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ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

बहुत दिनों था मुन्तज़िर फिर इन्तिज़ार जल गया।
मेरे तवील हिज्र में विसाल-ए-यार जल गया।

मेरी शिकस्त की ख़बर नफ़स नफ़स में रच गई,
था जिसमें ज़िक्र फ़तह का वो इश्तेहार जल गया।

मैं इंतिख़ाब-ए-शमअ में ज़रा सा मुख़्तलिफ़ सा हूँ,
मेरे ज़रा से नुक़्स से मेरा दयार जल गया।

मुझे ये पैकर-ए-शरर दिया था कैसे चाक ने,
मुझे तो सोज़ ही मिला मेरा कुम्हार जल गया।

पनाह दी थी जिसने कितने रहरवों को धूप से,
सुना है अबकी धूप में वही चिनार जल गया।

ये ख़ाहिश-ए-मुनव्वरी ही मुझ को ख़ाक कर न दे,
मैं शम्स तोड़ने की ज़िद में कितनी बार जल गया।

- 'रोहित-रौनक़'

फ़र्रुखाबाद

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by रोहिताश्व मिश्रा on June 27, 2018 at 11:36am

थैंक्यू भाई

Comment by रोहिताश्व मिश्रा on June 27, 2018 at 11:36am

शुक्रियः विजय जी

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 10, 2018 at 1:56pm

वाह गजब मुबारकां आ रोहितभाई

Comment by vijay nikore on June 10, 2018 at 1:15am

गज़ल अच्छी लगी। बधाई।

Comment by रोहिताश्व मिश्रा on June 9, 2018 at 2:45pm
बहुत बहुत शुक्रियः
मुसाफ़िर सर
गुमनाम सर
ब्रजेश सर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 9, 2018 at 2:33pm

भई वाह मिश्रा जी क्या शानदार ग़ज़ल कही है...हर एक शेर बेहतरीन..

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 8, 2018 at 1:28pm
  1. वाह बेहद खूबसूरत ग़ज़ल ....वाह
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2018 at 1:11pm

आ. भाई रोहित जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by रोहिताश्व मिश्रा on June 7, 2018 at 4:15pm
बहुत बहुत शुक्रियः सर
Comment by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on June 7, 2018 at 4:13pm

मेरी शिकस्त की ख़बर नफ़स नफ़स में रच गई,
था जिसमें ज़िक्र फ़तह का वो इश्तेहार जल गया।...............वाह.....आदरणीय भाई मिश्रा जी ....बहुत ही कामयाब ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई...........

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