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बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog (89)

ग़ज़ल-मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

121   22   121   22   121   22

अगर कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना

मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

बिना तुम्हारे  ये ज़िन्दगी अब  कटेगी कैसे

जो तू नहीं तो नफ़स की डोरी भी तोड़ देना

जरा  सी कोई  रहे  हरारत  न जान  बाकी

कि  जाते जाते  बदन  हमारा निचोड़ देना

कभी हमारे ग़मों पे तुझको दुलार आये

वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना

तेरे ग़मो का उसे न होगा पता, है मुमकिन

मगर सिरा 'ब्रज' उदासियों का न जोड़…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 7, 2021 at 10:30am — 11 Comments

ग़ज़ल-उदासी इस क़दर मुझमें उतरती जा रही है

1222      1222      1222      122

ग़मों की दिन-ब-दिन क़िस्मत सँवरती जा रही है

उदासी इस क़दर मुझमें उतरती जा रही है



अभी तो वक़्त है पतझर के आने में,हवा क्यों

चली ऐसी कि मन वीरान करती जा रही है



बहारों ने चमन लूटा मगर बाद-ए-सबा ये 

खिज़ाओं पे हरिक इलज़ाम धरती जा रही है



फ़िराक-ए-यार का मौसम बहुत नज़दीक…
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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2021 at 10:30am — 14 Comments

ग़ज़ल-और तुम हो

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

ज़िन्दगी में सिर्फ़ ग़म हैं और तुम हो

आज फिर से आँखें नम हैं और तुम हो

लग रहा है अब मिलन संभव नहीं है

वक़्त से लाचार हम हैं और तुम हो

रात चुप, है चाँद तन्हा, साँस मद्धम

इश्क़ में लाखों सितम हैं और तुम हो

दिल की बस्ती में अकेला तो नहीं हूँ

नींद से बोझिल क़दम हैं और तुम हो

क्या बताऊँ किसलिये है 'ब्रज' परेशां

वस्ल के आसार कम हैं और तुम हो

(मौलिक एवं अप्रकाशित)…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 18, 2021 at 9:30pm — 11 Comments

गीत-लोचन लोचन अश्रु बावरे बहते हैं अविराम (सरसी छंद)

विधान – 27 मात्रा, 16,11 पर यति, चरणान्त में 21 लगा अनिवार्य l कुल चार चरण, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत l

ह्रदय बसाये देवी सीता

वन वन भटकें राम

लोचन लोचन अश्रु बावरे

बहते हैं अविराम

सुन चन्दा तू नीलगगन से

देख रहा संसार

किस नगरी में किस कानन में

खोया जीवन सार

हे नदिया हे गगन,समीरा 

ओ दिनकर ओ धूप

तृण तृण से यूँ हाथ जोड़कर

पूछ रहे…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 10, 2020 at 7:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल-तुमसे ग़ज़ल ने कुछ नहीं बोला?

2122       2122        2122        2

चुप रहीं आँखें सजल ने कुछ नहीं  बोला

इसलिए  मनवा विकल ने कुछ नहीं बोला

भाव जितने हैं सभी को लिख दिया हमदम

क्या कहूँ! तुमसे ग़ज़ल ने कुछ नहीं बोला?

जिस  किनारे  बैठ  के  पहरों  तुम्हें  सोचूँ

उस जलाशय के कमल ने कुछ नहीं बोला?

एक  पत्थर  झील में  फेंका कि जुम्बिश हो

झील के  खामोश जल ने कुछ नहीं  बोला

साथ 'ब्रज' के रात भर पल पल रहे जलते

जुगनुओं  के नेक  दल ने…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 19, 2020 at 9:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल..कहीं लौकी कहीं कद्दू कहीं कटहल के ठेले हैं

मुफाईलुन*4

खरीदूँ कौन सी सब्जी बड़े लगते झमेले हैं

कहीं लौकी कहीं कद्दू कहीं कटहल के ठेले हैं

इधर भिन्डी बड़ी शर्मो हया से मुस्कुराती है

अजब नखरे टमाटर के पड़ोसी कच्चे केले हैं

तुनक में मिर्च बोली आ तुझे जलवा दिखाती हूँ

कहे धनिया हमें भी साथ ले लो हम अकेले हैं

शकरकंदी,चुकंदर ने सजाई नाज से महफ़िल

सुनाया राग आलू ने मगन बैगन,करेले हैं

घड़ी भर को जरा पहलु में लहसुन,प्याज आ बैठो

जुदाई में तुम्हारी 'ब्रज' ने…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2020 at 8:00pm — 7 Comments

गीत-तस्वीर तुम्हारी

सभी पंक्तियाँ 16-16 मात्राभार के क्रम में

घर के किस कोने में रख के

भूल गया तस्वीर तुम्हारी

रोज सवेरे से सिर धुनते

शाम ढले तक याद संभाली

एक सिरा न हाथ में आया

टुकड़े टुकड़े रात खंगाली

आँगन ढूढ़ा कमरा ढूढ़ा

ढूढ़ लिए दालान अटारी

घर के किस कोने में रख के

भूल गया तस्वीर तुम्हारी

देख पपीहे की अकुलाहट

आसमान में बादल आये

बुलबुल छेड़े खूब तराना

भँवरे फूलों पे मंडराये

तू भी कोयल बड़ी…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2020 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल-जैसा जग है वैसा ही हो जाऊँ तो

बह्र-ए-मीर
पतझर में भी गीत बसंती गाऊँ तो
जैसा जग है वैसा ही हो जाऊँ तो

अंदर का अँधियारा क्या छट जायेगा
कोशिश करके बाहर दीप जलाऊँ तो

शायद लौट चले आएं रूठे पलछिन
फूलों से जो उनकी राह सजाऊँ तो

कार्य हमारे भी सारे सध जायेंगे
सुविधा शुल्क लिये ये हाथ बढ़ाऊँ तो

जग सारा देखेगा 'ब्रज' के पांव फटे
जो चादर के बाहर पग फैलाऊँ तो


(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 14, 2020 at 10:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल-चाँद के चर्चे आसमानों में

लंबे अंतराल के बाद एक ग़ज़ल के साथ
2122 1212 22

चाँद के चर्चे आसमानों में
और मेरे सभी फसानों में

अय हवा बख्श दे अभी ये लौ
हैं अँधेरे गरीबखानों में

हम सुख़नवर से पीर ज़िंदा है
दर्द का मोल क्या दुकानों में

आँखों में आँसुओं का डेरा है
ख्वाब हैं क़ैद मर्तबानों में

पंछियों के लिए सदा रखना
कोई उम्मीद आबदानों में

दिल जला 'ब्रज' जरा सुकूँ आये
रौशनी भी रहे मकानों में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 8, 2020 at 3:16pm — 2 Comments

ग़ज़ल..डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212   1212    1212    1212



निगाह  में उदासियां  छुपा हुआ अज़ाब था

डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था

दिखी नहीं कली कहीं ख़ुशी से कोई झूमती

लबों लबों कराह और आँख आँख आब था

चमन में छा रही थीं बेशुमार बदहवासियां

न  टेसुओं  पे नूर था  न सुर्खरू  गुलाब था

मिला न साथ दे सका जो चाहिए मिला नहीं

थी चार दिन की ज़िंदगानी दर्द बेहिसाब था

फ़ुज़ूल थे सवाल और चीखना फ़ुज़ूल…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2019 at 12:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल-कुछ बन्द गीत के हैं कुछ शे'र हैं ग़ज़ल के-बृजेश कुमार 'ब्रज'

बहरे मज़ारिअ मुसम्मन मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुख़न्नक मक़्सूर

मफ़ऊलु फ़ाइलातुन मफ़ऊलु फ़ाइलातुन



ये वक़्त के फ़साने सब पैतरे हैं छल के

तुम भी बिखर न जाना यूँ मेरे साथ चल के

उस डायरी में तुमको कुछ भी नहीं मिलेगा

कुछ बन्द गीत के हैं कुछ शे'र हैं ग़ज़ल के

ये याद भी नही है शोला थ याकि शबनम

हालाँकि उस बला ने देखा तो था मचल के

अब क्या तुम्हें बताएं किस बात का गुमां है

कल रात चाँद मेरी छत पे गया टहल के

किस बात से…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 1, 2019 at 12:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल-लालफीताशाही-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मंच को प्रणाम करते हुए ग़ज़ल की कोशिश

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन

लालफीताशाही कितनी मिन्नतों को खा गई

ये व्यवस्था  ढेर  सारे  मरहलों  को खा गई

ये  कहा था  साहिबों  ने घर नये  देंगे  बना

साब की दरियादिली भी झोपड़ों को खा गई

अब तरक़्क़ी की बयारें इस क़दर काबिज़ हुईं

पेड़ तो काटे  जड़ों से कोपलों  को खा गई

कुछ गवाही दे रही है मयक़दे की रहगुज़र

मयकशी हँसते हुये कितने घरों को खा गई

भूख  से बेहाल…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 19, 2019 at 2:29pm — 10 Comments

नवगीत-वेदना तुझको बुलाऊँ-बृजेश कुमार 'ब्रज'

छा रहा नभ में अँधेरा

जुगनुओं  ने सूर्य घेरा

नेह भावों से  निचोड़ूँ  दीप  मैं घर घर  जलाऊँ

वेदना तुझको बुलाऊँ

रो दिए वीरान पनघट

टूट के बिखरे हुए घट

हैं बहुत मुश्किल समय के ये थपेड़े सह न पाऊँ 

वेदना तुझको बुलाऊँ

अश्रुओं से सिक्त वीणा

न कहूँ अंतस की पीड़ा 

रिक्त भावों से पड़े तो किस तरह ये गीत गाऊँ

वेदना तुझको बुलाऊँ…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 7, 2019 at 10:30am — 8 Comments

नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वेदना ने नेत्र खोले

रात ने उर लौ लगाई
चांदनी कुछ मुस्कुराई
आज फिर चन्दा गगन में बादलों के बीच डोले
वेदना ने नेत्र खोले

रातरानी खिलखिलाई
रुत रचाती है सगाई
आ गया मौसम बसंती प्रीत पंछी ले हिंडोले
वेदना ने नेत्र खोले

ओ बटोही देश आजा
छोड़कर परदेश आजा
टेरती कोयल सलोनी मन पपीहा नित्य बोले
वेदना ने नेत्र खोले
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 20, 2019 at 6:11pm — 8 Comments

ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं

बह्र ए मीर
अब तक रहे भटकते उजड़े दयार में
अब कौन बसा आन दिले बेक़रार में

जिस रास्ते पे  उनकी मन्ज़िलें  नहीं
उस  राह में  खड़े  हैं  इन्तज़ार  में

बेकार  हर सदा है कितना पुकारता
ये कौन सो रहा है गुमसुम मज़ार में

उस फूल को ख़िज़ायें ले के कहाँ गईं
जिस फूल को चुना था लाखों हजार में

ऐ मीत इस कदर भी मत आज़मा मुझे
आ जाये न कमी 'ब्रज' के ऐतबार में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 3, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

गीत-युगों से जुदा हैं नदी के किनारे-बृजेश कुमार 'ब्रज'

उन्हें कौन पूछे उन्हें कौन तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

उदासी उदासी उदासी घनेरी

विरह वेदना प्रीत की है चितेरी

अँधेरे खड़े द्वार पे सिर झुकाये

तभी रात ने स्वप्न इतने सजाये

उसी रात को छल गये चाँद तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

लगी रात की आँख भी छलछलाने

अँधेरा मगर बात कोई न माने

क्षितिज पे कहीं मुस्कुराया सवेरा

तभी रूठ कर चल दिया है अँधेरा

नजर रोज सुनसान राहें बुहारे

युगों से जुदा हैं नदी के…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 21, 2018 at 4:30pm — 10 Comments

गीत...दीप कहाँ से लाऊँ

इस गीत के साथ ओबीओ परिवार के सभी मनीषियों को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

सारा जग उजियारा कर दे

दीप कहाँ से लाऊँ

अंधकार ने फन फैलाया

मैला हर इक मन है

सूरज भी गुमसुम सा बैठा

विस्मित नील गगन है

मन को मनका मोती कर दे

सीप कहाँ से लाऊँ

सारा जग उजियारा कर दे

दीप कहाँ से लाऊँ

गली गली में घूमे रावण

हर घर में इक लंका

प्यार मुहब्बत भाईचारा

मिटने की आशंका

कण कण राम बिराजें ऐसा

द्वीप…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 6, 2018 at 11:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल...ले ली मेरी जान सलीके से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वो बैठा दिल में आन सलीके से

फिर ले ली मेरी जान सलीके से

यूँ ही पहले थोड़ी सी बात हुई

बन बैठे फिर अरमान सलीके से

पल भर को पहलू में आओ चन्दा

इतना तो कर अहसान सलीके से

काफी है पलकों का उठना गिरना

तू नैन कटारी तान सलीके से

दिल की दुनिया लूट गईं दो आँखें

फिर होती हैं हैरान सलीके से

कोने की उस जर्जर अलमारी में

रख छोड़े कुछ अरमान सलीके से

जिनको थी लाज बचानी कलियों की

बन…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 25, 2018 at 5:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल...लाज की मारी न रोये द्रोपदी

इस ग़ज़ल के साथ ओबीओ परिवार को नवरात्री की शुभकामनाएं.. जय माता की

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन

हर कली में देवियों का वास हो

पत्थरों को दर्द का अहसास हो

फिर कोई अवतार आये भूमि पे

निश्चरों को मृत्यु का आभास हो

लाज की  मारी न रोये  द्रोपदी

अब नहीं वैदेही को वनवास हो

पीर की तासीर जाओगे समझ

लुट चुका कोई तुम्हारा खास हो

बात इतनी सी समझते क्यों नहीं

घात मिलती है जहाँ बिस्वास हो

(मौलिक एवं…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 11, 2018 at 12:30pm — 17 Comments

गीत-इसलिये हैं नैन घायल आँसुओं से तर-ब-तर-बृजेश कुमार 'ब्रज'

किसलिये हैं नैन घायल

आँसुओं से तर-ब-तर?

फिर किसी सुनसान कोने

चीख कोई जो उठी

रात की खामोशियों में

रातरानी रो उठी

दानवी अट्टाहसों में

आह तड़पी घुट गई

टूटती साँसें समेटे

लड़खड़ाती वो उठी

इस कदर बरपी क़यामत

बन गई मातम सहर

इसलिये हैं नैन घायल

आँसुओं से तर-ब-तर

है नहीं जग में ठिकाना

आँख जाए नीर का

मोल कोई दे सकेगा

वेदना का पीर का

जिस नज़र पे था भरोसा

घात भी उससे मिली

हाथ…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 4, 2018 at 6:00pm — 20 Comments

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