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फल, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य, अगरबत्ती, कर्पूर

मिठाई, पूजा, आरती, दक्षिणा

चुपचाप ये सबकुछ ग्रहण कर लेगा

अगर देना चाहोगे जानवरों या इंसानों की बलि

उसे भी ये चुपचाप स्वीकार कर लेगा

पर जब माँ बनते हुए बिगड़ जाएगी तुम्हारी बहू या बेटी की हालत

तब उसे छोड़कर किसी बड़े अस्पताल में किसी बड़े आदमी की

बहू या बेटी के सिरहाने डाक्टरों की फ़ौज बनकर खडा हो जाएगा

जब किसी झूठे केस में गिरफ़्तार कर लिया जाएगा तुम्हारा बेटा

तब उसे छोड़कर किसी अमीर बाप के बिगड़े बेटे को बचाने के लिए

वकीलों की फ़ौज बनकर खड़ा हो जाएगा

जब तुम स्वर्ग जाने की आशा में

किसी तरह अपनी जिन्दगी के अंतिम दिन काट रहे होगे

तब ये किसी अमीर बूढ़े के लिए

धरती पर स्वर्ग का इंतजाम कर रहा होगा

ये तुम्हारा ईश्वर नहीं है

तुम्हारा ईश्वर तो कब का मर चुका है

अब जो दुनिया चला रहा है

वो ईश्वर पूँजीवादी है

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 809

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2014 at 3:54pm

बहुत बहुत धन्यवाद गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2014 at 3:53pm

बहुत बहुत शुक्रिया annapurna bajpai जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2014 at 3:52pm

बहुत बहुत शुक्रिया Akhand Gahmari जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2014 at 3:51pm

धन्यवाद Meena Pathak जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2014 at 3:51pm

शुक्रिया Shyam Narain Verma जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2014 at 3:51pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ Arun Srivastava जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2014 at 3:50pm

बहुत बहुत शुक्रिया rajesh kumari जी

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 10, 2014 at 11:18pm

सच! वर्तमान के  ईश्वर का शायद यही रूप है, बहुत बढ़िया रचना आदरणीय धर्मेन्द्र जी, हार्दिक बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 10, 2014 at 10:54pm

समाज की कड़वी सचाई को बयान करती आपकी कविता के लिये बधाई , आदरणीय धर्मेन्द्र भाई !!

Comment by annapurna bajpai on April 10, 2014 at 2:11pm

ये तुम्हारा ईश्वर नहीं है

तुम्हारा ईश्वर तो कब का मर चुका है

अब जो दुनिया चला रहा है

वो ईश्वर पूँजीवादी है......................... बहुत खूब !!! क्या बात है आ0 अखंड जी कहाँ से इतना गुस्सा ले आए । बहरहाल इस रचना                                                       के लिए बहुत बधाई स्वीकारें । 

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