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मेरा दिलबर हसीन नही बेशक

मेरा दिलबर हसीन नही बेशक
कोई उस सा कहीं नहीं बेशक .

वो कही की नही है शेह्जादी,
वो है दिल की मेरे खुशी बेशक .

आँखें उसकी न शरबती न सही ,
उस की आँखों में हूँ में ही बेशक .

उसकी आवाज़ में खनक न सही ,
करती है वो मेरी कही बेशक .

दीप बन कर कभी जो मैं आया ,
ज्योति बन कर के वो जली बेशक .
deepzirvi 9815524600

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Comment by DEEP ZIRVI on October 13, 2010 at 10:25pm
सुधार की गुंजाइश सदा रहती है;आप ग्लतियों की ओर इंगित कीजिए ,में सुधारने का वायदा करता हूँ

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 13, 2010 at 10:19pm
रचना अच्छी है, ख्याल भी बढ़िया है, ग़ज़ल कहना ठीक नहीं है, ग़ज़ल के नियमों के अनुसार नहीं है, मेरे ख्याल से नज्म या कविता कही जा सकती है |

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