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ग़ज़ल : सदा पर्वत से ऊँचा हौसला रखना

बह्र : १२२२ १२२२ १२२२

 

पड़े चंदन के तरु पर घोसला रखना

तो जड़ के पास भूरा नेवला रखना

 

न जिससे प्रेम हो तुमको, सदा उससे

जरा सा ही सही पर फासला रखना

 

बचा लाया वतन को रंगभेदों से

ख़ुदा अपना हमेशा साँवला रखना

 

नचाना विश्व हो गर ताल पर इनकी

विचारों को हमेशा खोखला रखना

 

अगर पर्वत पे चढ़ना चाहते हो तुम

सदा पर्वत से ऊँचा हौसला रखना

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 

Views: 846

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:26pm
तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आ. सौरभ जी, स्नेह बना रहे
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:26pm
बहुत बहुत धन्यवाद आ. श्याम नारायण जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:25pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. निधि जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:25pm
तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आ. गिरिराज जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:25pm
बहुत बहुत धन्यवाद मिथिलेश वामनकर जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:24pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. विजय शंकर जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:24pm
बहुत बहुत धन्यवाद आ. बागी जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:24pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. गोपाल नारायण जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:23pm
बहुत बहुत शुक्रिया श्याम मठपाल जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 18, 2015 at 2:22pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. हरि प्रकाश जी

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