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Madan Mohan saxena's Blog (15)

ख्बाब केवल ख्बाब

ख्बाब केवल ख्बाब



ख्बाब था मेहनत के बल पर , हम बदल डालेंगे किस्मत

ख्बाब केवल ख्बाब बनकर, अब हमारे रह गए हैं



कामचोरी ,धूर्तता ,चमचागिरी का अब चलन है

बेअर्थ से लगने लगे है ,युग पुरुष जो कह गए हैं



दूसरो का किस तरह नुकसान हो सब सोचते है

त्याग ,करुना, प्रेम ,क्यों इस जहाँ से बह गए हैं



अब करा करता है शोषण ,आजकल बीरों का पौरुष

मानकर बिधि का विधान, जुल्म हम सब सह गए है



नाज हमको था कभी पर आज सर झुकता शर्म से

कल तलक जो थे… Continue

Added by Madan Mohan saxena on May 23, 2023 at 11:06am — No Comments

जिंदगानी लुटाने की बात करते हो

किस ज़माने की बात करते हो
रिश्तें निभाने की बात करते हो

अहसान ज़माने का है यार मुझ पर
क्यों राय भुलाने की बात करते हो

जिसे देखे हुए हो गया अर्सा मुझे
दिल में समाने की बात करते हो

तन्हा गुजरी है उम्र क्या कहिये
जज़्बात दबाने की बात करते हो

गर तेरा संग हो गया होता "मदन "
जिंदगानी लुटाने की बात करते हो

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on September 27, 2016 at 12:00pm — 2 Comments

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है

अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर

बिना जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल

ख्वाबों और यादों की गली में उम्र गुजारी है

समय के साथ दुनिया में है रह पाना बहुत मुश्किल

कहने को तो कह लेते है अपनी बात सबसे हम

जुबां से दिल की बातो को है कह पाना बहुत मुश्किल

ज़माने से मिली ठोकर तो अपना हौसला बढता

अपनों से मिली ठोकर तो सह पाना बहुत मुश्किल

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है

क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल

कुछ…

Continue

Added by Madan Mohan saxena on August 4, 2016 at 1:03pm — 3 Comments

चंद शेर आपके लिए

चंद शेर आपके लिए

एक।

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है
जब दर्द को दबा जानकार पिया मैंने

दो.

वक्त की मार सबको सिखाती सबक़ है
ज़िन्दगी चंद सांसों की लगती जुआँ है

तीन.

समय के साथ बहने का मजा कुछ और है यारों
रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है

चार.

जब हाथों हाथ लेते थे अपने भी पराये भी
बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था

"मौलिक व अप्रकाशित"
प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on February 24, 2016 at 12:09pm — 3 Comments

अब समाचार ब्यापार हो गए

अब समाचार ब्यापार हो गए

किसकी बातें सच्ची जानें
अब समाचार ब्यापार हो गए

पैसा जब से हाथ से फिसला
दूर नाते रिश्ते दार हो गए

डिजिटल डिजिटल सुना है जबसे
अपने हाथ पैर बेकार हो गए

रुपया पैसा बैंक तिजोरी
आज जीने के आधार हो गए

प्रेम ,अहिंसा ,सत्य , अपरिग्रह
बापू क्यों लाचार हो गए

सीधा सच्चा मुश्किल में अब
कपटी रुतबेदार हो गए

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on October 8, 2015 at 2:30pm — 2 Comments

होली है

आया फ़ाग का मौैसम मुझे सपने सजाने दो

दिल के पास जो रहता उसी के पास जाने दो

तू मेरे रंग में रंग जा मैं तेरे रंग को पा लूँ

प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है

अधूरा श्याम राधा बिन ,राधा श्याम की हो ली

दिलों में प्यार भरने को आयी आज फिर होली

होली की असीम शुभकामनायें

तन से तन मिला लो अब मन से मन भी मिल जाये

प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है

ले के हाथ हाथों में, दिल से दिल मिला लो आज

यारों कब मिले मौका अब छोड़ों ना कि होली…

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Added by Madan Mohan saxena on March 5, 2015 at 5:27pm — 2 Comments

हिम्मत साथ नहीं देती है

हिम्मत साथ नहीं देती है

किसको अपना दर्द बतायें कौन सुनेगा अपनी बात

सुनने वाले व्याकुल हैं अब अपना राग सुनाने को

हिम्मत साथ नहीं देती है खुद के अंदर झाँक सके

सबने खूब बहाने सोचे मंदिर मस्जिद जाने को

कैसी रीति बनायी मौला चादर पे चादर चढ़ती है

द्वार तुम्हारे खड़ा है बंदा , नंगा बदन जड़ाने को

दूध कहाँ से पायेंगें जो, पीने को पानी न मिलता

भक्ति की ये कैसी शक्ति पत्थर चला नहाने को

जिसे देखिये मिलता है अब चेहरे पर मुस्कान लिए…

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Added by Madan Mohan saxena on January 22, 2015 at 5:00pm — 5 Comments

जिंदगी जिंदगी

तुझे पा लिया है जग पा लिया है
अब दिल में समाने लगी जिंदगी है

कभी गर्दिशों की कहानी लगी थी
मगर आज भाने लगी जिंदगी है

समय कैसे जाता समझ मैं ना पाता
अब समय को चुराने लगी जिंदगी है

कभी ख्बाब में तू हमारे थी आती
अब सपने सजाने लगी जिंदगी है

तेरे प्यार का ये असर हो गया है
अब मिलने मिलाने लगी जिंदगी है

मैं खुद को भुलाता, तू खुद को भुलाती
अब खुद को भुलाने लगी जिंदगी है

"मौलिक व अप्रकाशित"

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on December 18, 2014 at 11:10am — 6 Comments

ये जीबन यार ऐसा ही

ये जीबन यार ऐसा ही

ये जीबन यार ऐसा ही ,ये दुनियाँ यार ऐसी ही
संभालों यार कितना भी आखिर छूट जाना है

सभी बेचैन रहतें हैं ,क्यों मीठी बात सुनने को
सच्ची बात कहने पर फ़ौरन रूठ जाना है

समय के साथ बहने का मजा कुछ और है प्यारे
बरना, रिश्तें काँच से नाजुक इनको टूट जाना है

रखोगे हौसला प्यारे तो हर मुश्किल भी आसां है
अच्छा भी समय गुजरा बुरा भी फूट जाना है

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on August 6, 2014 at 3:57pm — No Comments

क्यों हर कोई परेशां है

क्यों हर कोई परेशां है

दिल के पास है लेकिन निगाहों से जो ओझल है

ख्बाबों में अक्सर वह हमारे पास आती है

अपनों संग समय गुजरे इससे बेहतर क्या होगा

कोई तन्हा रहना नहीं चाहें मजबूरी बनाती है

किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है

बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ आती है

क्यों हर कोई परेशां है बगल बाले की किस्मत से

दशा कैसी भी अपनी हो किसको रास आती है

दिल की बात दिल में ही दफ़न कर लो तो अच्छा है

पत्थर दिल ज़माने में कहीं ये बात भाती…

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Added by Madan Mohan saxena on July 7, 2014 at 4:55pm — 5 Comments

बचपन यार अच्छा था

जब हाथों हाथ लेते थे अपने भी पराये भी

बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था

बारीकी जमाने की, समझने में उम्र गुज़री

भोले भाले चेहरे में सयानापन समाता था

मिलते हाथ हैं लेकिन दिल मिलते नहीं यारों

मिलाकर हाथ, पीछे से मुझको मार जाता था

सुना है आजकल कि बह नियमों को बनाता है

बचपन में गुरूजी से जो अक्सर मार खाता था

उधर माँ बाप तन्हा थे इधर बेटा अकेला था

पैसे की ललक देखो दिन कैसे दिखाता था

जिसे देखे हुआ अर्सा , उसका हाल जब पूछा

बाकी…

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Added by Madan Mohan saxena on June 23, 2014 at 1:07pm — 5 Comments

सबकी ऐसे गुजर गयी

सबकी ऐसे गुजर गयी

हिन्दू देखे ,मुस्लिम देखे इन्सां देख नहीं पाया
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में आते जाते उम्र गयी

अपना अपना राग लिए सब अपने अपने घेरे में
हर इन्सां की एक कहानी सबकी ऐसे गुजर गयी

अपना हिस्सा पाने को ही सब घर में मशगूल दिखे
इक कोने में माँ दुबकी थी , जब मेरी बहाँ नजर गयी

दुनिया जब मेरी बदली तो बदले बदले यार दिखे
तेरी इकजैसी सच्ची सूरत, दिल में मेरे उतर गयी

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on June 13, 2014 at 4:55pm — 7 Comments

ऐसा घर बनातें हैं

इन कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना

जमीं भी हो गगन भी हो ऐसा घर बनातें हैं

ना ही रोशनी आये ना खुशबु ही बिखर पाये

हालात देखकर घर की पक्षी भी लजातें हैं

दीबारें ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों

पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं

मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है

टी बी और नेट से ही समय अपना बिताते हैं

ना दिल में ही जगह यारों ना घर में ही जगह यारों

भूले से भी मेहमाँ को ना नहीं घर में टिकाते हैं

अब…

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Added by Madan Mohan saxena on June 5, 2014 at 3:09pm — 9 Comments

मेरी आँखों से

मेरी आँखों से

सपनीली दुनियाँ मेँ यारों सपनें खूब मचलते देखे

रंग बदलती दूनियाँ देखी ,खुद को रंग बदलते देखा

सुबिधाभोगी को तो मैनें एक जगह पर जमते देख़ा

भूखों और गरीबोँ को तो दर दर मैनें चलते देखा

देखा हर मौसम में मैनें अपने बच्चों को कठिनाई में

मैनें टॉमी डॉगी शेरू को, खाते देखा पलते देखा

पैसों की ताकत के आगे गिरता हुआ जमीर मिला

कितना काम जरुरी हो पर उसको मैने टलते देखा

रिश्तें नातें प्यार की…

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Added by Madan Mohan saxena on April 29, 2014 at 1:00pm — 6 Comments

जीबन :एक बुलबुला

गज़ब हैं रंग जीबन के गजब किस्से लगा करते

जबानी जब कदम चूमे बचपन छूट जाता है

बंगला ,कार, ओहदे को पाने के ही चक्कर में

सीधा सच्चा बच्चों का आचरण छूट जाता है

जबानी के नशें में लोग क्या क्या ना किया करते

ढलते ही जबानी के बुढ़ापा टूट जाता है

समय के साथ बहना ही असल तो यार जीबन है

समय को गर नहीं समझे समय फिर रूठ जाता है

जियो ऐसे कि औरों को भी जीने का मजा आये

मदन ,जीबन क्या ,बुलबुला है, आखिर फुट जाता है

मदन मोहन सक्सेना

मौलिक व…

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Added by Madan Mohan saxena on January 16, 2014 at 1:53pm — 6 Comments

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