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ग़ज़ल : तुम्हारा प्रेम ही - अरुन शर्मा 'अनन्त'

(बह्र: हज़ज़ मुसम्मन सालिम )
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन

तुम्हारा प्रेम ही अक्सर मुझे मगरूर करता है
तुम्हारा प्रेम ही अक्सर मुझे मजबूर करता है

तुम्हारा प्रेम ही खुशियों का इक साधन मेरी खातिर
तुम्हारा प्रेम ही खुशियों से कोसो दूर करता है,

तुम्हारा प्रेम ही हिम्मत मुझे मुश्किल घड़ी में दे,
तुम्हारा प्रेम ही तो हौंसला भी चूर करता है

तुम्हारा प्रेम ही मरहम बने जख्मों पे लग जाए ,
तुम्हारा प्रेम ही तो घाव को नासूर करता है

तुम्हारा प्रेम ही अस्तित्व मिटाने को सदा आतुर,
तुम्हारा प्रेम ही रक्षा मेरी भरपूर करता है... 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 792

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Comment by अरुन 'अनन्त' on September 30, 2013 at 11:06am

हार्दिक आभार आदरणीय अनुराग जी

Comment by Abhinav Arun on September 30, 2013 at 11:04am

तुम्हारा प्रेम ही अस्तित्व मिटाने को सदा आतुर,
तुम्हारा प्रेम ही रक्षा मेरी भरपूर करता है... 

 

                    हर शेर शानदार भावपूर्ण दिल से निकला हुआ ..शायर की ईमानदारी की मिसाल देता .. बहुत बधाई स्वीकारें अरुण जी ...हाँ एक निवेदन  .... प्रेम बहुत मुश्किल शय है ..चचा ने कहा था ...आग का दरिया ....खुदा हासिल होने जैसा ...

.

इश्क अल्लाह की इबादत है ,

 

इश्क अल्लाह का पता लाया

 

                 ...मेरे इस शेर के जैसा ... तो सानी मिसरों के उत्तरार्ध में जो प्रेम के बारे में बातें कही हैं ''तुम्हारा प्रेम ही खुशियों से कोसो दूर करता है, '''जैसी ..थोड़ी इनसे अ सहमति है .... चोट हम सबने खाई है पर दोष अक्सर चलने का होता है पत्थर का नहीं सो आइये प्रेम को पूजें !! सादर नमन वंदन ..दिल की बात थी अपना समझ कही है बुरा न मानियेगा ..संकोच है ..और स्नेह और आशीष बहुत बहुत !!

Comment by Vindu Babu on September 30, 2013 at 10:15am
आदरणीय अरुन जी प्रेम के विभिन्न आयामों को दर्शाती सुन्दर गजल है।
सादर बधाई आपको
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 30, 2013 at 9:06am

तुम्हारा प्रेम ही खुशियों का इक साधन मेरी खातिर
तुम्हारा प्रेम ही खुशियों से कोसो दूर करता है,...........वाह! बहुत ही गहरे प्रेम की सच्चाई

तुम्हारा प्रेम ही हिम्मत मुझे मुश्किल घड़ी में दे,
तुम्हारा प्रेम ही तो हौंसला भी चूर करता है............जब प्रेम में भरोसा टूटे

तुम्हारा प्रेम ही मरहम बने जख्मों पे लग जाए ,
तुम्हारा प्रेम ही तो घाव को नासूर करता है ..........बहुत सटीक ख्याल

वाह! बहुत ही शानदार गजल, एक से बढकर एक शेर, दिली दाद कुबूल कीजिये आदरणीय अरुण अनंत जी

Comment by vijay nikore on September 30, 2013 at 4:27am

//तुम्हारा प्रेम ही मरहम बने जख्मों पे लग जाए ,
तुम्हारा प्रेम ही तो घाव को नासूर करता है // ....     ....  बहुत खूब !

 

बधाई।

विजय निकोर

Comment by Sarita Bhatia on September 29, 2013 at 9:36pm

लाजवाब 

उम्दा

खुबसूरत

Comment by Meena Pathak on September 29, 2013 at 8:44pm

बहुत सुन्दर ... बधाई 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 29, 2013 at 8:37pm

तेरा प्रेम ही बनाता है मेरे ख्वाबो के महल !

तेरा प्रेम ही फिर उन्हें  चकनाचूर करता है !

 

सुभान अल्लाह ! उम्दा ग़जल

क्यों मिलती नही मंजिल मोहब्बत के मारो को !

दिल बार - बार यही सोचने को मजबूर करता है 

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