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उंगलियाँ हम पे यूँ न उठाया करो

उंगलियाँ हम पे यूँ न उठाया करो


हर बार लिया मजा तुमने, हम भी चखे,
इंतज़ार हमें भी कभी तो कराया करो |

दौलते दिल है ये, इन्हें यूँ न बहाओ,

अंखियों से मोती यूँ न छलकाया करो |

हमने जब भी किया शिकवा,सुना तुमने,

शिकायतों का दौर,खुद भी लगाया करो |

फ़िक्र रहती है तुम्हारी,इस दिल को सदा,
नज़रों से दूर यूँ तुम न जाया करो |

नजर आता है आँखों में, दिल में भी होगा,

जज्बात लबों पर भी कभी तो लाया करो |

चाँद का टुकड़ा कहूँ या कहूँ मेनका तुम्हे,

तीर यूँ ही अदाओं के हर पल चलाया करो |

बे पनाह मुहब्बत है, ज़माने से कहदो,

उंगलियाँ हम पे यूँ न उठाया करो |

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 31, 2012 at 9:38am

पूर्व में की गयी प्रतिक्रिया पर ध्यान दीजिये आदरणीय सचिन जी
इस खूबसूरत से प्रयास पर बधाई

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on August 30, 2012 at 10:53pm
आदरणीय सचिन!
//चांद का टुकड़ा कहूं या कहूं मेनका तुम्हें।
तीर अदाओं के यूं ही हरपल चलाया करो॥//
ये मेनका तो मनका चूल ही हिला देगी।अच्छी गजल के लिये बधाई।
भाव का उन्मुक्त प्रवाह बाधित है,दरिया गजल(नुमा) का किनारा और प्रवाह वेग असंतुलित है,कृपया बांध का निर्माण करें।

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