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दिया प्रभु ने जलाया था

मधु गीति सं. १५०३ दि. ४ नवम्बर, २०१०


दिया प्रभु ने जलाया था, सृष्टि अपनी जब कभी भी;
आत्मा को तरंगित कर, उठाया था निज हृदय ही.

निराकारी भाव निर्गुण, बदलना वे जभी चाहे;
जला दीपक आत्मा में, सगुण का संकल्प लाये.
हुई सृष्टि प्रकृति की तब, तीन गुण अस्तित्व पाये;
संचरित हो बृाह्मी मन, पञ्च तत्व विकास पाये.

धरा के विक्षुब्ध मन में, बृाह्मी मन किया दीपन;
वनस्पति जन जन्तु हर मन, बृह्म ही तो किये चेतन.
वे जलाते दीप आत्मा, नित्य प्रति रख ध्यान सब ही;
ध्यान कर 'मधु' जीव उनका, जलाते दीपक हिये ही.

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 8, 2010 at 8:55am
परम पिता परमेश्वर को ध्यान करते हुये लिखी गई यह कविता बहुत ही रुचिकर लगी,

कृपया ध्यान दे...

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