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मै खुद की बेबसी से मजबूर हैरान हूँ

खबर क्या तुम्हें कैसे चल रही है जिंदगी

 

हर सुबह हर शाम अधूरी एक आश में,

दिल के विरह की आग में जल रही है जिंदगी

 

किससे करे शिकवा,और क्युओं करूँ

अटूट प्रेम में छली गयी मेरी जिंदगी

 

क्या खबर कब थमेगा जिंदगी का कारवाँ

बेमतलब की ईन राहो पर खल रही है जिंदगी

 

तेरी दगाबाजी से दिल यूँ चूर-चूर हो गया क्यूँ ये

 बेवफा तेरे दर्द का सितम सह रही है जिंदगी तू

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Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on March 14, 2011 at 6:12pm
वन्दना जी,
बहुत-बहुत धन्यवाद  
Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on March 14, 2011 at 6:12pm
वन्दना जी,
बहुत-बहुत धन्यवाद  

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 12, 2011 at 8:31am
संजय जी सुंदर प्रयास पर धन्यवाद आपको

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