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पत्थर भी एकदिन पिघल जाते हैं ...

( आपकी सेवा में मेरी ताज़ी रचना )

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वक्त  आने  पे जो न संभल पाते हैं |

 फिर  शहर खंडहर में बदल जाते हैं ||

उनकी गुस्ताखियों का यही है सबब ,

दिल  लगाते ही बेदिल हो जाते हैं ..|

फिर  शहर खंडहर में बदल जाते हैं ||

 आँसुओं  की कीमत  जो जाने नही,

 एक दिन ख़ाक में वो मिल जाते हैं | 

फिर  शहर खंडहर में बदल जाते हैं || 

आशिकों  की  आह  मानों  आँधियाँ,

 चिरागों से चमन भी जल जाते हैं  |  

 फिर  शहर खंडहर में बदल जाते हैं|| 

''राय ''  खुद  पे गुरुर न इतना करो ,

पत्थर भी एकदिन पिघल जाते हैं  .|

 फिर  शहर खंडहर में बदल जाते हैं||...................श्री राम राय 

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Comment by श्रीराम on May 12, 2013 at 7:36pm

धन्यबाद राजीव जी 

Comment by RAJEEV KUMAR JHA on March 31, 2013 at 12:25pm

बहुत सुन्दर रचना ,श्री राम जी .

आंसुओं की कीमत जो जाने नहीं

एक दिन खाक में वो मिल जाते हैं

बहुत खूब .

कृपया ध्यान दे...

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