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कारोबार-ए-जिंदगी के कारवां चलते रहे

निकले धूप और कभी बादल हैं पिघलते रहें

मौसमों की फितरतों में है की बदलते रहे

 

कभी पके कभी फुटे लौंदे गए रौंदे गए

मस्त होके जिंदगी के सांचे में ढलते रहे

 

शिकवा नहीं जीवन के है उतार और चढाव से

तकदीर के जानों पे हम ख़ुशी ख़ुशी पलते रहे

 

मुश्किलों तो आएँगी हज़ारों राह में मगर  

कारोबार-ए-जिंदगी के कारवां चलते रहे

 

आयें लाखों तूफां पर उम्मीदें बुझ सकें नहीं

हौसलों के साए में चराग ये जलते रहे

 

 चलकर खिलाफ लहरों के हम पहुंचे हैं किनारों पर  

लोगो की निगाह में यूँ ही नहीं खलते रहे

 

 

शरद

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 555

Comment

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Comment by शरद कुमार on October 25, 2013 at 10:46pm

श्री गिरिराज भंडारी जी .......और आशुतोष मिश्र जी ........बहुत बहुत आभार की आपके मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन का........आपके अमूल्य सुझावों को अवश्य ही अमल में लाया जायेगा......धन्यवाद 

Comment by शरद कुमार on October 25, 2013 at 10:42pm

श्री वीनस जी.......रचना पर प्रतिक्रिया देने के लिए आभार .........यह आपका ही मार्गदर्शन है की मैं इस मंच पर मौजूद हूँ........आप लोगों के सानिध्य में यथा-संभव सीखने का प्रयास जारी है.........

Comment by शरद कुमार on October 25, 2013 at 10:40pm

माननीय विजय मिश्र जी ,राम शिरोमणि पाठक जी एवं   ब्रिजेश नीरज जी.......आप सभी के द्वारा मिले उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद 

Comment by बृजेश नीरज on October 24, 2013 at 10:09pm

इस प्रयास पर आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 24, 2013 at 3:53pm

आपके प्रयास पर हार्दिक बढ़ाई ...आदरणीय वीनस जी का मशविरा अमल में लायें ..आपको सुखद परिणाम मिलेंगे ..सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 24, 2013 at 7:53am

आदरणीय शरद भाई , गज़ल के गम्भीर प्रयास के लिये आपको बहुत बहुत बधाई !!!! वीनस भाई के कहे अनुसार आप गज़ल की बातें और गज़ल की कक्षा  का बहुत अच्छे से अध्ययन करना शुरू कर दीजिये !!!

Comment by वीनस केसरी on October 24, 2013 at 1:52am

आप सही मंच पर मौजूद हैं ... मंच पर प्रस्तुत सामग्री का अध्ययन करें ...

सादर

Comment by ram shiromani pathak on October 23, 2013 at 8:17pm

सुंदर प्रयास हार्दिक बधाई आपको //सादर

Comment by विजय मिश्र on October 23, 2013 at 5:50pm
शरदजी , बधाई स्वीकारें ,सुंदर प्रयास .
Comment by शरद कुमार on October 23, 2013 at 1:05pm
माननीय अरुण शर्मा जी ,
प्रोत्साहा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।
शिल्प मे अवश्य ही कुछ कमियाँ रह गईं हैं। और ओबीओ परिवार से जुडने का मकसद ही ग़ज़ल के शिल्प के बारे मे समझना, और उनके नियमों और विधानों के अनुसार अपनी ग़ज़लों को तराशना है। आप जैसे मार्गदर्शकों का सहयोग और सुझाव प्राप्त होता रहेगा, ऐसी उम्मीद है। आपके द्वारा बताए गए संशोधनों पर कार्य कर रहा हूँ। अनुरोध है की कृपया रदीफ़, काफिये और बहर के मानकों पर भी ग़ज़ल का आकलन करें और आवश्यक सुधार के लिए सुझाव दें।

पुनः धन्यवाद

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