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ख्बाब केवल ख्बाब

ख्बाब केवल ख्बाब

ख्बाब था मेहनत के बल पर , हम बदल डालेंगे किस्मत
ख्बाब केवल ख्बाब बनकर, अब हमारे रह गए हैं

कामचोरी ,धूर्तता ,चमचागिरी का अब चलन है
बेअर्थ से लगने लगे है ,युग पुरुष जो कह गए हैं

दूसरो का किस तरह नुकसान हो सब सोचते है
त्याग ,करुना, प्रेम ,क्यों इस जहाँ से बह गए हैं

अब करा करता है शोषण ,आजकल बीरों का पौरुष
मानकर बिधि का विधान, जुल्म हम सब सह गए है

नाज हमको था कभी पर आज सर झुकता शर्म से
कल तलक जो थे सुरक्षित आज सारे ढह गए हैं
"मौलिक व अप्रकाशित"
प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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