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तन्हाई की हांडी में,
दर्द उबलता रहा-
उबलता रहा...!!

गम के अलाव जलाते रहे जिस्म मेरा...
मेरी ख्वाहिशें सिमट गई-
घुटन की चादर में...

एहसास मेरे दम तोड़ गए-
मुझमें ही कहीं...!!

फिर भी कुछ कमी थी-
मेरे फना होने में शायद...
तभी इक टुकड़ा तेरी मोहब्बत का,
आ गिरा मेरे दिल के आँगन में...!!


मौलिक/अप्रकाशित

Views: 463

Comment

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Comment by Manav Mehta on August 29, 2013 at 6:22am
धन्यवाद केवल प्रसाद जी।
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 26, 2013 at 8:18pm

आ0 मानव भाई जी,  सुन्दर रचना।  बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by Manav Mehta on August 26, 2013 at 5:12pm
प्रियंका , पसंद करने के लिए शुक्रिया।
Comment by Manav Mehta on August 26, 2013 at 5:07pm
अरुन शर्मा जी,आपका आभार।
साधुवाद।
Comment by Manav Mehta on August 26, 2013 at 5:05pm
शुक्रिया गिरिराज भंडारी जी।
Comment by Priyanka singh on August 26, 2013 at 3:47pm

ख्यालों को खूब पिरोया है सोच की डोर में ....सुन्दर .....बधाई मानव जी 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 26, 2013 at 1:45pm

आदरणीय मानव जी आपकी रचना पहली बार पढ़ रहा हूँ और पढ़कर अच्छा लगा बेहद सुन्दर प्रस्तुति बधाई स्वीकारें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 26, 2013 at 1:11pm

मानव भाई , बहुत अच्छी रचना !तमाम निराशाओं के बाच आशा की किरण का मिलना ! बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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