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ऐसी शिक्षा भला किस काम की जिसकी बुनियाद ही गैर बराबरी की शिक्षा का संदेश देती हो। देश का भविष्य हमारे नौनिहालों के कंधों पर है उन्ही की शिक्षा में जमी आसमा का फर्क देखने को मिलता है। एक तरफ पब्लिक स्कूलों की शिक्षा का बढ़ता कारोबार दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों की शिक्षा का गिरता स्तर। शिक्षा का अधिकार, सर्व शिक्षा अभियान, स्कूल चलो अभियान जैसी प्रलोभनी बातें करने से शिक्षा का यह फर्क मिटने वाला नहीं है और न ही बड़े बड़े आयोग गठित करने से सरकार की ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है। उहापोह की बात तो यह कि किसी भी दल के मुख्य एजेंडे में यह शामिल नहीं होता है कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी चाहिए और किस तरह का ढ़ाचा तैयार किया जाय जिससे व्यवस्था में जो खामियां हैं उनको दूर कर समान शिक्षा की ओर कैसे बढ़ा जा सकता है? शिक्षा के सवाल पर सब चुप्पी साध लेते हैं ऐसी हालातों में हम आने वाले कल को लेकार कैसे सुनहरे सपने सजा सकते हैं। कैसे कह सकते हैं कि देश का भविष्य उज्ज्वल एवं सुनहरा होगा।

            यह कैसी ज्यादती है उन तमाम बच्चों के भविष्य के साथ जो कि नौकरी पाने के लिए तो बराबरी की परीक्षा पास करके हासिल करेंगे, परंतु शिक्षा गैर बराबरी की दी जाती है, एक तरफ जहां पब्लिक स्कूल के सभी सुविधाओं से लेस अँग्रेजी की शिक्षा और हिन्दी शब्द बोलने मात्र से ही दंडात्मक प्रक्रिया अपनाई जाती है, वहीं सरकार द्वारा संचालित  स्कूल के नाम पर आसमां तले चलती क्लास, न बिजली न पानी, हालातों से जूझते बच्चे, पढ़ाने के लिए एक या दो शिक्षक, अँग्रेजी के नाम पर कुछ शब्दों का सीखना मात्र। इतनी बढ़ी असमानता के साथ देश में शिक्षा व्यवस्था का लागू करना देश की शिक्षा के लिए बदनुमा दाग है।

      स्कूल की दीवारों पर बाल अधिकार लिख देने से, मिड-डे-मील व्यवस्था लागू कर देने से, स्कूल चलो रेलियाँ निकाल देने से ही शिक्षा प्रणाली में बदलाव नहीं लाया जा सकता है। जरूरत है दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ देश में सभी के लिए समान शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की। इसके लिए नीतियाँ बदलनी पड़े तो बदली जानी चाहिए। अब तक जो भी प्रयास किए वो बेमन से किए जाते रहे हें इसी वजह से हमारा देश जो विश्व गुरु कहलाया जाता था वो ही नन्हें मुन्हों को गुरु बनाने में पिछड्ता जा रहा है।

      देश की तरक्की के लिए विदेशों के साथ दोस्ती का ख्वाब क्यू न सज़ा रहे हों, समझौते की फेहरिस्त क्यू न बढ़ रही हो लेकिन इन सबके साथ हम अपने ही देश में गैरबराबरी की शिक्षा देकर अपने ही देश की जड़ को खोखला कर रहे हें। क्या होगा विदेशों से दोस्ती और समझौते करके जब हम आने वाले समय में अपने देश की गौरवशाली पहचान को खोखला होते हुये देखेंगे। तरक्की के पायदान तय करना तो दूर हम जहाँ थे वहाँ ठहर भी न सके, ये कशमकश हर बुद्धिजीवी वर्ग के मन में रहती है कि अनेक महत्त्वाकाक्षी योजना के बावजूद, करोडों रुपये लुटाने के पश्चात भी शिक्षा के जो भी पैमाने तय किए गए थे उसमे भी सफल न हो सके, विद्यालयों में छात्रों की संख्या बढ़ने के वज़ाय साल दर साल कम होती गयी। ये बदतर स्थिति तो तब देखने को मिल रही है जब छात्रों को खाने का लालच (मिड डे मील) भी दिया जाता है। इन हालातों में देश के सभी प्राथमिक स्तर के बच्चों (पब्लिक और सरकारी स्कूल ) में समान शिक्षा की बात सरकार की हलक में से कैसे निकलेगी। क्योंकि देश के नेता और अधिकारी सब अपने मद में हें और उन्हें परवाह नहीं है  देश के भविष्य की।

      प्राथमिक स्तर पर देश के सभी नौनिहालों के  लिए यदि सरकार समान शिक्षा की पैरोकारी नहीं कर सकती और शिक्षा के वर्तमान ढांचे में बदलाव नहीं ला सकती तो एक ऐसी योजना का क्रियान्वयन दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ अवश्य किया जाना चाहिए कि सरकारी स्कूल में शिक्षित छात्रों के लिए नौकरी प्राप्त करने के लिए परीक्षा के पैमाने अलग निर्धारित किए जाएँ, आखिरकार सभी छात्र इसी उद्देश्य से शिक्षा हासिल करते हें कि ये शिक्षा ज़िंदगी जीने का साधन भी बने। कहने का तात्पर्य यह कि गैर बराबरी की शिक्षा देश के नौनिहालों का भविष्य चौपट ना कर दे आज पब्लिक स्कूलों की आढ़ में शिक्षा को जिस व्यापारिक ढंग से परोसा जा रहा है वह स्वतः ही सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों के बीच एक अद्रश्य खाई पैदा कर रहा है। हालांकि इसी असमानता को मिटाने के लिए सरकार द्वारा एक छोटी सी योजना लाने कोशिश कि कुछ प्रतिशत बच्चे पब्लिक स्कूल में दाखिला ले सकेंगे किन्तु उसका कड़ाई से पालन ना करने कि वजह से वो इन स्कूलों कि मनमानी पर अंकुश ना लगा सके और शिक्षा के समानता के इस अधिकार को पोषित न कर सके। आज गैर बराबरी की यह शिक्षा समाज के लिए नासूर ना बन जाये इस पर अपनी पैनी नजर रखना बहुत जरूरी हैं।

(लेखिका आराधना संस्था की महासचिव हैं)

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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