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NEERAJ KHARE commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post षड्यंत्र (लघु कथा )
"आदरणीय गोपाल भाई जी,षड्यंत्र पे षड्यंत्र करते इस नेता की तो जांच होनी चाहिए। मगर करेगा कौन। ये प्रश्न आज भी विद्दमान है। सुपर से ऊपर है आपकी लघु कथा।"
Jun 13, 2016

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on NEERAJ KHARE's blog post अभिलाषा (व्यंग्य कविता)
"सुन्दर प्रस्तुति हार्दिक बधाई आपको "
Jun 8, 2016
maharshi tripathi commented on NEERAJ KHARE's blog post अभिलाषा (व्यंग्य कविता)
"सुंदर प्रयास पर आपको बधाई !!!"
Jun 7, 2016
Shyam Narain Verma commented on NEERAJ KHARE's blog post अभिलाषा (व्यंग्य कविता)
"इस सुंदर रचना के लिये बधाई स्वीकार करें ।"
Jun 6, 2016
NEERAJ KHARE posted a blog post

अभिलाषा (व्यंग्य कविता)

चाह नही मेरी कि मैं ,अफसर बन सब पर गुर्राउं। चाह नही मेरी कि मैं ,सत्ता में दुलराया जाऊं।। लाल बत्ती की खातिर मैं ,अपनों का न गला दबाऊं। गरीब जनों की सेवा करके ,आशीर्वाद उन्हीं का पाऊं।। बड़े हमेशा बड़े रहेंगे ,छोटों को भी बड़ा बनाऊँ। हर एक बच्चा बने साक्छर ,रोजगार के अवसर लाऊँ।। मिटे गरीबी आये खुशहाली ,ऐसी मैं एक पौध लगाऊँ।।. (नीरज खरे) मौलिक एवम् अप्रकाशितSee More
Jun 6, 2016

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on NEERAJ KHARE's blog post कविता (माँ)
"आदरणीय नीरज भाई , मातृ भाव से पूर्ण आपकी रचना के लिये हार्दिक बधाई ।"
Jun 2, 2016
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on NEERAJ KHARE's blog post कविता (माँ)
"माँ तो माँ ही होती है | बहुत बहुत बधाई इस सुंदर रचना के लिए |"
Jun 2, 2016
NEERAJ KHARE added a discussion to the group बाल साहित्य
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बेटी( कविता)

बेटी-------------बेटी मेरी बड़ी हुई है।पुस्तक लेकर खड़ी हुई है।।कहती पापा मुझे पढ़ाओ।सुंदर कपड़े मुझे पहनाओ।।बेटा हूँ मैं सच कहती हूँ।आपके दिल में ही रहती हूँ।।पढ़ लिखकर मैं नाम कमाऊं।आपका नाम रोशन कर जाऊं।।मेंहदी लगे मेरे हाथों में।प्यारा सा एक साथी पाऊं।।कभी जरूरत पड़े अगर तो।सबसे पहले मैं आ जाऊं।।इस जन्म की तो बात ही क्या।सात जन्म मैं आपको ही पाऊं।।(नीरज खरे)9473871781(मौलिक एवम् अप्रकाशित)See More
Jun 2, 2016
pratibha pande commented on NEERAJ KHARE's blog post कविता (माँ)
"सबसे लड़ती मेरी खातिर गली मोहल्ले गांव में,अब सब बन गए मेरे दुश्मन कैसे मैं बच पाउँगा.....बिल्कुल,  हर माँ ऐसा ही करती है , माँ के प्यार की खुशबू में रची इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आपको आदरणीय नीरज खरे जी "
Jun 2, 2016
Samar kabeer commented on NEERAJ KHARE's blog post कविता (माँ)
"जनाब नीरज खरे साहिब आदाब,पहली बार आपकी रचना से रूबरू हुआ हूँ । बहुत अच्छी लगी माँ को समर्पित ये कविता,दिल से बधाई स्वीकार करें ।"
Jun 1, 2016
Shyam Narain Verma commented on NEERAJ KHARE's blog post कविता (माँ)
"बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए …………….."
May 31, 2016
NEERAJ KHARE posted a blog post

कविता (माँ)

हे माँ तेरे चरणों की मैं धूल कहाँ से लाऊंगा, रग रग में तू बसी हुई मैं भूल कहाँ से पाऊंगा। तिनका तिनका बड़ा हुआ मैं ममता की इन छाँव में, बात बात पर मुझे सिखाती किताब कहाँ से लाऊंगा।। सबसे लड़ती मेरी खातिर गली मोहल्ले गांव में, अब सब बन गए मेरे दुश्मन कैसे मैं बच पाउँगा याद है एक दिन तूने मुझको यही पाठ सिखलाया था, भाव सरल और मधुर वचन का सच्चा पाठ पढ़ाया था।। दीन दुःखी की सेवा कर फिर जग में नाम कमाया था, बनकर तेरे जैसा मैं अब कुछ तो पुण्य कमाऊँगा। लेकिन अच्छे कर्मों की मैं पूंजी कहाँ से लाऊंगा…See More
May 31, 2016
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on NEERAJ KHARE's blog post जाम रे (व्यंग कविता)
"प्रिय नीरज .सच कहूं तो इस कविता रूपी कथा में  पंच कुछ हल्का है , बशर भारतीय ने इशारा  किया है . आशा है आगे अच्छी रचना पढने को मिलेगी . स्नेह ."
May 27, 2016
Rahila commented on NEERAJ KHARE's blog post जाम रे (व्यंग कविता)
"बहुत सुन्दर व्यंग्य ।"
May 26, 2016
बशर भारतीय commented on NEERAJ KHARE's blog post जाम रे (व्यंग कविता)
"आ. नीरजजी निस्संदेह इस रचना पर आपने मेहनत की है मगर रचना कुछ बिखरी बिखरी लग रही है। क्षमा सहित"
May 26, 2016
NEERAJ KHARE commented on NEERAJ KHARE's blog post जाम रे (व्यंग कविता)
"आदरणीया भट्ट जी आपको व्यंग रचना पसंद आई। बहुत बहुत शुक्रिया।"
May 25, 2016

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LUCKNOW
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अभिलाषा (व्यंग्य कविता)

चाह नही मेरी कि मैं ,अफसर बन सब पर गुर्राउं।
चाह नही मेरी कि मैं ,सत्ता में दुलराया जाऊं।।
लाल बत्ती की खातिर मैं ,अपनों का न गला दबाऊं।
गरीब जनों की सेवा करके ,आशीर्वाद उन्हीं का पाऊं।।
बड़े हमेशा बड़े रहेंगे ,छोटों को भी बड़ा बनाऊँ।
हर एक बच्चा बने साक्छर ,रोजगार के अवसर लाऊँ।।
मिटे गरीबी आये खुशहाली ,ऐसी मैं एक पौध लगाऊँ।।

.
(नीरज खरे)
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on June 6, 2016 at 7:30am — 3 Comments

कविता (माँ)

हे माँ तेरे चरणों की मैं धूल कहाँ से लाऊंगा,

रग रग में तू बसी हुई मैं भूल कहाँ से पाऊंगा।



तिनका तिनका बड़ा हुआ मैं ममता की इन छाँव में,

बात बात पर मुझे सिखाती किताब कहाँ से लाऊंगा।।



सबसे लड़ती मेरी खातिर गली मोहल्ले गांव में,

अब सब बन गए मेरे दुश्मन कैसे मैं बच पाउँगा



याद है एक दिन तूने मुझको यही पाठ सिखलाया था,

भाव सरल और मधुर वचन का सच्चा पाठ पढ़ाया था।।



दीन दुःखी की सेवा कर फिर जग में नाम कमाया था,

बनकर तेरे जैसा मैं अब कुछ…

Continue

Posted on May 31, 2016 at 9:00am — 5 Comments

जाम रे (व्यंग कविता)

शहर के इस जाम में

पत्नी को बाइक पे टांग के

मैं जा रहा था काम से

तभी अचानक एक विक्रेता

बोला सीना तान के

छांट बीनकर माल खरीदो

बेंचू मैं कम दाम में

मैंने बोला भीड़ बहुत है

फिर आऊंगा आराम से

बोला दीदी कितनी सुंदर

उनके कुछ अरमान रे

तुम तो भइया बहुत काइयां

लगते कुछ शैतान रे

पहले बोलो क्यूं हो खोले

शॉप बीच मैदान में

हंसकर बोला खाकी वर्दी

साथ निभाए शान से

गाउन, मैक्सी,पर्स खरीदो

करते क्यूं परेशान रे

तभी…

Continue

Posted on May 23, 2016 at 3:30pm — 5 Comments

दबी आवाज़ (लघु कथा)

हमेशा खुशमिजाज रहने वाली माँ को आज गंभीर मुद्रा में देखकर मैनें कारण जानना चाहा तो वो बोली- बेटा तुम भाइयों में सबसे बड़े हो इसलिय तुमसे एक बात करना चाहती हूँ| हाँ-हाँ बोलो माँ मैनें उत्सुकता पूर्वक जानना चाहा|माँ ने दबी आवाज़ में कहना प्रारंभ किया-बेटा तुम्हारा अपना मकान लखनऊ में और बीच वाले का वाराणसी मे बना गया है किंतु तुम्हारा तीसरा भाई जो सबसे छोटा है उसका न तो अपना मकान है और न वो बनवा पायगा कियोंकि वो कम किढ़ा लिखा होंने के कारण अछी नौकरी न पा सका|तो क्या हुआ माँ ये आप और बाबूजी का…

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Posted on January 26, 2014 at 8:30pm — 12 Comments

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