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       *स्वप्न*

सपनों को मत रोकों टोको,

क्या ये साकार  नहीं  होते .

होता है सब कुछ करने से ,

सपने  लाचार  नहीं  होते ..


जीवन पतंग भी  उमग चले,

सपनों  की  डोरी  जुड़ने  से .

मंजिल तो नहीं मिल पाती है,

पथ पर चल वापस मुड़ने से ..


जीवन में यदि कुछ स्वप्न न हों,

तो   क्या  विकास  हो  पायेगा .

कैसे   होगी  पथ  की  तलाश ,

यदि  मन  निराश  हो  जायेगा..


यदि पथ प्रशस्त न हो फिर भी,

चलने  की  दृढ़  जिज्ञाशा  हो.

जीवन की कठिन तपस्या  में,

सपने  सजने  की  आशा  हो ..


वो दृग  जिसमे  सपने  न  हों,

वह  आँख  सदा  ये  कहती  है .

जीवन की स्वप्न रहित बगिया,

कब  हरी  भरी  हो  खिलती  है ..


यदि  देखें  सपने  बंद  नेत्र ,

तुम नयन खोल साकार करो.

पग थक जाएँ पर बढ़े चलो ,

मंजिल से अपनी प्यार करो ..

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Comment

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Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on February 26, 2012 at 1:09pm

श्री गणेश सर जी कविता को सराहने के लिए आपका कोटि -कोटि धन्यवाद व वंदन


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 25, 2012 at 5:27pm

सत्य वचन शैलेन्द्र जी, यदि सपना ही न हो तो फिर विकास पथ पर कैसे बढ़ सकेंगे , सपना जरुरी है तभी तो उसे पूरा करने हेतु प्रयत्न करेंगे , अच्छी रचना , बधाई स्वीकार करे |

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on February 24, 2012 at 7:30pm

उत्साहवर्धन के लिए आभार 

Comment by asha pandey ojha on February 23, 2012 at 1:07pm

 bahut hi sundar bhawon w vishwas se poorn rachna 

कृपया ध्यान दे...

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