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युवा मन की ख्वाहिसे

लाखों पैदा हो रहे युवाओं में से
मैं भी एक युवा हू ॥

गन्ने के रस से नहा कर
और चासनी की क्रीम लगाकर
रोज सुबह -सुबह
बाहर निकलती है मेरी ख्वाबें॥
जब मैं अपने सारे सर्टिफिकेट
एक बैग में डाल कर
निकल पड़ता हू ...
साक्षात्कार के लिए ॥

खूब उडती है मेरी ख्वाबें
मानो कल ही खरीद लूँगा
पार्क स्ट्रीट में अपना एक बंगला
मारुती सुजुकी का डीजायर
सोनी बाओ का लैप -टॉप
ब्लैक -बेर्री का मोबाइल
और फिर चखने लगूगा
येलो चिली रेसतरां में बैठकर
चिकेन टिक्का ॥

मगर .....
शाम होते -होते थक जाती है मेरी ख्वाबें
करेला सी कडवी हो जाती है मेरी ख्वाबें ॥

कल फिर सुबह ...
मेरी माँ और बहन
माथे पर तिलक लगाकर
और व्रत कर
मेरे ख्वाबों को फिर से उड़ाएगी ॥

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 29, 2010 at 10:36am
सत्य को प्रदर्शित करती एक ज्वलंत कविता, बहुत ही खूबसूरत रचना,धन्यवाद,

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 28, 2010 at 11:10pm
यथार्थ के धरातल का एहसास कराती हुई आपकी यह रचना बहुत कुछ कह जाती है|

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