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क्यों हर कोई परेशां है

क्यों हर कोई परेशां है

दिल के पास है लेकिन निगाहों से जो ओझल है
ख्बाबों में अक्सर वह हमारे पास आती है

अपनों संग समय गुजरे इससे बेहतर क्या होगा
कोई तन्हा रहना नहीं चाहें मजबूरी बनाती है

किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है
बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ आती है

क्यों हर कोई परेशां है बगल बाले की किस्मत से
दशा कैसी भी अपनी हो किसको रास आती है

दिल की बात दिल में ही दफ़न कर लो तो अच्छा है
पत्थर दिल ज़माने में कहीं ये बात भाती है

भरोसा खुद पर करके जो समय की नब्ज़ को जानें
"मदन " हताशा और नाकामी उनसे दूर जाती है

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Views: 473

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 9, 2014 at 8:51pm

क्यों हर कोई परेशां है बगल बाले की किस्मत से 
दशा कैसी भी अपनी हो किसको रास आती है

बहुत सुन्दर मदन जी!

Comment by Madan Mohan saxena on July 9, 2014 at 3:44pm

आप सभी का बहुत शुक्रिया होंसला अफजाई के लिए

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 8, 2014 at 10:59am

आदरणीय मदन जी इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on July 8, 2014 at 9:28am

बहुत खूब आदरणीय मदन जी

बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ आती है.......वाह !!!!!!!!!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2014 at 6:28pm

   मदन् जी , अति मन भावन        

किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ आती है

क्यों हर कोई परेशां है बगल बाले की किस्मत से दशा कैसी भी अपनी हो किसको रास आती है

दिल की बात दिल में ही दफ़न कर लो तो अच्छा है पत्थर दिल ज़माने में कहीं ये बात भाती

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