For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

  

 

ग़ज़ल

2122  2122  212

 

कितने काँटे कितने कंकर हो गये

हर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये

 

रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये                                  

 

आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे

हुक्म आया घर से बेघर हो गये

 

जो गिरी तो साख गिरती ही गई

अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये

 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब  

यूँ  बड़े  भँवरों के लश्कर हो गये                                                                 

 

एक  नेता  और अफसर क्या हुए

कितने-कितने खेत  बंजर हो गए

 

डोर  ऐसी  उसके  हाथों  आ गयी

उड़ते पंछी पल में बे-पर  हो गये

#

मौलिक/ अप्रकाशित. 

अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’

Views: 97

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on Monday

आदरणीय अशोक कुमार जी, नमस्कार। इस सुंदर ग़ज़ल पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

/रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये/

इस शेर में सुधार की गुंजाइश प्रतीत हो रही है। कोई सार्थक सुझाव देना भी चाहता था लेकिन दरअस्ल मैं इस शेर के भाव तक ही नहीं पहुँच पाया (कौन से रास्ते?)                   

 

/आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे/

इस शेर में "हो रहे थे ही" खटक रहा है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है:

आत्मनिर्भर होने को ही थे कि वे

 

बाक़ी पूरी ग़ज़ल पे शेर-दर-शेर दाद क़ुबूल कीजिए। सादर

Comment by Ashok Kumar Raktale on Sunday

आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रथम देरी से प्रतिक्रिया के लिए क्षमा चाहता हूँ. आपकी यह विस्तृत और बिन्दुवार प्रतिक्रिया मुझे कई अशआर पर रह गयी कमी को समझने में मददगार साबित हो रही है. मैं अवश्य आपके द्वारा चिन्हित अशआर में बदलाव का प्रयास करूंगा. सादर. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 9, 2026 at 4:18pm

आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता हूँ 

कितने काँटे कितने कंकर हो गये

हर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये  

बहुत ही सार्थक और प्रभावी मतला हुआ है. 

वैसे, उला के प्रवाह में सानी का होना मतले को और वजनदार कर देता. इसके लिए तुर्की-ब-तुर्की कहना था - हर गली कितने सुखनवर हो गये ... ऐसा किया जाना काँटों और कंकर की श्रेणी में तमाम बेतुके सुखनवरों को रखता हुआ उनकी जगह बता देता. . 

 

रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये                                  

इस शे’र को और समय दिया जाता तो इसकी सम्प्रेषणीयता और बढ़ जाती. 

जैसे 

रास्तों की तीरगी के अर्थ क्या 

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये   

 

आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे

हुक्म आया घर से बेघर हो गये 

पुनर्प्रतिस्थापना के लिए बार-बार प्रयासरत परिवारों की लाचारी उभर आयी है इस शे’र के माध्यम से. 

उला का विन्यास यों कर दिया जाय -  आत्मनिर्भर हो रहे ही थे कि वे

 

जो गिरी तो साख गिरती ही गई

अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये

वाह-वाह ... बहुत खूब .. आज जो मुद्रास्फीति की दशा है उस लिहाज से यह शे’र मौजूँ बन पड़ा है 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब  

यूँ  बड़े  भँवरों के लश्कर हो गये                                                                 

वाह वाह .. भँवरों के लश्कर का तो जवाब नहीं.  

 

एक  नेता  और अफसर क्या हुए 

कितने-कितने खेत  बंजर हो गए

यह नेता-अफसर के नेक्सस पर सशक्त कहन बन पड़ा है. बहुत खूब ..

बहरहाल, उला का विन्यास कुछ यों हो सकता था  - 

क्या मिले नेता तथा अफसर यहाँ  

कितने-कितने खेत बंजर हो गये 

डोर  ऐसी  उसके  हाथों  आ गयी

उड़ते पंछी पल में बे-पर  हो गये

इस शे’र पर और समय चाहिए होगा. भाव स्पष्ट हो रहे हैं लेकिन शे’र की पकड में नहीं आ रहे.

इस सुन्दर और सुगढ़ प्रयास के लिए हार्दिक बधाई  

जय-जय 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 9:25pm

  आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल पर उत्साहवर्धन के लिए आपका दिल से शुक्रिया. सादर 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 9:22pm

   आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. सादर 

Comment by Sushil Sarna on January 8, 2026 at 8:45pm

वाहहहहहह आदरणीय क्या ग़ज़ल हुई है हर शे'र पर वाह निकलती है । दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2026 at 6:56pm

आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन।बहुत सुंदर समसामयिक गजल हुई है। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई लक्ष्मण सिंह धानी ' मुसाफिर' साहब हौसला अफज़ाई के लिए  आपका बहुत-बहुत…"
41 minutes ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आपने खत लिखा उसका ही असर है साईंछोड़ दी अब बुरी संगत की डगर है साईं धर्म के नाम बताया गया भाई…"
3 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"ग़ज़ल पर अपनी बारीक़-नज़र से टिप्पणी करने के लिए आपका आभार आदरणीय तिलकराज जी।  एक प्रश्न है: इस…"
4 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"भूल जाता हूँ ये अक्सर कि उसे भूलना है अब किसी बात का भी होश किधर है साईं। इस पर एक उदाहरण देखें भूल…"
14 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"  राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है…"
15 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं   अब तो दीदावर न कोई न वो दर है…"
15 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आरंभ से गिरह तक सभी शेर बहुत अच्छे हुए। उर्दू के दृष्टिकोण से 9वें शेर में 'बहर' तथा 10…"
15 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। अच्छी गिरह के साथ गजल का अच्छा प्रयास हुआ है। हार्दिक बधाई।"
18 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"शह्र में झूठ का कुछ ऐसा असर है साईं अब तलक सच की नहीं ख़ैर ख़बर है साईं याद है या कोई रूहानी असर है…"
18 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"    राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं   अब तो दीदावर न कोई न वो दर है…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"कोख से मौत तलक रात अमर है साईंअपने हिस्से में भला कौन सहर है साईं।१।*धूप ही धूप मिली जब से सफर है…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service