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ग़ज़ल - 'आवारगी के सफ़र में थके-टूटे ये बदन भी'

               ग़ज़ल

 

 

आवारगी के सफ़र में थके-टूटे ये बदन भी,

मंजिलें तो क्या मिलीं, खो गए मसकन भी।          मसकन - रिहायाशें, वास

सूरज के माथे पे उभरी देखी एक शिकन  भी,

सहरा में उतरे जब कुछ  मोम के बदन भी।           सहरा - रेगिस्तान

ज़िस्म के अंधे कुँयें से कायनात में निकल,

ज़ेहन नाम का रखा है इसमें एक रौज़न भी।          रौज़न - रौशनदान

वो फ़कीर मुतमईन था एक रिदा ही पाकर,

दामन है, ओढ़न-बिछावन है और कफ़न भी।          मुतमईन - सन्तुष्ट,   रिदा - चादर  

मैं जिंदगी को काँटों भरी ख़िज़ां कैसे कह दूँ,

मिस्ले-बहार कभी मिला था एक गुलबदन भी।

ख़्बाब नींदों की खुशलिबासी ही तो हैं प्यारे,

सुबह इन्हें उतार फैंक, हर रात ये पहन भी।

अपने लिये ढूँढ रहे थे नए अक्स, नये चेहरे,  

परछाईयों  के शह्र में गवां आये वो बदन भी।

हाथों के फ़ूल नहीं, छालों भरे तलवे भी देख,

मेरे  सफ़र  में आये हैं सहरा भी, चमन भी।

उसका किरदार यूं मेरे लम्हों पर हावी रहा,

मेरी बीवी मुझे लगी माँ भी कहीं बहन भी।

एक बार बेलिबास किया गया था शह्र में मुझे,

मेरा नंग ढंक न पाये फिर कभी पैराहन भी।           पैराहन - वस्त्र 

वक़्त ने हादसों के खंज़र जिधर भी फैंके,

कहीं रहा, ज़द में आ ही गया मेरा बदन भी।          

कहीं अपनी हिज़रत उम्र भर की ना हो 'सानी'

दामन में ले ही चलो थोडी सी गर्दे-वतन भी।           हिज़रत - परवास 

 

 

मौलिक और अप्रकाशित , [  'सानी' करतारपुरी ]

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Comment by सानी करतारपुरी on July 4, 2013 at 10:52pm

आदरणीय बृजेश जी, बेह्र, अरूज़  की बेइल्मी की बजह से बेह्र, अरूज़ के  उस्तादों का हुआ तंज़ शायद आप नहीं समझे जोकि जायज़ भी है .. मुझे अपनी कम-इल्मी के लिए नमोशी है लेकिन अपने अशआर का फख्र है .. आपको ग़ज़ल पसंद आई, मुझे ख़ुशी है .. शुक्रिया 

Comment by बृजेश नीरज on July 4, 2013 at 8:19pm

आदरणीय आपकी रचना को पसंद तो सबने किया है।

Comment by सानी करतारपुरी on July 4, 2013 at 8:01pm

अशआर पसंद और नापसंद करने वाले सभी का शुक्रिया दोस्तों, दोनों ओर  से मेरी होंसला-अफजाई हुई है ..

Comment by वीनस केसरी on July 3, 2013 at 11:46pm

जनाब,
लहजा रवायती ग़ज़ल से वाबस्ता कर ही चुके हैं तो ग़ज़ल की रवायत को भी निभाया होता ...
बहर की नाजुक डोर हर मिसरे में अनमेल मोती पिरोये हुए है ...
ऐसा किया होता तो ग़ज़ल शायद पहले कहीं और पढ़ने को मिली होती ...

Comment by बृजेश नीरज on July 3, 2013 at 9:33pm

आदरणीय अच्छा प्रयास है। बधाई! यदि रचना के साथ बहर का भी जिक्र होता तो सबको आसानी होती।
सादर!

Comment by Priyanka singh on July 3, 2013 at 7:33pm

मैं जिंदगी को काँटों भरी ख़िज़ां कैसे कह दूँ,

मिस्ले-बहार कभी मिला था एक गुलबदन भी।

हाथों के फ़ूल नहीं, छालों भरे तलवे भी देख,

मेरे  सफ़र  में आये हैं सहरा भी, चमन भी।

उसका किरदार यूं मेरे लम्हों पर हावी रहा,

मेरी बीवी मुझे लगी माँ भी कहीं बहन भी।..........खूब  बधाई......

Comment by Sumit Naithani on July 3, 2013 at 3:10pm

sunder

Comment by सानी करतारपुरी on July 2, 2013 at 7:25pm

आदरणीय जितेंदर जी,  आपके शब्दों के लिए बहुत आभारी हूँ .. शुक्रिया 

Comment by सानी करतारपुरी on July 2, 2013 at 7:22pm

आदरणीया राज जी , हौंसला-अफजाई के लिए बहुत शुक्रिया .. आपकी दाद मेरा इनाम है… 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 2, 2013 at 4:17pm
"आवारगी के सफ़र में थके-टूटे येबदन भी,

मंजिलें तो क्या मिलीं, खो गए मसकन भी".......वहुत खूब ! आदरणीय...सानी जी, बधाई

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