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छुड़ाया  चाँद ने  दामन अँधेरी  रात में  आख़िर
परेशां  हूँ कमी  क्या है  मेरे ज़ज़्बात  में आख़िर

उसे कुछ कह नहीं सकता मगर चुप भी रहूँ कैसे
करूँ तो क्या करूँ उलझे हुए हालात में आख़िर

भुलाना  चाहता तो  हूँ मगर  मजबूरियाँ  भी  हैं
उसी की बात आ जाती मेरी हर बात में आख़िर

सुनो अय आँसुओं बेवक़्त का ढलना नहीं अच्छा
जलूँगा कब तलक मैं इस क़दर बरसात में आख़िर

मुख़ातिब हैं सभी मुझसे कि आगे और क्या है 'ब्रज'
मिले  हैं  ग़म  जुदाई  के  मुझे  ख़ैरात में  आख़िर

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 23, 2021 at 1:54pm

आदरणीय उपाध्याय जी हार्दिक आभार आपका...

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on May 30, 2021 at 5:25pm

"उसे कुछ कह नहीं सकता मगर चुप भी रहूँ कैसे
करूँ तो क्या करूँ उलझे हुए हालात में आख़िर"

वाह वाह ! बहुत सार्थक ग़ज़ल |  हार्दिक बधाई  बृजेश कुमार 'ब्रज जी | 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 20, 2021 at 7:23am

बहुत बहुत शुक्रिया भाई आज़ी तमाम जी...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 20, 2021 at 7:22am

हार्दिक आभार आदणीय धामी जी

Comment by Aazi Tamaam on May 19, 2021 at 9:47am

आ ब्रज जी सादर प्रणाम

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 17, 2021 at 9:08pm

आ. भाई ब्रिजेश जी, अभिवादन। बहुत खूबसूरत गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

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