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समझाओ

वफ़ा हमसे करो या न करो पर गैर न समझो
मुहब्बत हमने की थी क्या खता थी यह तो बतलाओ

मिले तो आप ही छुप छुप के कितनी मर्तवा हमसे
अब किसका था कसूर ऐ-दिल बस इतना तो समझाओ

कहीं 'दीपक' जले तो रौशनी ज़रूर होती है
हमारा दर्द भी समझो बार बार न जलाओ

सुना है बेवफा रोते नहीं आंसू नहीं आते
ऐसा नुस्खा प्रेम का हमको भी दे जाओ

दीपक 'कुल्लुवी'   
20 /09 /12 .
09350078399

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