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gumnaam pithoragarhi
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gumnaam pithoragarhi commented on santosh khirwadkar's blog post दिल ये कैसे बदल गया
"वाह छोटी बह्र में खूब ग़ज़ल।कही है...."
Sep 12, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"वाह वाह सर जी वाह,,,,,,,,,,,,,,,, बधाई"
Mar 24, 2017
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"ग़ज़ल अच्छी लगी ............. बधाई"
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gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"जी सर कुछ जल्दबाजी ज्यादा हो गयी ......माफ़ी ...... "
Mar 24, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
" वाह भाई जी खूब ग़ज़ल कही है बधाई ............."
Mar 24, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"एक ख़त कोरा उन्हें भेजा है अब की बार भी'जिनको लिखना था वो सब बातें जुबानी हो गईं अच्छी गज़ल हुई है भाई जी ............"
Mar 24, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"वाह सर अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई /////////////"
Mar 24, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"वाह ग़ज़ल अच्छी लगी बधाई ...............आधुनिक जीवन शैली को शामिल करना अच्छा लगा ,,,,,,,,,,,,"
Mar 24, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"वाह सर विस्तार में चर्चा कर जानकारी का शुक्रिया ............... "
Mar 24, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"वाह सर जी खूब ग़ज़ल कही है बधाई ..............."
Mar 24, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"है परेशां रामधन बेटी सयानी हो गयी  झूठ कहते ये प्रथा अब पुरानी हो गयी खुदपरस्ती आज सबके दिल की रानी हो गयी देखकर इंसानियत ये पानी पानी हो गयी  घर,दिवारें ,फूल ,आँगन बोर करते थी मगर इक तुम्हारे फोन से हर शय सुहानी हो गयी नोट बंदी जब हुई…"
Mar 24, 2017
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-72
"वाह भाई जी वाह क्या खूब हज़ल कही वाह ./"
Jun 25, 2016
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-72
"  मैं रो रहा था बारहा भाई की कब्र पर वह हाथ दाहिना था मिरा हाथ कट गया      वाह कमाल ग़ज़ल ........... बधाई "
Jun 25, 2016
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-72
"  हाँ बर्फ सी जमी तो मेरे चारों ओर है पर क्या  हुआ कि रिश्ता नमी से ही कट गया वाह बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है बधाई ///////"
Jun 25, 2016
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-72
"इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई "
Jun 24, 2016
gumnaam pithoragarhi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-72
"जाये कोई परिंदा कहाँ, प्यास जो लगे।शह्रों का इंच इंच तो पत्थर से पट गया।। वाह बहुत खूब सर ,,,,,,,,,,,, कमाल ग़ज़ल वाह "
Jun 24, 2016

Profile Information

Gender
Male
City State
pithoragarh
Native Place
pithoragarh
Profession
teaching
About me
sahity ki dunia me jana pahachana naam hona chahta hoon............

gazal

धड़कता है गुनगुनाता है बतियाता है लेकिन

ख़त कि तरह मोबईल महकता नहीं है

--------------------------------------------------------------

मज़हब की किताबों के पैगाम बदल देते हैं

नानक और ईसा के नाम बदल देते हैं

फिर न होगी शिकायत किसी को ज़माने में

लाओ पैगम्बर से राम बदल देते हैं

----------------------------------------------------------------------------

ऐ वाइज़ तू क्यों फिकर में रहता है

सारा निज़ाम उसकी नज़र में रहता है

सिर्फ दैरो हरम नहीं ठिकाना उसका

हर जर्रे में वो हर बशर में रहता है

 

 

 

अप्रकाशित व मौलिक -------------------------------------

Comment Wall (6 comments)

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At 1:22pm on March 24, 2015, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय गुमनाम जी ..महेनी का सक्रीय सदस्य चुने जाने पर मेरी तरफ से भी हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

At 2:50pm on March 19, 2015, jaan' gorakhpuri said…

भाई गुमनाम जी 'महीने का सक्रिय सदस्य' के रूप में आप को देखकर अपार हर्ष हो रहा है! बहुत बहुत बधाईयां!!

At 6:46pm on March 18, 2015, pratibha tripathi said…

आदरणीय गुमनाम पिथौरागडी जी आपको इस महीने के सक्रिय सदस्य चुने जाने पर बधाई देती हूँ ,सादर ।

 

At 8:22pm on March 15, 2015, maharshi tripathi said…

आ.गुमनाम पिथौरागढ़ी जी आपको विगत माह का सक्रिय सदस्य चुने जाने पर हार्दिक बधाई |

At 12:40pm on March 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय
गुमनाम पिथौरागढ़ी जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 10:46pm on January 28, 2015, vijay said…
गुमनाम जी इस ग़ज़ल पर कोई काम हो तो बताएं
आपकी पिछली टिप्पणी से साहस मिला
धन्यवाद

Gumnaam pithoragarhi's Blog

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२२  २१२२  २१२२  २१२

बेवफा ने जब जफ़ा के दस बहाने रख दिए

हमने भी तब जख्म अपने सब छुपा के रख दिए

भूख भी ये हार बैठी हौसले को देख कर

मुफलिसों ने आज फिर से देख रोजे रख दिए

फोन ने तो चीन डाला बचपना अब बच्चों का

टाक पर दादी के किस्से हमने सारे रख दिए

अब बुजुर्गों की कोई कीमत नहीं संसार में

आश्रमों के द्वार पर बूढ़े बिचारे रख दिए

जालिमों का जोर क्यों बढ़ने लगा है आज कल

यूँ भला सच की जुबां पर…

Continue

Posted on February 25, 2016 at 10:02pm — 3 Comments

एक रुकनी ग़ज़ल ... गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२ 

ज़िन्दगी भर

मौत का डर 

प्यार तो है

ढाई आँखर

तोड़ पिंजरा

आजमा पर

ये सियासत

एक अजगर

होश जख्मी

हुस्न खंजर

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Posted on January 4, 2016 at 7:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२  २१२ 

आपका नाम था

मेरा तो जाम था

हर किसी धर्म में

प्यार पैगाम था

रब मिला ही नहीं

उससे कुछ काम था

वो ख़ुदा था कहीं

पर कहीं राम था

थी ख़ुशी ख़ास में

गम मगर आम था

प्रेम इंसानियत

अब भी गुमनाम था

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Posted on December 30, 2015 at 7:28pm

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२ २१२ २१२ २१२

इक सवाल आँखों में ही बसा रह गया

यूँ लगे जैसे इक ख़त खुला रह गया

रेल से वो चली शहर ये छोड़कर

और टेशन पे  मैं बस खड़ा रह गया

दाग गिनवा रहा था जमाने के मैं

सामने मेरे बस आइना रह गया

वक़्त सा वैध भी कर ना पाया इलाज

देखिये ज़ख्म तो ये हरा रह गया

शख्स हर जानता जिंदगी है सफ़र

मंजिलें हर कोई ढूंढता रहा गया

दम निकलते समय भूला मैं रब को भी

इन लबों पर तेरा नाम सा…

Continue

Posted on December 22, 2015 at 8:27pm — 10 Comments

 
 
 

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