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कविता : चिकनी मिट्टी और रेत

चिकनी मिट्टी के नन्हें नन्हें कणों में
आपसी प्रेम और लगाव होता है
हर कण दूसरों को अपनी ओर
आकर्षित करता है
और इसी आकर्षण बल से
दूसरों से बँधा रहता है

रेत के कण आकार के अनुसार
चिकनी मिट्टी के कणों से बहुत बड़े होते हैं
उनमें बड़प्पन और अहंकार होता है
आपसी आकर्षण नहीं होता
वो एक दूसरे की गति का विरोध करते हैं
उनमें केवल आपसी घर्षण होता है

चिकनी मिट्टी के कणों के बीच
आकर्षण के दम पर
बना हुआ बाँध
बड़ी बड़ी नदियों का प्रवाह रोक देता है,
चिकनी मिट्टी बारिश के पानी को रोककर
जमीन को नम और ऊपजाऊ बनाए रखती है;

रेत के कणों से बाँध नहीं बनाए जाते
ना ही रेतीली जमीन में कुछ उगता है
उसके कण अपने अपने घमंड में चूर
अलग थलग पड़े रह जाते हैं बस।

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Comment

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Comment by Neelam Upadhyaya on April 27, 2011 at 10:13am
Wah ! kya baat hai.  Bahut hi sunder.
Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on April 26, 2011 at 12:11pm
बहुत शानदार............
Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on April 26, 2011 at 12:11pm
बहुत शानदार............

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 26, 2011 at 9:30am
धर्मेन्द्र भाई बहुत ही शिक्षाप्रद बात कही है आपने, यदि आपस में घनिष्ठता हो तो छोटे छोटे लोग भी मिलकर बड़ा काम कर सकते है , छोटे से उदाहरण से बड़ी बात आपने कह दी है , शानदार अभिव्यक्ति है बंधू , बधाई कुबूल करे |

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