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रोहिताश्व मिश्रा
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रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"थैंक्यू भाई"
Jun 27
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"शुक्रियः विजय जी"
Jun 27
सतविन्द्र कुमार राणा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"वाह गजब मुबारकां आ रोहितभाई"
Jun 10
vijay nikore commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"गज़ल अच्छी लगी। बधाई।"
Jun 10
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"बहुत बहुत शुक्रियः मुसाफ़िर सर गुमनाम सर ब्रजेश सर"
Jun 9
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"भई वाह मिश्रा जी क्या शानदार ग़ज़ल कही है...हर एक शेर बेहतरीन.."
Jun 9
gumnaam pithoragarhi commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"वाह बेहद खूबसूरत ग़ज़ल ....वाह"
Jun 8
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"आ. भाई रोहित जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Jun 8
रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"बहुत बहुत शुक्रियः सर"
Jun 7
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"मेरी शिकस्त की ख़बर नफ़स नफ़स में रच गई,था जिसमें ज़िक्र फ़तह का वो इश्तेहार जल गया।...............वाह.....आदरणीय भाई मिश्रा जी ....बहुत ही कामयाब ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई..........."
Jun 7
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Jun 6
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रोहिताश्व मिश्रा commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post एक कोशिश
"बहुत बहुत शुक्रियः सर Thanku"
Nov 26, 2017

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ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

बहुत दिनों था मुन्तज़िर फिर इन्तिज़ार जल गया।

मेरे तवील हिज्र में विसाल-ए-यार जल गया।

मेरी शिकस्त की ख़बर नफ़स नफ़स में रच गई,

था जिसमें ज़िक्र फ़तह का वो इश्तेहार जल गया।

मैं इंतिख़ाब-ए-शमअ में ज़रा सा मुख़्तलिफ़ सा हूँ,

मेरे ज़रा से नुक़्स से मेरा दयार जल गया।

मुझे ये पैकर-ए-शरर दिया था कैसे चाक ने,

मुझे तो सोज़ ही मिला मेरा कुम्हार जल गया।

पनाह दी थी जिसने कितने रहरवों को…

Continue

Posted on June 5, 2018 at 1:00pm — 10 Comments

एक कोशिश

फ़इलातु फ़ाइलातुन फ़इलातु फ़ाइलातुन

ये जो राबिता है अपना फ़क़त एक शे'र का है।

कोई इक रदीफ़ है तो कोई उसका क़फ़िया है।

है अजीब ख़ाहिश-ए-दिल कि रहूँ गा साथ ही में,

मैं हबीब हूँ हवा का मेरा आश्ना दिया है।

कभी मुझ से आके पूछो सर-ए-शाम बुझ गया क्यों,

कभी उस तलक भी जाओ कि जो दिन में भी जला है।

कभी कश्तियों को छोड़ो दिले आबजू में उतरो,

मेरे पास आके देखो मेरे दिल में क्या छिपा है।

मेरा क्या है मेरी मंज़िल मुझे ढूँढ…

Continue

Posted on November 22, 2017 at 11:30am — 4 Comments

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।

12122/12122

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
करीब मुझ को' बुला रहा था।

वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स,
मगर दिये भी जला रहा था।

वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में,
न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।

सबक़ मुहब्बत का' हम से' पढ़ कर,
हमें मुहब्बत सिखा रहा था।

बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"।
नहीं तो' ये आईना रहा था।

रोहिताश्व मिश्रा, फ़र्रुखाबाद

मौलिक एवम अप्रकाशित

Posted on April 18, 2017 at 1:30pm — 15 Comments

कब ख़ुद को मुख्तार करोगे

22/22/22/22



तूफाँ से गर प्यार करोगे,

बाहों को पतवार करोगे।



अब कर दो इज्हार-ए-मुहब्बत,

कब तक छुप छुप प्यार करोगे।



छोड़ोगे कब हुक़्म बजाना,

कब ख़ुद को मुख्तार करोगे।



पेश आएंगे सभी अदब में,

जब खुद शिष्ट आचार करोगे।



दरिया पार तभी होगा जब,

ज़र्फ़ अपना पतवार करोगे।



इश्क़ में' हद से' गुज़रने वालों,

तुम ख़ुद को बीमार करोगे।



शाम हुई फैला अँधियारा,

जाने कब इज़्हार* करोगे।

*चराग़ रौशन करना…

Continue

Posted on February 15, 2017 at 4:30pm — 11 Comments

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At 4:24pm on December 20, 2016, रोहिताश्व मिश्रा said…
शुक्रियः सर
At 1:56pm on May 21, 2016, रोहिताश्व मिश्रा said…
तुम इस को बन्द कर लो लाख़ पहरों मे भले रोहित ।
मगस को लौट कर जलाने शमा के पास जाना है।।
At 1:24am on November 22, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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