For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s Blog (101)

आज़ादी के पुनीत पर्व पर वीर रस की कविता

आज पुनः जब मना रहे हम, वर्षगाँठ आज़ादी की

आओ थोड़ी चर्चा करलें, जनगण मन आबादी की

जिन पर कविता गीत लिखूँ तो, झर-झर आँसू आते हैं

रोम-रोम में सिहरन होती, भाव सभी मर जाते हैं।।1

ऐसे भी हैं यहाँ कई जो, घर को सर पर ढोते हैं

घोर अँधेरा फुटपाथों पर, बिना बिछौना सोते हैं

गर्मी में तन झुलसे उनका, सर्दी हाड़ कँपाती है

तब जश्ने आज़ादी अपनी, उनको ख़ूब चिढ़ाती है।।2

भूखा प्यासा उलझा बचपन, भटक रहा अँधियारों में

फूटी क़िस्मत खोज रहा वह, कूड़े के गलियारों…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on August 15, 2020 at 12:07pm — 8 Comments

गजल- कोख में आने से साँसों के ठहर जाने तक

बह्र- 2122   1122   1122  112/22

कोख में आने से साँसों के ठहर जाने तक

ज़िन्दगी में सकूँ मिलता नहीं मर जाने तक

मुफ़लिसी नेक दिली और ज़माने का दर्द

ये सभी सिर्फ़ सियासत में उतर जाने तक

शादी लड्डू ही नहीं एक बला है इसका

होता अहसास नहीं पंख कतर जाने तक

यार बरसात किसे अच्छी नहीं लगती मगर

खेत खलियान नदी ताल के भर जाने तक

हर तरफ़ शह्र में ख़ूँख़ार दरिन्दे घूमें

बेटियाँ ख़ौफ़ज़दा लौट के घर जाने…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on August 4, 2020 at 6:11am — 10 Comments

ग़ज़ल -दौर वह यारो गया और उसके दीवाने गए

बह्र- 2122  2122  2122  212

मीडिया की फ़ौज लेकर रह्म कब खाने गए

झोपड़ी में सिर्फ़ वे दिल अपने बहलाने गए

रेडियो से ही हुआ करती थी सुब्ह-ओ-शाम जब

दौर वह यारो गया और उसके दीवाने गए

नीम पीपल छाँछ लस्सी बाजरे की रोटियाँ

ज़िन्दगी से गाँव की ये सारे अफ़साने गए

जोड़ते थे जो दिलों को अपनी माटी से यहाँ

फ़ाग चैता और कजरी के वे सब गाने गए

पूछने पर लाल के माँ ने कहा पापा तेरे

ओढ़कर प्यारा तिरंगा चाँद को लाने…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 30, 2020 at 11:16am — 14 Comments

ग़ज़ल- हाँ में हाँ लोग जो होते हैं मिलने वाले

2122  1122  1122  22

हाँ में हाँ लोग जो होते हैं मिलाने वाले

हैं पस-ए पुश्त मियाँ ज़ुल्म वो ढाने वाले

अपने चहरे के उन्हें दाग़ नज़र आ जाते

देखते ख़ुद को जो आईना दिखाने वाले

पाप धुलते नहीं इस तरह बता दो उनको

हैं जो कुछ लोग ये गंगा में नहाने वाले

हो क़फ़स लाख वो फ़ौलाद का लेकिन यारो

रोक सकता नहीं उनको जो हैं जाने वाले

आपसे वादा निभाएँगे भला वो कैसे

वादा ख़ुद का न कभी ख़ुद से निभाने वाले

आप…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 18, 2020 at 4:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल- रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर

रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर

कोई अंकुश नहीं लगाता इन सरमाया दारों पर।

मजदूरों का जीवन देखो कितना मुश्किल होता है

बिस्तर पास नहीं जब होता सो जाते अख़बारों पर।

भूक ग़रीबी ज्यों की त्यों क्यों तख़्त नशीं कुछ तो बोलो

दोष मढ़ोगे कब तक आख़िर पिछली ही सरकारों पर।

वक़्त नहीं है पास किसी के सबको अपनी आज पड़ी

दौर पुराना ख़्वाब लगे जब भीड़ जुटे चौबारों पर।

बच्चे झुककर बात करेंगे घर के सारे लोगों से

आईने जब लग जाएँगे घर…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 12, 2020 at 12:59pm — 10 Comments

ग़ज़ल -पुराने गाँव की अब भी कहानी याद है हमको

था सब आँखों में मर्यादा का पानी याद है हमको

पुराने गाँव की अब भी कहानी याद है हमको।

भले खपरैल छप्पर बाँस का घर था हमारा पर

वहीं पर थी सुखों की राजधानी याद है हमको

वो भूके रहके ख़ुद महमान को खाना खिलाते थे

ग़रीबों के घरों की मेज़बानी याद है हमको

हमारे गाँव की बैठक में क़िस्सा गो सुनाता था

वही हामिद के चिमटे की कहानी याद है हमको

सलोना और मनभावन शरारत से भरा बचपन

अभी तक मस्त अल्हड़ ज़िंदगानी याद है…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 11, 2020 at 12:00pm — 14 Comments

गीत- मैं पुरुष हूँ! मात्र इस हित, मत करो अपमान मेरा

भूल कर सब प्रेम करुणा त्याग तप बलिदान मेरा

मैं पुरुष हूँ! मात्र इस हित, मत करो अपमान मेरा

राम सा आदर्श मानव औ' भरत सा भ्रात मैं हूँ

दुश्मनों के वक्ष पर करता रहा आघात मैं हूँ

मैं प्रतिज्ञा भीष्म की हूँ, मैं युधिष्ठिर धर्मकारी

पार्थ का गांडीव मैं हूँ, मैं सुदर्शन चक्र-धारी

शौर्य है श्रृंगार मेरा, रण-विजय ही गान मेरा

मैं पुरुष हूँ! मात्र इस हित, मत करो अपमान मेरा।।

भूमिका मेरी यहाँ बेटा, पिता, पति, भ्रात की है

माप रखता जो हमेशा…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on June 15, 2020 at 11:30am — 13 Comments

गीत -आचरण आदर्श के गायब हुए, विपदा बड़ी है

क्रोध तम मद-लोभ ईर्ष्या में पड़ा संसार सारा

आचरण आदर्श के गायब हुए, विपदा बड़ी है।।

छोड़ अन्तस का शिवालय भ्रम मनुज लाने चला है

शोर के गहरे तमस में मौन को पाने चला है

पास उसके आत्म दर्पण है नहीं जो राह रोके

जी रहा है वह स्वयं की जिन्दगी में कण्ट बोके

सत्य है नेपथ्य में बस मूर्खता मन में अड़ी है

आचरण आदर्श के गायब हुए, विपदा बड़ी है।।

मस्त सब हैं छोड़कर सिद्धांत सारे सभ्यता के

मन अपाहिज वस्त्र चिथड़े किंतु साधक भव्यता के

जब पलट के…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on June 12, 2020 at 7:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल- हर कोई अनजान सी परछाइयों में क़ैद है

जानकर औक़ात अपनी वो हदों में क़ैद है

हर परिंदा आज अपने घोंंसलों में क़ैद है।।

जीत लेगा मौत को भी आदमी यूँ एक दिन

इस तरह की सोच सबकी हसरतों में क़ैद है।।

क्रोध लालच दम्भ नफ़रत ज़ात मजहब को लिए

हर कोई अनजान सी परछाइयों में क़ैद है।।

कब कहाँ किस को दग़ा दें रहनुमा इस देश के

झूठ मक्कारी तो उनकी आदतों में क़ैद है।।

जिस शजर की छाँव में बारात सजती थी कभी

आज वो वीरान बनके रतजगों में क़ैद है।।

टूट कर ख़ामोश जो…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on June 5, 2020 at 3:00pm — 15 Comments

कह मुकरियाँ

आकर वह आँचल में सोये

प्रेम दिखाए नैन भिगोये

मेरा है वह आज्ञापालक

क्या सखि साजन? ना सखि बालक।।1

समझो उसको ज्ञान प्रदाता

जो चाहो वह ढूँढ़ के लाता

बहुत चलन में आज और कल

क्या सखि शिक्षक? ना सखि गूगल।।2

नई बहू पर डाले फन्दा

सास ननद को रखे सुनन्दा

हर पत्नी का वो सहजीवी

क्या सखि गहना? ना सखि टीवी।।3

आता है वह स्वेद बहाने

ओंठ छुवन से प्यास बढ़ाने

बरते तनिक नहीं वह नरमी

क्या सखि साजन? ना सखि…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 9, 2020 at 7:00am — 7 Comments

कोरोना काल पर छन्न पकैया

छन्न पकैया छन्न पकैया, दूषित है हर कोना

जिसको दुनिया बोल रही है कोरोना -कोरोना।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, हिम्मत तनिक न खोना

यह केवल इक असुर शक्ति है, चीनी जादू टोना।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, सबको यह समझाएँ

अपने-अपने घर रह कर ही, आओ इसे हराएँ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, हो सामाजिक दूरी

मास्क लगाकर घर से निकलें, जब हो बहुत जरूरी।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, सबको बात बताना

हाथ जोड़कर करें नमस्ते, हाथ न कभी…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 8, 2020 at 11:18am — 7 Comments

मजदूर को समर्पित एक रचना

पास उसके शक्ति श्रम की, पास उसके नूर है

वह जगत निर्माण करता अलहदा मजदूर है।।

घर खुला आकाश उसका औ शयन को है धरा

अस्थि पंजर शेष काया देख लगता अधमरा।।

भूख पीड़ित वो, नहीं कुछ और बातें सोचता

क्लेश चिन्ता दीनता तन रुग्ण यौवन नोचता।।

पास उसके पेट, भोजन चाहिए हर हाल में

ढूंढता जिसको फिरे वो ज़िन्दगी जंजाल में।।

वो बनाया ताज लेकिन नृप हुआ मशहूर है

जात क्या औ धर्म क्या मजदूर तो मजदूर है।।

पाँव…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 2, 2020 at 7:30pm — 16 Comments

कोरोना पर छप्पय छंद में कुछ रचनाएँ

(सूत्र रोला + उल्लाला = छप्पय छंद)



लेकर लाखों पाँव, एक आया संहारी

चुप सारे दरवेश, पादरी सन्त पुजारी

जीवन गति अवरूद्ध, क्रुद्ध हों ईश्वर जैसे

नहीं किसी को ज्ञान, कटे यह विपदा कैसे

दिखे नहीं उम्मीद अब, मंदिर मस्जिद धाम से

आज सभी भयभीत हैं, कोरोना के नाम से।।1



जिव्हा का कुछ स्वाद, पड़ा हम सब पर भारी

खाया जो आहार, उसी ने दी बीमारी

पर अपना क्या दोष, चीन यह समझ न पाया

खाकर कुत्ता गिद्ध, भयंकर रोग बुलाया।।

जिससे जग गति थम गई, डर फैला… Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 27, 2020 at 6:24am — 6 Comments

विरोध पर पञ्चचामर छंद में रचना

पञ्चचामर छंद

सूत्र : जगण + रगण + जगण + रगण + गुरु

शरीर लोकतन्त्र तो विरोध एक वस्त्र है

विरोध एक नाम है विरोध अस्त्र शस्त्र है

न अंधकार हो कहीं विरोध वो मशाल है

विरोध एक आग है विरोध क्रांति भाल है।।1

विरोध कीजिए भले, विकास को न रोकिये

विपक्ष पक्ष साथ हो, तुरन्त आप टोकिये

कभी विरोध नाम से यहाँ न तोड़ फोड़ हो

विरोध हो विरोध सा, विरोध में न होड़ हो।।2

अनीति या कुरीति का सदा विरोध कीजिए

भविष्य…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 25, 2020 at 11:05am — 4 Comments

पिता पर मत्त गयंद छंद में एक रचना

मत्त गयंद छंद

हाथ रखा जिसने सिर पे वह जीवन सम्बल शक्ति पिता है

प्रेम प्रशासन औ अनुशासन प्यार दुलार विभक्ति पिता है

रीढ़ झुकी उसके तन की पर वज्र दधीचि प्रसक्ति पिता है

तीर्थ बसें जग के जिसमें सब पूजित वो इक व्यक्ति पिता है।।1

खार बिछावन हो अपना सुत सेज रखे पर फूल पिता है

पुत्र हजार करे गलती पर माफ़ करे सब भूल पिता है

होकर आज बड़ा सुत जो कुछ है उसका सब मूल पिता है

पूत कपूत सपूत बने, बनता न कभी प्रतिकूल पिता है।।2

शौक सभी…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on April 23, 2020 at 8:30am — 8 Comments

ग़ज़ल (चाहा था हमने जिसको हमें वो मिला नहीं)

सम्मान हम किसी का करें कुछ बुरा नहीं

पर आदमी को आदमी समझें, ख़ुदा नहीं।।1

ये सोच कर ही ख़ुद को तसल्ली दिया करें

दुनिया में ऐसा कौन है जो ग़म ज़दा नहीं।।2

बस मौत ही तो आख़री मंज़िल है दोस्तो

इससे बड़ा जहान में सच दूसरा नहीं।।3

हमको तमाम उम्र यही इक़ गिला रहा

चाहा था हमने जिसको हमें वो मिला नहीं।।4

इसको सुनो दिमाग़ से तब आएगा मज़ा

ये शाइरी है यार कोई चुटकुला नहीं।।5

लेती है हर क़दम पे नया इम्तिहान ये…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 20, 2020 at 2:30pm — 10 Comments

भारत दर्शन (द्वितीय कड़ी) मत्त गयंद छंद

वैभव औ सुख साधन थे उनको पर चैन नही मिल पाया

कारण और निवारण का हर प्रश्न तथागत ने दुहराया

घोष हुआ दिवि घोष हुआ भ्रम का लघु बंधन भी अकुलाया

गौतम से फिर बुद्ध बने जग विप्लव शंशय पास न आया।।1

गौतम बुद्ध जहाँ तप से हिय दिव्य अलौकिक दीप जलाए

मध्यम मार्ग चुना अनुशीलन राह यहीं जग को बतलाये

रीति कुरीति सही न लगे यदि क्यों फिर मानव वो अपनाए

तर्क वितर्क करो निज से, धर जीवन संयम को समझाये।।2

गाँव जहाँ ब्रज गोकुल से हिय में अपने जन प्रेम…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 7, 2020 at 5:30pm — 6 Comments

भारत दर्शन (प्रथम कड़ी) मत्त गयंद छंद

जन्म लिया जिस देश धरा पर वो हमको लगता अति प्यारा

वैर न आपस में रखते वसुधैव कुटुम्ब लगे जग सारा

पूजन कीर्तन साथ जहाँ सम मन्दिर मस्जिद या गुरुद्वारा

लोग निरोग रहे जग में नित पावन सा इक ध्येय हमारा।।1

पूरब में जिसके नित बारिश, हो हर दृश्य मनोरम वाला

लेकर व्योम चले रथ को रवि वो अरुणाचल राज्य निराला

गूढ़ रहस्य अनन्त छिपा पहने उर पादप औषधि माला

जो मकरन्द बहे घन पुष्पित कानन को कर दे मधुशाला।।2

उत्तर में जिसके प्रहरी सम पर्वत राज हिमालय…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 3, 2020 at 5:00pm — 9 Comments

नववर्ष की शुभकामनाएं (मत्तगयंद छंद)

स्वागत हेतु सजी धरती उर में बहु सौख्य-समृद्धि पसारे

राग विराग हुआ सुर सज्जित हर्षित अम्बर चाँद सितारे

भव्य करो अभिनन्दन वन्दन लेकर चन्दन अक्षत प्यारे

स्नेह लिए नव अंकुर का अब द्वार खड़ा नव वर्ष तुम्हारे।।1

नूतन भाव विचार पले जड़ चेतन में निरखे छवि प्यारी

एक नया दिन जीवन का यह, हो जग स्वप्निल मंगलकारी

ओज अनन्त बसे सबके हिय राह नई निरखें नर नारी

दैविक दैहिक कष्ट न हो वरदान सुमंगल दें त्रिपुरारी।।2

प्यार दुलार करें सबसे नित, दुश्मन को हम…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on December 31, 2019 at 6:00pm — 12 Comments

कुछ ज्वलन्त विषयों पर कुण्डलिया

नशाख़ोरी

करते हैं जन जो नशा, होता उनका नाश

तिल-तिल गिरते पंक में, बनते हैं अय्याश

बनते हैं अय्याश, नष्ट कर कंचन काया

रिश्तों को कर ख़ाक बनें लगभग चौपाया

छपती खबरें रोज न जाने कितने मरते

युवा वर्ग गुमराह नशा जो हर दिन करते।।1

जरदा गुटखा पान सँग, बीड़ी औ' सिगरेट

अब यह कैसे बन्द हो, इस पर करें डिबेट

इस पर करें डिबेट, किया क्या हमने अब तक

आसानी से नित्य पहुँचता क्यों यह सब तक

बालक, वृद्ध, जवान न करते इनसे…

Continue

Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on November 28, 2019 at 7:30pm — 8 Comments

Monthly Archives

2020

2019

2018

2017

2016

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post तरही ग़ज़ल
"जनाब नाहक़ साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिय:"
7 hours ago
dandpani nahak commented on Samar kabeer's blog post तरही ग़ज़ल
"परम आदरणीय समर कबीर साहब प्रणाम बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! सभी शैर एक से बढ़कर…"
8 hours ago
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post तरही ग़ज़ल
"मुहतरमा वीणा गुप्ता जी आपका बहुत बहुत शुक्रिय:"
10 hours ago
Veena Gupta commented on Samar kabeer's blog post तरही ग़ज़ल
"खूबसूरत ग़ज़ल,कबीर जी बधाई "
10 hours ago
सालिक गणवीर posted a blog post

मार ही दें न फिर ये लोग मुझे.....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1212 22/112 जाँ से प्यारे हैं सारे लोग मुझेमार देंगे मगर ये लोग मुझे(1)मुझको पानी से प्यार है…See More
14 hours ago
Samar kabeer commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post मुफलिसी में ही जिसका गुजारा हुआ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"'ऐसा हलधर न शासन को प्यारा हुआ' अब ठीक है ।"
16 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post मार ही दें न फिर ये लोग मुझे.....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी , सादर अभिवादन । गजल का प्रयास अच्छा हुआ है ।हार्दिक बधाई । आ. समर जी के…"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post मुफलिसी में ही जिसका गुजारा हुआ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"आ भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और मार्गदर्शन के लिए आभार । मतले का शानी बदलने का…"
17 hours ago
PHOOL SINGH posted a blog post

वृक्ष की पुकार

नहीं माँगता जीवन अपना, पर बेवजह मुझको काटो नाजो ना आये जहां में अब तक, उनके लिए भी वृक्ष छोड़ो ना…See More
20 hours ago
Usha Awasthi posted a blog post

केवल ऐसी चाह

द्वापर युग में कृष्ण नेपान्डव का दे साथहो विरुद्ध कुरुवंश केरचा एक इतिहासकलियुग की अब क्या…See More
20 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post मुझे भी पढ़ना है - लघुकथा –
"हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।"
21 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post कब तक  - लघुकथा –
"हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब जी।आदाब।"
21 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service