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स्वतंत्रता में साहित्यकारों का अतुलनीय योगदान

रचनात्मक योगदान से समृद्ध स्वाधीनता का साहित्य'

स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में सृजनशील लेखनधर्मियों का अतुल्यनीय योगदान.......
स्व की भावना से प्रेरित आजादी का आंदोलन अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जन-जन के अवचेतन मन को जाग्रत करने आंदोलन चलाये गए। देशी रियासतों पर राज करते हुये उनके जीवन मूल्यों पर हस्तक्षेप करना, क्रूरता पूर्वक नरसंहार के विरूद्ध चेतना जगाने में साहित्यकारों का योगदान अविस्मरणीय हैं। महासंग्राम की धधकती ज्वाला की प्रचंड रूप प्रदान करने में सृजनकारों ने अपने ओजपूर्ण साहित्य सृजनशीलता का परिचय दिया। 
स्वतंत्रता संग्राम में अनुपान योगदान के साथ महिलाओं के उत्थान ,सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्षरत रही उत्कृष्ट कवयित्री , शिक्षिका, समाजसेविका, प्रथम शिक्षाविद ,साहस की प्रतिमूर्ति सावित्री वाई फुले जीवन और लेखन दोनों में अद्वितीय मिसाल थी। स्वतंत्रता आंदोलन में अहम योगदान देने वाली वीरांगना श्रेष्ठ कवयित्री भारत कोकिला सरोजनी नायडू झीलों की रानी शीर्षक से लंबी कविता द गिफ्ट ऑफ इंडिया में देशप्रेम की की कविताएं लिखकर अपने मधुर कंठ से आजादी का गान किया...'समय के पंछी को उड़ाने को सीमित विस्तार, पर लो पंछी तो उड़ चला।' वन्देमातरम! सुजलाम सुफलाम मलयज शीतलाम......  के रचनाकार भारतीय राष्ट्रवाद के दार्शनिक साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी द्वारा सृजित राष्ट्रगीत अंग्रेजी शासन के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम में जनगण का अस्त्र बना। स्वतंत्र भारत में राष्ट्रगीत के रूप में मान्य इस गीत स्वाधीनता का मूलमंत्र और राष्ट्रीयता का मूलमंत्र बना और इस गीत को स्वर दिया रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने दिया।देश भर में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करने वाले भारतीय राष्ट्रवाद के इस दृष्टा को महर्षि अरविंद ने भारतीय राष्ट्रवाद के ऋषि कहकर अभिहित किया। 
साहित्याकाश में एक उज्ज्वल नक्षत्र के रूप में उदित व बांग्ला उपन्यास के प्रथम सृजक बंकिम जी ने अनुभव किया कि भारत वर्ष व बंगाल में आत्मजागरण और देशभक्ति की भावना उत्पन्न करने की आवश्यकता हैं और मातृभाषा को माध्यम बनाया। वर्ष 1856 में उपन्यास दुर्गेश नंदनी जिसमें उड़ीसा को केंद्र में रखकर मुगलों व पठानों के आपसी संघर्ष की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के लिए भारतीयों को प्रेरित किया। भारतीय संस्कृति का आदर्श प्रस्तुत किया। वर्ष 1869 में सृजित मृणालिनी उपन्यास में मुगलों के षड्यंत्र से संघर्षरत हिन्दू राजा हेमचन्द्र की गौरवगाथा व देशप्रेम और मातृभूमि की पुजा का सूत्रपात हुआ। धर्मतातव में कहा गया हैं कि देशप्रेम उनके लिए केवल आदर्श नही वरन एक धर्म था। देश केवल माँ नही वरन स्वर्ग हैं, धर्म हैं, देवता हैं और देश ही हृदय हैं। सन्यासी आंदोलन व बंगाल अकाल की पृष्ठभूमि पर रचित आनंदमठ की क्रांतिकारी विचारधारा ने देश में सामाजिक राजनीतिक चेतना जाग्रत करने का काम किया। 
देश की मिट्टी को समर्पित गोपाल सिंह, नेपाली जी की कविताओं में कूट-कूट कर भारी राष्ट्रीय चेतना व जोश जगाने वाली हैं। स्वाधीनता संग्राम का उनकी रचनाओं का स्थान हैं जिसमें राष्ट्रीयता केवाल युगीन प्रवृति के रूप में ग्रहण नही कि बल्कि उनके अंदर से जन्मी थी, मिट्टी के साथ गहरा लगाव था।  
'ओ वतन-चमन के मालियों, व्रत जनम-जनम यह पालियों, तुम अमर उड़सी की लाली से,अपना अंगना रंग डालियो।'  
सशक्त राष्ट्रीय धारा के कवि छायावादोत्तर काल के महान गीतकार राष्ट्र कवि गोपाल सिंह नेपाली ने अपनी स्वाधीनता संग्राम में निर्णायक दृष्टि से आसन्न स्वतंत्रता का स्वागत करते हुये कहा- 'हम कलम चलाकर त्रास बदलने वाले हैं, हम तो कवि हैं इतिहास बदलने वाले हैं।' आने अंतिम समय में कवि ने हिमालय को पुकारा स्वाधीनता की रक्षा के लिए अलख जगाती पंक्तियाँ....... 'भारत के प्यारे जागो, सोये सितारों जागो, बैरी द्वार आए हैं, तुम सीस उतारों जागो।' अप्रतिम कवि औजास्वी वाणी वीर रस के अन्यतम प्रस्त्तोतर ओज एवं शौर्य के सुविख्यात कवि श्री श्याम नारायण पाण्डेय जी के बालमन में देश के लिए गौरव भावना बीज रूप में विकसित हो गई थी। देश के लिए मर मिटने वाले प्रचंड ओज के कवि श्यामनारायण जी की र्चनाए आजादी के परवानों के साथ बच्चों के लिए भी थी। मंत्रमुग्ध करती पंक्तियाँ....... 'बैरी दल को ललकार गिरी, वह नागिन भी फुफकार गिरी, था शोर मौत से बचो-बचो, तलवार गिरि ,तलवार गिरि।' उत्कृष्ट काव्यों में अकबर और महाराज के युद्ध की साक्षी रणभूमि हल्दी घाटी जिसमें जन्मभूमि के स्वातंत्र्य के प्रति तड़प और गौरव की भावना स्वावलंबायमान दृष्टांत हैं। 
राष्ट्र के प्रति अपने स्वधर्म का निर्वाह राष्ट्रीय भावनाओं को अपनी कविता का विषय बनाया। जौहर में रानी पद्मावती की राजपूती स्वाभिमान नारी के गौरव का प्रतीक ओज और वीर रस की प्रमुखता हैं।मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण के सहज भावों से सजा शौर्य काव्य...... 'ज्वलंत पुच्छ्लाहु व्योम में उछालते हुये, असती पर असह्य अग्निदृष्टि डालते हुये।' बुन्देली के समृद्ध साहित्य में मदन मोहन द्विवेदी मदनेश ने रासो काव्य परंपरा में लक्ष्मी बाई अमूल्य कृति हैं। सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधियों से चर्चा में रहा बुंदेलखंड का जनजीवन ,संस्कृति और भाषा बुंदेला क्षेत्रों के वैभव को प्रदर्शित करता हैं। राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अतीत के चलचित्रों को आधार बनाकर संस्कृति ,धर्म और देशभक्ति की रचनाएँ हैं।
देश-विदेश में स्वाधीनता का शंखनाद करने वाले मेधावी, क्रांतिकारी कवि कृष्णलाल श्रीधारावी की दांडी यात्रा के प्रयाण के समय एक सत्याग्रही के रूप में हुंकार थी कि चाहे कुत्ते-बिल्ली की मौत मिस्टर जाऊँ, लेकिन स्व्रज्य लिए बगैर आश्रम नही लौटूँगा। कवि कृष्णलाल जी ने दांडी मंच के तरूण सैनिक के सपूत काव्य लिखा। 
'आववुम ण आशरमे माले नही स्वतन्त्रता। जम्पवुं नथी लगीर जो नही स्वतन्त्रता॥  
भारत में अङ्ग्रेज़ी शासन कि ज़्यादतियों व आक्रांता शासन की कुप्रवृतियों को उजागर करने वाला पहला प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता हैं जो 18 मार्च ,1938 में लिखा गया जिसकी धड़ाधड़ बिकती प्रतियों से चिंतित व विचलित ब्रिटिश शासन ने प्रतिबंधित कर दिया क्योकि वो कूटनीति के तथ्यों आर आधारित था। फूट डालो राज करो की नीति का खुलासा व उनकी ज्यादातियों से लिपिबद्ध उपन्यास उन्हे कठघरे में खड़ा कर देता। पुस्तक का जब्ती अभियान चलाया गया।छिपे हुये साम्यवादी से विभूषित क्रांतिकारी आंदोलन के कारब लगभग 1921-1947 तक आठ बार जेल गए। मुगल शासको, सिकंदर के आगमन से अच्छी-बुरी बातों का विश्लेषण करते हुये भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद ही हुये भारतीयों के चारित्रिक पाटन की बात की जो अंग्रेजों की सोच-समझी साजिश थी। उन्होने लिखा हैं कि यदि पलासी के मैदान से ही भारत में अङ्ग्रेज़ी राज का आरंभ मान लिया था तो साख के लिए 180 साल के विदेशी शासन का नतीजा प्रतिदिन हुई भयंकर दरिद्रता , निर्बलता, फूट, महामारिया के सिवा कुछ और दिखाई ना दे। पाठको के समक्ष स्थिति उजागर कर प्रयास किया कि उन्हे अपने देश के ऊपर अंग्रेजी राज के हितकर अथवा अहितकर प्रभाव का ठीक-ठाक समझने में सुगमता हो।
19 वी शताब्दी में  ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुनाफा कमाने में बंगला देश एमआरएन नील की खेती और किसानों पर हुये अत्याचार पर आधारित उत्पीड़न का आईना दिखाता दिन बंधु मिश्रा का नाटक नील दर्पण जिसमें अंग्रेजों के क्रूर चेहरे को दर्शया हैं। भारत रंगमंच इतिहास में उपनिवेशवाद के क्रूर चेहरे में अरशने वाली कृति में राष्ट्रीय उन्मेष और स्वाभिमान जाग्रत करने का महत्व दर्शाती रचनाएँ हैं। सामाजिक आंदोलन का हिस्सा बनाने की मुहिम में इस नाटक का लखनऊ में मंचन 19 वी शताब्दी की प्रख्यात अभिनेत्री नटी बिनोदिनी और उनके थियेटर सहकर्मियों द्वारा 1875 में प्रदर्शित किया। भारतीय थियेटर इतिहास के सबसे विवादास्पद नाटकों के म्हिमामायी मंचन मंचन के बाद अंग्रेजों ने 1876 में ड्रामेटिक प्रदर्शन अधिनियम पारित कर दिया जिसमें ब्रिटिश विरोधी नाटकों ,षडयंत्रकारी नाटको और तथाकथित तयशुदा सामाजिक मूल्यों कमतर लेने वाले नाटकों के मंचन पर प्रतिबंध लगाया गया।            
अंधविश्वास व पाखंड पर प्रहार करने के साथ धर्म व आध्यात्म का वैज्ञानिक विश्लेषक युग ऋषि श्रीराम शर्मा जी  स्वाधीनता आंदोलन में परम साधक के रूप में उपस्थित रहे। जागृति की अखंड ज्योति जलाने वाले श्रीराम जी के जीवन पर यजुर्वेद के नवे अध्याय की 23 वी कंडिका में वर्णित श्लोक 'वयं राशट्रे जगरियाम पुरोहिताः चरितार्थ करती हैं। आधुनिक युग के मनीषी ,ऋषि व युगदृष्टा जिनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रकी सच्ची आराधना को समर्पित रहा। स्वतन्त्रता आंदोलन के प्रखर भागीदार होने के साथ सैनिक प्रताप, दैनिक विश्व मित्र में नियमित रूप से अपने छपते लेखों से ना केवल स्वतंत्रता सेनानियों का मनोबल बढ़ाया बल्कि द्रुतगति से क्रांति की ज्वाला भड़काई। 
विशाल साहित्यिक अवदान के लिए विख्यात हुये महाकवि राष्ट्राचेतना के संवाहक पंडित नाठूराम शंकर जी के विपुल रचना समंदर में पराधीन राष्ट्र की वेदना समाज में व्याप्त पाखंड, अंधविश्वास ,कदाचार और विधवाओं की दीन-हीन दशा की उपस्थिती थी। तात्कालीन ब्रिटिश शास्ङ्काल से छुटकारा पाने की टीस उपदेश, संदेश मुखर हुये। विशेष उद्धेश्य पार्क भाव से जोड़ती रचनाएँ हैं। भूखा भारत का दृश्य में...... 'जो था नवखंडों में नामी, हीय रहे जिसमे अनुगामी, सो सारे देशों के स्वामी, अब औरों का दास हैं, देखों कैसा डरता हैं, भारत भूखा मारता हैं।'    पीड़ित जर्जर भारत की वेदना....... 'बल बिन कौन र्खवे घर को, विद्या बंट गई इधर-उधर को, संपत्ति फांद गई सागर को, कोरा रंग विराम हैं। हाँ पेट नही भर्ता हैं, भारत भूखा मारता हैं।'
ऐसे ही अङ्ग्रेज़ी शासन कि नीति-अनीति पर, नैतिक शिक्षा का उदाहरण...... बैर फूट के पास ना जाना, सब में रखना मेल-मिलाप, पुनयशील सुख से दिन काटे, पापी करते रहे विलाप। पंडित नाथू राम की रचनाओं में तात्कालीन भारत दशा और समाज का जीवंत वर्णन हैं। 
 भारतीय स्वतंत्रता चेतना के इतिहास में महत्वपूर्ण नाम बांग्ला के प्रसिद्ध कवि काजी नज़रूल की कविताओं के संग्रह [विष की बांसुरी] बिशर बंशी जिसे अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया तो उसे चोरी छिपे अपने साथियों तक पहुंचाया। अपनी कविताओं से ना केवल अंग्रेजों की साम्राज्यवादी अनीतियों का विरोध किया बल्कि आमजन में स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रति उत्साह बढ़ाया। जोश भारती रचनाओं के प्रज्ञा चक्षु कवि हंसराज जिंका पूरा नाम हंसराज भाई हरखाजी भाई कानाबार, ने गांधी जी के आह्वान पर मन की आँखों से राष्ट्रीय गीतों की रचना कर अपनी बुलंद आवाज में जोशीले गीत गाकर सत्याग्रहियों क्रांतिकारीत्यों को जाग्रत किया। आँखों से दिखाई नही देता था पर प्रज्ञा चखूटा से मोम के अक्षरों के स्पर्श से अक्षर ज्ञान किया। वर्ष 1921 में भावभंगिमा के साथ सस्वर गीत से खाड़ी प्रचार करते......'पूर्वजना प्रेम रंगायेल, सरल सनातन सादी, हरदम हम हैं ये उछलावे, मन्नग्ल मानी यादी, धर्मगुरु गाड़ी, ते एक अमूलात खादी।' 
वीर सत्याग्रहियों में जोश को उन्माद बनाएँ रखने वाले जीव हंसराज को राजकोट के सत्याग्रह में भाग लेने पर कारावास की सजा मिली। स्वाधीनता प्राप्त हेतु रचित गीत गुजरात के शहरों में गाये गए जिनहे झकझोर के रख दिया। सन 1857 की क्रान्ति पर लिखा अमृतलाल नागर जी का उपन्यास गदर के फूल तथ्यात्मकता से विशिष्ट व रोचक शैली में लिपिबद्ध हैं। अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई बाराबंकी के निवासियों पर शब्दचित्र विश्लेषणात्मक शैली में 1857 की क्रान्ति के नाकों की क्रान्ति संबंधी संलग्नता और वैशिष्टय के अतिरिक्त उनके बारे में जो भी जनप्रचलित अवधारणाएँ प्रचलित हुई हैं उनकी तथ्यात्मक पड़ताल के अवधारणा से भिन्न हैं। 
ऐतिहासिक दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह से जनमानस की सुप्त चेतना प्रखर संचरित हुए। इसी समय क्रांतिकारी कवि व लोक कवि झवेरचंद मेधानी जी ने मर्मस्पर्शी स्वतन्त्रता सनरम के 15 शौर्य गीतों का संग्रह सिंघूडो देशप्रेम से युक्त इन प्रार्थना गीतों के जादूई प्रभाव से अद्भुत चेतना जाग्रत हुई। उपस्थित लोंगो के साथ न्यायाधीश की भी आंखे नम हो गई।हँसते हुये कारागार जाने वाले निर्भीक कवि जनचेतना जाग्रत करने वाली पंक्तियाँ झकझोर देती......'रज-रज नोधी राखथु, हैया बीच हिसाब, मांगवा जबावों एक दिन आवशु ,अमारा खतना होज छलकावशु। 
अमोध संकल्प के अतुल्य साधक, क्रांतिकारी राजनेता, उच्चकोटी के शिक्षक, प्रखर चिंतक, विलक्षण कवि, दार्शनिक लेखक श्री अरविंद जो बाल,लाल, पाल के गरम दल के जनक थे। वब्डेमटर्म और कर्मयोगी में उनके विचार चिंगारी बनकर दहकते थे। भारत उस तरह नही जाग रहा जिस तरह देश जाग रहे। वह जग रहा हैं उस शाश्वत आलोक को विश्व में विकीर्ण करने के लिए जो उसे भगवान द्वारा सौपा गया हैं। भारत सदैव मानव जाती के लिए जिया हैं,अपने लिए नही,उसे मानव जाति के लिए काम करना हैं।दार्शनिक और आध्यात्मिक क्रांति के उद्घोषकों में अरविंद जी सबकी ओर से धर्मयुद्ध लड़ रहे थे। भारत की आत्मा को जगाना चाहते थे। जन-जन में भवानी मंदिर बनाना चाहते थे।
भारतीय भाषाओं के विज्ञानी आधार स्तम्भ प्रसिद्ध भाषाविद्ध ,साहित्यकार, विद्याशास्त्री श्री सुनीति कुमार चाटुर्ज्या को स्वयं टैगोर जी ने भाषाचार्य जी की उपाधि से आख्यायित किया। गोंडवाना के अंतिम राजा शंकर शाह उनके पुत्र घुनाथ शाह ने अंग्रेजों के खिलाफ जनमानस को आंदोलित करने वाली कविता लिखी। साहित्यकार प्रताप ने प्रवेशांक में लिखा कि समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परम उद्धेश्य हैं और इस उद्धेश्य की प्राप्ति का एक बहुत बड़ा और बहुत जरूरी साधन हम भारत वर्ष की उन्नति को समझते हैं। 
स्वाधीनता आंदोलन में दक्षिण-उत्तर के साहित्य सेतु सुब्रहमण्य भारती राष्ट्र मुक्ति की प्रबल कामना ,सामाजिक नवजागरण ,नवोत्थान के स्वप्नदर्शी तमिल कवि पहले थे जिनके मन मस्तिष्क में अखिल भारती देवता जाग्रत व पल्लवित हुई। आप वंदे मातरम को आजादी का मंत्र मानते हुये कहते हैं कि हम गुलामी रूपी धंधे की शरण में पड़कर बीते हुये दिनों के लिए मन में लज्जित होकर द्वंदों व निंदाओं से निवृत होने के लिए इस गुलामी की स्थिति को थू कहते हुये धिक्कारने के लिए सम्बोधन में हमेशा वंदे मातरम का उद्घोष करते रहेंगे।पद के साथ गद्य विधा और तमिल पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐतिहासिक अवदान का स्मरण करते हुये सुब्रह्मण्यम का जीवन भारत माता को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने का अदम्य संकल्प जीवन थे।रियासत में राजा व जनता पर साहित्य का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उनका नाम भारती रख दिया।
गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित साहित्य राष्ट्रीय जागरण के दूत द्विवेदी युग के कवियों में रामनरेश त्रिपाठी अंग्रेजी शासन के प्रबल विरोधी अपनी ओजस्वी लेखनी से स्वतंत्रता संग्राम के दौरान समाज को जाग्रत किया। बचपन से ही राष्ट्रीय चेतना का भाव समाहित थी।अंग्रेजी की नीति-रीति, कूट चाल ,साजिशे देखकर विक्षुब्ध होकर स्वाधीनता के प्रति ऊर्जास्वित स्वर से गुंजायमान कर जनता को जाग्रत किया। काव्य में जन्मभूमि और जन संस्कृति की प्रमुखता, देशप्रेम का गहरा भाव आदर्शवादी कवि की रचनाओं में समाहित था।काव्य कृति पथिक के तीसरे सर्ग में लिखा…. 'देश की यह दशा देखकर पथिक देश सेवा में निश्चित मन और अपूर्व उमंग से तत्पर हुआ।आत्मा के विकिस से मानवता विकसित होती हैं….'देशप्रेम वह पुण्य क्षेत्र हैं ,असल असीम त्याग में विकसित, आत्मा के विकास से जिसमें, मनुष्यता होती विकसित।' मानसी में भावप्रवण और विचारपरक राष्ट्र प्रेम रचना….'वह देश कौन सा हैं?  जिसमें दधीच दानी हरिश्चन्द्र कर्ण से थे, सब लोक के हितैषी , वह देश कौन सा हैं? '
संपादकीय निष्ठा प्रौढ़ परिपक्व और गुरू गंभीर हैं…. यह उद्घोष आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी विरचित इस दोहे के रूप में प्रताप के प्रत्येक अंक में मुख्य पृष्ठ के नाम से ठीक नीचे लिखा होता था….' जिसको ना निज गौरव और निज देश का अभिमान हैं। वह नर नहीं, नर पशु निरा हैं, और मृतक समान हैं। ' प्रताप पत्रकारिता की पाठशाला रहा।शहीद ए अरजम भगत सिंह की क्रांतिकारिता को गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप में ठांव मिला।चाहे किसानी हो या मजदूरों का शोषण या फिरंगी हुकूमत की प्रताड़ना का प्रतिरोध हो या फिर धार्मिक पाखंडों हर विषय पर बेवाक कलम चलाई।
विद्यार्थी जी के व्यक्तित्व का एक ओर पक्ष विचारणीय भविष्य में झांकने की क्षमता थी।
कलम से आजादी की लड़ाई  लड़ने वाले बुद्धिनाथ झा कैरव भारत की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने और गीतों से क्रान्तिकारियों में जोश भरा। अपनी कविता का आरंभ ब्रजभाषा से किया बाद में हिन्दी भाषा में अपने लेखन से साहित्य को समृद्ध किया।आजादी की गतिविधियों में शामिल होकर जेल भी गये।  बंधनों व विवशताओं के बीच निश्चिंत होकर लिखी रचनाओं में स्वतंत्रता के स्वर मुखर थे। जब वर्ष 1942 में देश धधक रहा था तब बुद्धिनाथ जी अपनी कविताओं से क्रान्तिकारियों में जोश भर रहे थे….'जो बचे भागकर घर में निज, छिपकर, घुसकर,दबकर,डरकर, कहता जग उनको कायर रे! क्या जीते यो जीवित मरकर?' देश की आजादी का उन्हें पूर्ण विश्वास मानते हुये हजारीबाग जेल में जब वह बंद थे तब उन्होंने लिखा था….'युग-युग  से पीड़ित मानवता को देकर अभिनव उन्मेष, लाया था यह दिन स्वतंत्रता का सुन्दर सुखमय संदेश।' संस्कृति और समाज के जागरण में अपना महत्तर योगदान देते हुये उनका पूरा साहित्य खादी लहरी, हीरा, पश्चाताप आदि  राष्ट्रीयता से आप्लावित हैं। 
प्रखर स्वतंत्रता सेनानी बालकृष्ण शर्मा, नवीन जी पर वर्ष 1916 में लखनऊ में हुए कांग्रेस अधिवेशन का गहरा प्रभाव पड़ा। समय को अभिव्यक्त करने के साथ समय की सीमाओं को लांघता नवीन जी का साहित्य राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत हैं….'कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससेषुथल-पुथल मच जाये।' ऐसे विप्लव गीत रचने वाले नवीन जी स्वाधीनता की चेतना के संवाहक थे उन्होंने साहित्य एवं पत्रकारिता को राष्ट्रीय आंदोलन के वृहत्तर उद्देश्यों के साथ जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
देशकाल के अनुरूप आने वाले वातावरण में समय की आहट सूंघ लेने वाले राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्तजी ने विभिन्न विधाओं में भाषिक प्रयोगों की विपुलता और रचनाओं में काव्य की नवीनता और वैविध्य हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया।किसानों की दयनीय दशा पर किसान प्रबंध काव्य में उनकी निरीहता और निश्छलता को साकार रूप दिया….'आया महाजन के यहां वह अन्न सारा अंत में, अधपेट रहकर फिर उन्हें हैं कांपना हेमंत में। 19वी सदी के नवजागरण काल में आधौनिक चेतनावके युग में होने वाले परिवर्तनों को आपने खड़ी बोली में कलमवद्ध कर उसे प्रतिष्ठित रूपषदिया।लोकमंगलकारी रूपो व सांस्कृतिक उत्थानों को गहराई से पिरोकर भारत की अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना को  भारती भारती में उभारा जिसमें पूर्व परंपराओं के प्रति मोहविष्ट होकर कह उठे…..'संपूर्ण देशों से किस देश का उत्कर्ष हैं,  उसका कि जो ॠषिभूमि हैं, वह कौन?भारतवर्ष हैं। '
अपने लेखन से स्वाधीन आंदोलन की धार देने वाले राष्ट्रीय चेतना के प्रतिबिम्ब रामवृक्ष बैनी पुरी जी की रचनाएँ मनुष्यता के मूल से निकली जातीय संकीर्णता से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण में प्रेरक होती रही।राष्ट्र की मुक्ति और नये भारत के निर्माण में प्रेरक लेखन उनका एक सक्रिय आंदोलनकारी के रूप में सर्जक था।अंग्रेजों के खिलाफ गौरिल्ला युद्ध की शुरूआत करते हुथे बेनीपुरी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी साहित्य चेतना से जगाने वाले आजीवन योद्धा रहे।अपनी पत्रकारिता से अंग्रेजों को समय-समय पर बोध कराने वाले कि हम उनके गुलाम नही, बैनीपुरी जी ने कारागार मही कैदी नामक हस्तलिखित पत्र निकालकर जनसंवाद को जीवंत रखा।उनकी कलम साम्राज्यवाद के खिलाफ आग उगलती रही।
एक भारतीय आत्मा के नाम से इस विशेषण को चरितार्थ करते भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अमर सेनानी माखनलाल चतुर्वेदी जी का लेखनकर्म परंपरागत छवियों से बाहर निकल स्वाधीनता के लिए लंबे कठिन संघर्ष के लिए हुआ। मरे हुए लोगों में जुनून व जोश भरकर प्राण फूअअंकने वाले माखनलाल जी के लेखों में भारतीय आत्मा के दर्शन होते हैं। वे क्रान्तिकारियों की युवा ऊर्जा को अपने सिद्धांतों की ओर मोड़कर अंगार बरसाने वाली कविताएं जो यथार्थ से दूरी बनाएं रखने वाले आदर्शवाद में यकीन कर ही नहीं सकते थे।राजनीति के जरिए खोई हुई स्वाभिमान को वापस लाने वाले माखनलाल जी के शब्द प्रलय मचा देते थे….'सूली का पथ ही सीखा हैं सुविधा सदा बचाता आया।मैं बलिपथ का अंगारा हूँ, जीवन ज्वाल जगाता आया।' बलिदान पथ की कविता पुष्प की अभिलाषा वैदिक ॠचाओं से भी अधिक पावन…. करोड़ो भारत वासियों को पुकार रही… मुझे फेंक देना उस पथ वनमाली ,जिस पथ जाये वीर अनेक।अपनी मिट्टी से बेहद प्यार करने वाले माखनलाल जी में भारत की स्वाधीनता और स्वाभिमान के लिए वो आग प्रज्ज्वलित थी जो शब्द बनकर धधकते थे।
अपनी रचनात्मकता को राष्ट्रीय धारा के लिए समर्पित महात्मा गांधी से प्रेरित राष्ट्र कवि सोहनलाल द्विवेदी जी स्कूल समय से ही आंदोलन में टूट पड़े। प्रसिद्ध क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ के उनके सामने जेल जाते देख कवि मन का आक्रोश फंट पड़ा….'दुनिया में जीने का सबसे सुन्दर मधुर तकाजा, ऐ शहीद उठने दे अपना फूलों भरा जनाजा हैं। 'राष्ट्र जागरण हेतु साहित्य सृजन को अपना हथियार बनाने वाले सोहनलाल जी की कविताओं ने पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के ह्रदय में देशभक्ति का संचार किया।एंजेल  के दीवाने ओजस्वी व्यक्तित्ववाले सोहनलाल द्विवेदी जी की लोकप्रिय कविता की चंद पंक्तियाँ…'गला दिया तुमने तन को रो-रो आंसू के पानी में, मातृभूमि की व्यथा सह रहे भरी जवानी में। 
गोपालदास जी की पंक्तियाँ.... 'आजादी के चरणों में जो जयमाल चढ़ाई जाएगी, वह सुनो तुम्हारे शीशों के फूलों से गूँथी जाएंगी। कवि प्रदीप की ये मेरे वतन के लोगों...... लता मंगेशकर द्वारा गाया ......पूरे देश को झकझोर के रख दिया।   .प्रसादजी का काव्य और नाट्य कृतियों में राष्ट्रीय अस्मिता और स्वाभिमान में उद्घोष के साथ क्रानीतिकारियों के प्रति गहन अनुराग भी था। हिन्दी साहित्य के विशाल कालखण्ड में देशभक्त स्वतंत्रता के उद्घोषक और समाज सुधारक साहित्यकारों ने अपनी कलम से जन-जन में सोई चेतना को जगाने क्रांतिकारी ज्वाला जलाकर साहित्य, समाज और देश की अतिशय सेवा की।

स्वरचित व अप्रकाशित हैं। 

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कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
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vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
yesterday
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3

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