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::::: हाँ बूढा हूँ, पर अकेला नहीं ::::: ©


► Photography by : Jogendra Singh ( all the photographs in this picture are taken by me ) ©

::::: हाँ बूढा हूँ, पर अकेला नहीं ::::: © (मेरी नयी कविता)
जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 27 अगस्त 2010 )
Note :- ऊपर एक पंक्ति चित्र के नीचे दब गयी है उसे यहाँ पूरा लिखे दे रहा हूँ ►
►►►
"क्षितिज रेखा से झाँकना सूरज का ...
छिटका रहा है सूरज ...
रक्तिम बसंती आभा ..."
►►► शब्द सुधार --> गदर्भ = गर्दभ

► NOTE :- यदि कुछ पसंद नहीं आया हो तो Please साफ़ बता दीजियेगा.. मुझे अच्छा ही लगेगा..
▬► !!..धन्यवाद..!!

((इस कविता की प्रेरणा प्रतिबिम्ब भैय्या की रचना "हाँ मैं अकेला हूँ" से मिली है ...
जिस पंक्ति ने मुझे यह कविता लिखने को प्रेरित किया वह है ►
"अब मै निसहाय मौन खडा हूँ, सूख गई है काया" ))
.

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Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 9, 2010 at 11:26pm
@ बागी भाई, पराती जी की रचना की एक पंक्ति ( "अब मै निसहाय मौन खडा हूँ, सूख गई है काया" ) से प्रेरणा मिली और जो लिखा उस पर आपसे तारीफ पा रहा हूँ दोस्त ... धन्यवाद आपका ... :)

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 6, 2010 at 2:22pm
बहुत खूब जोगी भाई, बुजुर्ग मन की व्यथा बड़े ही खूबसूरत अंदाज मे आपने व्यक्त किया है, यही एक सच्चाई है जिसे कमोवेश सभी को गुज़रना ही पड़ता है, उम्द्दा ख्यालात, सनडर रचना, धन्यवाद,

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