शुभ 
सादर  

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