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मै तो एक पागल कवि हूँ

                                                        मै  तो एक पागल  कवि हूँ
क्या फर्क पड़ता है 
मै तो एक पागल कवि हूँ 
तम को काटता रवि हूँ
कौन किसलिए जीता है 
कौन किसलिए पीता है 
ज़िन्दगी तो सीता है 
कर्मो की गीता है 
भाग्य विपरीता है 
यहाँ तो हर कोई 
बस अपने लिए जीता है  
मै तो राम की सीता हूँ 
गीतों की गीता हूँ 
पर मै तो एक पागल कवि हूँ !------------
मस्जिद का मौलवी 
मंदिर का पुजारी हूँ 
भाग्य का भिखारी हूँ 
ना कोई अधिकार मेरा 
कर्तव्य है संसार मेरा 
जीवन है उपहार मेरा 
अभिन्दन है प्यार तेरा 
पर मै तो एक पागल कवि हूँ
तम को काटता रवि  हूँ
मै तो एक कवि हूँ !
यह कविता क्यों ? मुझे प्रसन्नता है की मै एक कवि हूँ कम से कम समाज  में दर्पण लिए फिरता हूँ 
अरविन्द योगी 

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Comment by arvind yogi on March 9, 2011 at 2:12am
किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा
कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा
काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा
किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा
देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा
और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा
कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा
ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा

Comment by Abhinav Arun on March 8, 2011 at 2:18pm

सच्ची बात कही योगी जी | कवी समाज को स्वान्त सुखाय रचनाओं के जरिये कुछ दे ही जाता है | प्रभावी रचना के लिए बधाई \

Comment by विवेक मिश्र on March 6, 2011 at 8:22pm
समाज के लिए कवि एक आईने की तरह होता है, जिसमे समाज के सारे चेहरे दिख जाते हैं. सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई.

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