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जीर्ण है शीर्ण है
मंद है मलिग्न है
सोच से ओत प्रोत
सुस्त है
त्रस्त है
दुर्भिन है
दुर्भिक्ष है
अकाल जब
समक्ष है
कम्पशील
अशील
देह आज
प्राणहीन
रूपविहीन
रिक्त रिक्त कक्ष है
भयतीत
अन्तशील
शिला सम
भारी तन
पंख प्राण
पवन मन
घोर घोर घुर्र घुर्र
अंधकार
तेज़ रार
दीघर कृष्ण पक्ष है
अति दूर
स्वप्न पथ
डगर डगर
अग्नि पथ
समेट सब
बढ़ता चल
नहीं कोई तेरा अतीत
पल पल प्रिय मीत
द्रश्य है जो भविष्य है
तूँ द्रोण दक्ष है ,
तूँ द्रोण दक्ष है ,
तूँ द्रोण दक्ष है ,
द्रश्य है जो भविष्य है
तूँ द्रोण दक्ष है

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