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जीबन :एक बुलबुला

गज़ब हैं रंग जीबन के गजब किस्से लगा करते
जबानी जब कदम चूमे बचपन छूट जाता है

बंगला ,कार, ओहदे को पाने के ही चक्कर में
सीधा सच्चा बच्चों का आचरण छूट जाता है

जबानी के नशें में लोग क्या क्या ना किया करते
ढलते ही जबानी के बुढ़ापा टूट जाता है

समय के साथ बहना ही असल तो यार जीबन है
समय को गर नहीं समझे समय फिर रूठ जाता है

जियो ऐसे कि औरों को भी जीने का मजा आये
मदन ,जीबन क्या ,बुलबुला है, आखिर फुट जाता है

मदन मोहन सक्सेना

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 564

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 21, 2014 at 9:08pm

जीवन की क्रमिक अवस्थाओं के अस्थायित्व पर सुन्दर अभिव्यक्ति..

यह शायद आपकी पहली ही रचना है जिसे मैं पढ़ रही हूँ.... बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिए 

Comment by Meena Pathak on January 17, 2014 at 7:50pm

बंगला ,कार, ओहदे को पाने के ही चक्कर में
सीधा सच्चा बच्चों का आचरण छूट जाता है...............बहुत सुन्दर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2014 at 2:11pm

उस पर से आपने टिप्पणियों को एप्रुव करने की बंदिश लगा रखी है. लाहौलविलाकुव्वत !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2014 at 2:10pm

आप की लिखित भाषा में बंगाल की पृष्ठभूमि का प्रभाव दिख रहा है. शुभेच्छाएँ भाईजी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 17, 2014 at 12:14pm

आदरणीय मदन मोहन भाई , बहुत सुन्दर भाव पूरँ रचना के लिये बधाई !! पर किस शिल्प मे आपने रचना की है मै समझ नही पाया ॥

Comment by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 6:24pm

अच्छी रचना है , बधाई आपको । 

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