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[आएश और आमश के लिए]


हमारे पास कुछ भी नहीं है

चंद औराक़ गर्दिशे-दौराँ के
चंद नसीहतें जो नस्ल दर नस्ल हम तक पहुंचीं
ऐसा विश्वास जहाँ श्रद्धा के अतिरिक्त
सारे सवाल अनुत्तरित और प्रतिबंधित
हैं

मैं कांपता था , लड़खडाने लगते थे क़दम
पसीने लगते थे छूटने
तुम मत डरना
कभी कुत्ते के भौंकने और बिल्ली के म्याओं म्याओं से

शिनाख्त रखना नहीं
न वजूद के पीछे
भागना
रैपर बन जाना
किसी भी साबुन की टिकिया
का चमकदार और भड़क दार ,
टिकिया के बारे में न सवाल करना, न करने देना ;
वे एक सी होती हैं
सभी

हाँ !रैपर का नाम ही तुम्हारा होगा
यह मान बढायेगा तुम्हारा

अनुभव की पोटली से निकले यह चंद
सिक्के बेईमानी , झूठ और मक्कारी
कल तुम्हारे मुद्रा-अस्त्र होंगे

सहेजकर रखना इस वसीयत
को

मुझे याद मत
करना

किरदार और गुफ्तार रफ़्तार की
रखना रेत के टीले मत बनाना ।

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Comment by SYED BASEERUL HASAN WAFA NAQVI on October 15, 2010 at 6:44pm
शहरोज़ भाई सलाम बहुत अच्छी नज़्म है.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 11, 2010 at 9:44am
वाह बहुत खुबसूरत रचना, कुछ अलग रूप रंग लिये एक उम्द्दा अभिव्यक्ति, शानदार ,
Comment by asha pandey ojha on August 10, 2010 at 7:15pm
सहरोज जी सर्वप्रथम तो आपका ओ बी ओ में हार्दिक स्वागत है ..!
आपकी एस बेहतरीन रचना के लिए अल्फाज़ ढूढे नहीं मिल रहे बहुत खूब वक्त के साथ बदलते इंसान के लेबल को बखूबी व्यक्त किया है आपने सच को इतनी ज़िन्दादिल्ली अभिव्यक्त करने के लिए बधाई
Comment by Admin on August 10, 2010 at 5:19pm
आदरणीय शहरोज़ साहिब,
सादर अभिवादन,
सर्वप्रथम तो मै ओपन बुक्स ऑनलाइन के मंच से आपकी प्रथम पोस्ट का दिल से स्वागत करते है, शुरुवात बहुत ही अच्छी रचना से की है, बहुत ही खुबसूरत और भावपूर्ण रचना है, बधाई इस पोस्ट पर,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on August 10, 2010 at 2:25pm
वाह जी वाह.....बहुत ही बढ़िया रचना है....कमाल की रचना है ...
Comment by baban pandey on August 10, 2010 at 1:24pm
भाई वाह ...शायद आपकी पोस्ट है OBO पर ...बेहतरीन

कृपया ध्यान दे...

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