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ग़ज़ल- एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी

2122 1212 22

बस यही इक फ़रेब खा बैठा
मैं उसे  ज़िन्दगी  बना  बैठा

एक  पत्थर है  ज़िन्दगी  मेरी
उसी पत्थर से दिल लगा बैठा

धूप  अपने  शबाब  पर आई
और साया भी  दूर जा  बैठा

ख़त्म  कैसे  भला  अँधेरा  हो
एक दीपक था जो बुझा बैठा

फिर ग़ज़ल रो पड़ी सरे महफ़िल
गीत फिर ग़म भरा सुना बैठा

'ब्रज' लिए है उदासियाँ अपनी
सामने  चाँद  अनमना  बैठा

(मैलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 23, 2021 at 1:16pm

रचना पटल पे आपकी उपस्थित उत्साहवर्धक है आदरणीय समर कबीर जी...सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 23, 2021 at 1:15pm

आदरणीय अमीरुद्दीन जी आपके और आदरणीय धामी जी के भाव बहुत ही खूबसूरत हैं...आपसे पूर्णतया सहमत हूँ...आप लोगों के सुझाव को समेटते हुए कुछ सुधार की कोशिश करता हूँ...सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 23, 2021 at 1:11pm

आदरणीय धामी जी उत्साहवर्धन और आपके खूबसूरत सुझाव के लिए आपका हार्दिक आभार...सादर

Comment by Samar kabeer on December 22, 2021 at 2:43pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on December 21, 2021 at 9:48pm

//एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी

  और पत्थर से दिल लगा बैठा...पर आपकी राय दीजिएगा...//

जनाब बृजेश जी, इस शे'र को सानी मिसरे के संदर्भ में देखें तो पहले मिसरे से ये आभास होता है कि मेरी (ख़ुद की) ज़िन्दगी पत्थर जैसी नीरस है 

और सानी तो स्पष्ट कह ही रहा है कि... मुझे प्यार भी किसी अपने जैसे पत्थर दिल से हो गया है।  जबकि...

'एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी

उसी पत्थर से दिल लगा बैठा'  इस शे'र को सानी मिसरे के संदर्भ में देखें तो पहले मिसरे से ये आभास होता है कि एक पत्थर जैसा जड़ और नीरस इन्सान मुझे इतना पसंद है जैसे वो मेरी ज़िन्दगी हो... और शायद इसी कारण मैं उस से दिल लगा बैठा हूँ। 

आप इस बह्र में शुरूअ के 21 को 11 पर ले सकते हैं। वैसे ग़ज़ल आपकी है भाव भी आप के ही रहेंगे, आपके भाव क्या हैं ये तो आपको ही पता होगा, जो उचित समझें। वैसे... आ. धामी जी का सुझाव भी उत्तम है अगर ये आपके भावानुकूल हो तो।. सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 21, 2021 at 8:51pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है हार्दिक बधाई। 

मेरे खयाल से ऐसा करना अधिक उचित रहेगा. 

फूल जैसी है ज़िन्दगी मेरी

और पत्थर से दिल लगा बैठा

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 21, 2021 at 8:34pm

स्वागत संग आभार आदरणीय अमीरुद्दीन जी...बिल्कुल आपसे सहमत हूँ..

एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी

और पत्थर से दिल लगा बैठा...पर आपकी राय दीजिएगा...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 21, 2021 at 8:32pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय नीलेश जी...आपके बताए अनुसार कुछ सुधार करता हूँ...

एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी

और पत्थर से दिल लगा बैठा ...ये कैसा रहेगा ?

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on December 20, 2021 at 9:34pm

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं। दूसरे शे'र पर निलेश जी से सहमत हूँ, एक विकल्प और देखें - 

'एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी

उसी पत्थर से दिल लगा बैठा'  सादर।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 20, 2021 at 5:40pm

आ. बृजेश जी 

अच्छी ग़ज़ल हुई है .. बधाई 
एक पत्थर है ज़िन्दगी मेरी
एक पत्थर से दिल लगा बैठा  इसे यूँ देखें ...
.
ज़िन्दगी मेरी हो गयी  पत्थर 
जब से पत्थर से दिल गला बैठा 
.
सादर 

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