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अक्स तेरा..//आबिद अली मंसूरी!

यह दिलकशी का आलम
यह ख़्यालोँ की अंजुमन,
हमसफर बन गयी हैँ जैसे
हिज़्र की तन्हाइयां..
हसरतोँ की आगोश मेँ
ली हैँ धड़कनोँ ने
फिर
अंगड़ाइयाँ चाहत की..
फूलोँ मेँ निहित खुश्बू की तरह
एक नयी सहर की आस लिए
आँखोँ मेँ उतर आया है जैसे
झिलमिल-झिलमिल
अक्स तेरा..!
>¤<>¤<>¤<>¤<>¤br /> (मौलिक व अप्रकाशित)
----->_आबिद अली मंसूरी

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Comment by Shyam Narain Verma on June 10, 2013 at 1:02pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by Abid ali mansoori on June 9, 2013 at 12:22pm
Aadarniya annapurna ji hardik abhaar aapka!
Comment by annapurna bajpai on June 9, 2013 at 11:41am

bahut sunadar gazal ke liye bahut badhai . adrniya abid alii ji .

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