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मेरी आँखों से

सपनीली दुनियाँ मेँ यारों सपनें खूब मचलते देखे

रंग बदलती दूनियाँ देखी ,खुद को रंग बदलते देखा

सुबिधाभोगी को तो मैनें एक जगह पर जमते देख़ा

भूखों और गरीबोँ को तो दर दर मैनें चलते देखा

देखा हर मौसम में मैनें अपने बच्चों को कठिनाई में

मैनें टॉमी डॉगी शेरू को, खाते देखा पलते देखा

पैसों की ताकत के आगे गिरता हुआ जमीर मिला

कितना काम जरुरी हो पर उसको मैने टलते देखा

रिश्तें नातें प्यार की बातें ,इनको खूब सिसकते देखा

नए ज़माने के इस पल मेँ अपनों को भी छलते देखा

( मौलिक और अप्रकाशित)

मदन मोहन सक्सेना

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Comment

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Comment by Madan Mohan saxena on June 16, 2014 at 1:52pm

आप सभी का बहुत शुक्रिया होंसला अफजाई के लिए

Comment by Satyanarayan Singh on May 22, 2014 at 10:15pm

रिश्तें नातें प्यार की बातें ,इनको खूब सिसकते देखा

नए ज़माने के इस पल मेँ अपनों को भी छलते देखा.....सुन्दर अभिव्यक्ति  

हार्दिक बधाई स्वीकार करें आ. मदन मोहन जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 6, 2014 at 8:04am

बहुत सुन्दर कहन..इस अभिव्यक्ति का 

जीवन के प्रांगण में ऐसी दो-रंगी तस्वीर जहां तहां दिखलाई पड़ती है.. आपने ख़ूबसूरती से शब्दबद्ध किया है 

थोड़ा सा और प्रयास करके ये रचना आसानी से ग़ज़ल का रूप ले सकती है.. 

इस प्रस्तुति पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें 

Comment by coontee mukerji on May 2, 2014 at 3:29am

पैसों की ताकत के आगे गिरता हुआ जमीर मिला

कितना काम जरुरी हो पर उसको मैने टलते देखा....बहुत खूब

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 1, 2014 at 6:43pm

सुबिधाभोगी को तो मैनें एक जगह पर जमते देख़ा

भूखों और गरीबोँ को तो दर दर मैनें चलते देखा

देखा हर मौसम में मैनें अपने बच्चों को कठिनाई में

मैनें टॉमी डॉगी शेरू को, खाते देखा पलते देखा

मदन मोहन भाई जबरदस्त कटाक्ष करती और आज के हालात दिखाती अच्छी रचना
भ्रमर ५

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 1, 2014 at 1:08pm

सुबिधाभोगी को तो मैनें एक जगह पर जमते देख़ा

भूखों और गरीबोँ को तो दर दर मैनें चलते देखा..बहुत सही ..मेरी तरफ से हार्दिक बधाई ..सादर 

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