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कारगिल युद्ध के एक सैनिक का अंतिम क्षण

लेह से कारगिल तक का राजमार्ग
फिजाओं में घुला था बारूदी महक
हो भी क्यों ना
यह युध्ध तीर -कमानों से नहीं
बोफोर्स्र तोपों का था ॥

अँधेरी रातों में
घावों से रिस रहा था मवाद
शरीर निढाल था
और पैर मानो
लोहे का बना था ....
मिलों तक थकान नहीं था
मगर कान जगे थे
और जब कान जागता हो
तो नींद कैसे आएगी ॥


धुल के गुब्बार
आखों में धुल नहीं झोक पाए
वह नेस्नाबुद करना चाहता था
चाँद -तारे उगे हरे झंडे
और फतह करना
चाहता था जंग ॥
कल सुबह उसे ...
टाईगर हिल पर
तिरंगा जो फहराना था



मेरे सैनिक दोस्त
आप रात में ही शहीद हो गए थे
मगर...आपके साथियों ने
कल सुबह
टाई गर हिल पर तिरंगा लहरा दिया था ॥


दोस्त , मुझे आज पता चला
सैनिक एक आदमी नहीं
एक जज्बा का नाम है ॥
और ऐसे जज्बे वाले हर भारतीय को
मेरा शत -शत नमन ॥

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 7, 2010 at 11:10am
बहुत बढ़िया , पूरा युद्ध क्षेत्र का आँखों देखा हाल आपने बता दिया , साधुवाद,

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 7, 2010 at 10:45am
रोमांचित करने वाली रचना के लिये साधुवाद

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